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कठिन समस्या से निपटने के क्रम में साहसी प्रयोग

नीलकंठ मिश्रा /  July 06, 2018

तेलंगाना में कृषि कार्य में लगे लोगों का औसत देश के औसत से अधिक है। राज्य सरकार ने किसानों के लिए दो रोचक योजनाएं पेश की हैं। उनका आकलन कर रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
दशकों तक कृषि उपज की बढ़ी हुई कीमतों के रूप में देश के अमीरों (प्राय: गैर कृषि क्षेत्र के) से गरीबों (अक्सरखेती से जुड़े) की ओर आय का स्थानांतरण होता रहा। इसकी कमियां भी हैं: उच्च मुद्रास्फीति, राजकोषीय चुनौतियां, उच्च ब्याज दर और समय-समय पर मौद्रिक कमजोरी। परंतु सरकारी नियंत्रण वाली कोई अन्य ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था थी ही नहीं जिसके तहत अमीरों द्वारा चुकाए जा रहे कर को गरीबों तक स्थानांतरित किया जा सके।  बीते कुछ वर्षों में तमाम खाद्य श्रेणियों में कीमतें कम हुई हैं। इस दौरान आय में होने वाला स्थानांतरण रुक गया है। खासतौर पर फसलों की खेती के क्षेत्र में जबकि इस क्षेत्र में कृषि श्रमिकों का 92 फीसदी हिस्सा निर्भर है। यह एक राजनीतिक समस्या भी है क्योंकि देश की श्रम शक्ति का आधा हिस्सा खेती करता है। यह आर्थिक नीति के क्षेत्र में भी बड़ी चुनौती है क्योंकि कम आय गरीबों में खपत को कम करती है जबकि अमीरों के लिए व्यय से बची आय केवल बचत बढ़ाती है। 
 
केंद्र और राज्य सरकारों ने अब तक इस समस्या से निपटने के लिए किसानों की कर्ज माफी और ढेर सारी सब्सिडी का रास्ता अपनाया है। इसमें उर्वरक, बिजली, बीज और मशीन खरीद पर दी जाने वाली सब्सिडी शामिल है। इसमें कर्ज माफी की निगरानी करनी मुश्किल है जबकि सब्सिडी का आकार ऐसा नहीं कि इससे कुछ खास लाभ हासिल हो।  तेलंगाना में कृषि कार्य में लगे लोगों का औसत देश के औसत से अधिक है और वहां कपास और तिलहन जैसी उपज का रकबा भी ज्यादा है। इन जिंसों की वैश्विक कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। बीते चार सालों में राज्य सरकार ने ऋण माफी और सब्सिडी का तयशुदा मार्ग अपनाया। इसके अलावा बड़ी सिंचाई परियोजनाएं लाई गईं और गोदाम भंडारण क्षमता में इजाफा किया गया। अब अगले चुनाव में एक वर्ष बचा है और सरकार ने दो रोचक योजनाएं पेश की हैं। 
 
पहली योजना है किसानों के सामूहिक जीवन बीमा की योजना। इसके तहत 40 लाख किसानों को 5 लाख रुपये का जीवन बीमा उपलब्ध कराया जाएगा। अगर किसी भी वजह से उनकी मौत होती है तो उन्हें यह राशि दी जाएगी। इस योजना की 9 अरब रुपये की प्रीमियम राशि का बोझ सरकार वहन करेगी। दूसरी और ज्यादा महत्त्वाकांक्षी योजना है रैयतु बंधु योजना। यह कृषि निवेश समर्थन योजना है। इस वर्ष मई के मध्य में यानी खरीफ की बुआई शुरू होने के एक महीना पहले राज्य सरकार ने करीब 60 लाख किसानों को 4,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से चेक वितरित किए। इस वर्ष के अंत में रबी के मौसम में भी इसे दोहराया जाएगा। माना जा रहा है कि इसमें कुल 120 अरब रुपये का खर्च आएगा जो राज्य के सालाना उत्पादन का 1.5 फीसदी और सरकारी व्यय का 7 फीसदी होगा। इसके चलते अन्य सब्सिडी या हस्तांतरण में कोई कटौती नहीं की जाएगी। 
 
यह सार्वभौमिक आधारभूत आय नहीं है। इस मामले में खेत मालिक को पैसा मिलेगा, भले ही वह फसल बोए या नहीं। यह भी जरूरी नहीं कि इस रकम का इस्तेमाल खेती में ही हो। सरकार के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया है ताकि निचले स्तर पर किसी तरह की लीकेज न हो।  चूंकि दोनों योजनाओं के लिए भूस्वामित्व ही शर्त है इसलिए राज्य के राजस्व विभाग ने 100 दिन का मिशन शुरू किया ताकि कंप्यूटरीकृत भू रिकॉर्ड का साफ सुथरा डेटाबेस तैयार किया जा सके। कई स्तरों पर जांच की व्यवस्था की गई जिसमें हर गांव में जन सुनवाई की व्यवस्था शामिल थी। भू प्रशासन के मुख्य आयुक्त के मुताबिक 90 प्रतिशत से अधिक भू अधिकारों पर कोई विवाद नहीं है और उनके मामले में स्थानांतरण किया जा रहा है। प्रत्येक को आधार से जोड़ा गया है। 
 
लीकेज पर तो रोक लगी है लेकिन तीन बातें हैं जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। पहली बात, इससे केवल भूस्वामियों को लाभ होता है। परंतु वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक तेलंगाना के 91 लाख कृषि श्रमिकों में से दो तिहाई भूमिहीन थे। कम कीमत और बढ़ती लागत का बोझ ज्यादातर किसानों पर पड़ा लेकिन भूमिहीन श्रमिक अधिक गरीब होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनताना बढऩे की गति भी धीमी पड़ी। दूसरा, इससे भाड़े पर खेती करने वालों को फायदा नहीं होता। परिचालन की दृष्टिï से भी देखें तो इसे समझा जा सकता है क्योंकि राज्य सरकार के पास इसके आंकड़े ही नहीं हैं। 
 
बहरहाल, कमजोर कृषि आय का दबाव किसानों पर होता है, न कि भू स्वामी पर क्योंकि वह तो कहीं और भी हो सकता है। तीसरा, 91 फीसदी किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है लेकिन उनके पास कुल मिलाकर राज्य की समस्त भूमि का दो तिहाई हिस्सा है। यानी केवल 9 फीसदी भूस्वामी 40 अरब रुपये पाते हैं।  राजकोषीय घाटे के सीमा में रहने की उम्मीद है। तो योजना की फंडिंग कहां से हो रही है? चालू वित्त वर्ष में तेलंगाना में करीब दो तिहाई व्यय कृषि, समाज कल्याण और सिंचाई के लिए आवंटित है। राज्य का कर संग्रह भी सुधरा है। राज्य सकल घरेलू उत्पाद और कर का अनुपात 2016 के 7 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत हो गया है। इस साल इसके 8.8 फीसदी रहने की उम्मीद है। 
 
रैयतु बंधु योजना बहुत व्यापक है। इसके असर का अग्रिम अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके असर के आकलन के लिए अकादमिक अध्ययन किए गए हैं लेकिन अभी इसके वास्तविक नतीजों की शुरुआत होनी है।  4,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से खरीफ की फसल की 18 से 34 फीसदी लागत शामिल हो जाती है। उम्मीद है इससे महाजनों से उधार लेने की प्रक्रिया रुकेगी। लगता यही है कि इसका अधिकांश हिस्सा खपत में इस्तेमाल होगा। अब जमीन की कीमत भी बढ़ सकती है और भूस्वामियों के लिए सकारात्मक संपत्ति प्रभाव उत्पन्न हो सकता है। 
 
क्या अन्य राज्य इस योजना को अपनाएंगे? अगर तेलंगाना सरकार दोबारा सत्ता में आती है तो अन्य राज्यों में ऐसी होड़ लग सकती है। परंतु इस योजना के लिए पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश के साथ साफ सुथरे भू रिकॉर्ड भी चाहिए।  अधिक गहन प्रश्न ये हैं कि क्या ऐसी योजनाएं श्रमिकों के स्वाभाविक रूप से खेती से दूर होने को रोकती हैं और अधिक उत्पादक फंड को इस क्षेत्र में व्यय करने से क्या अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर होता है? दूसरी ओर क्या यह सही नहीं कि लोग अपने पैसे खर्च करने की वजह खुद तय करें न कि सरकार? क्या बिना अवरोधों के उचित वितरण नहीं हो सकता? इन सवालों के स्पष्टï जवाब नहीं हैं। इन पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।
Keyword: telangana, agri, farmer, crop, MSP, एमएसपी,
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