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खुदरा की बहार

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 06, 2018

कृषि क्षेत्र संकट में उलझा हुआ है। विनिर्माण में गतिशीलता का अभाव है। नितिन गडकरी के राजमार्ग निर्माण कार्यक्रम को छोड़ दें तो निर्माण कार्य भी शिथिल है। वित्तीय क्षेत्र बैंकिंग संकट में घिरा हुआ है। सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा क्षेत्र है जहां से उजाले की किरण आ रही है? इसका उत्तर आपको चकित कर सकता है लेकिन वह क्षेत्र है व्यापार। ज्यादा विशिष्टï उत्तर दें तो वह है संगठित खुदरा कारोबार। हाल की घटनाओं पर विचार कीजिए। रिलायंस (जिसका इतिहास बिज़नेस टु बिज़नेस कारोबार का रहा है) ने कहा है कि कंपनी अब उपभोक्ता आधारित कारोबार के दम पर विकास करेगी। वॉलमार्ट फ्लिपकार्ट में 16 अरब डॉलर का निवेश कर रही है। आइकिया हैदराबाद में अपना पहला स्टोर खोलने जा रही है। स्टॉक मार्केट पर भी खुदरा कारोबार की खुमारी है। डीमार्ट खुदरा शृंखला चलाने वाली कंपनी ने गत वर्ष जिस दर पर प्रारंभिक निर्गम उतारा था, उससे कई गुना पर कारोबार कर रही है। कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब एक लाख करोड़ रुपये के आसपास है और वह देश की 30 शीर्ष कंपनियों में से एक है। 

 
देश में बड़े खुदरा कारोबारियों का प्रभावी असर हो सकता है। वे बेहतर आपूर्ति शृंखला, भारी भरकम उत्पादन, वैश्विक कारोबार के साथ एकीकरण और उच्च कर संग्रह (अब कोई फर्जी बिल नहीं) के माध्यम से  अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। ऑनलाइन और मुख्य धारा की बिक्री भी एक साथ आ सकती है। कम से कम रिलायंस चेयरमैन मुकेश अंबानी की बातों से और आइकिया से तो यही संकेत निकलता है। फ्लिपकार्ट में वॉलमार्ट का निवेश भी यही बताता है।  देश में अधिकांश खुदरा कारोबार अभी भी 1.2 करोड़ छोटे किराना कारोबारियों के हाथ में है, ऐसे में बदलाव तो काफी समय से लंबित है। दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बात करें तो संगठित खुदरा कारोबार में भारत की हिस्सेदारी सबसे कम है। एशियाई देशों में शायद दक्षिण कोरिया ही इकलौता ऐसा देश है जहां हिस्सेदारी 25 फीसदी से कुछ कम है। भारत की हिस्सेदारी 7 फीसदी है।
 
यह प्रतिशत दोगुना या तीन गुना हो जाए और शॉपिंग मॉल पनपते चले जाएं तो भी निकट भविष्य में खुदरा कारोबार में किराना कारोबारियों की हिस्सेदारी कम होती नहीं नजर आती। ऐसा केवल उनकी ठोस विरासत की वजह से नहीं है बल्कि इसलिए भी क्योंकि बाजार के तेज विस्तार से हर किसी के लिए ज्यादा गुंजाइश बनेगी। यही वजह है कि देश में एक के बाद एक ऐसी खुदरा शृंखलाएं आईं जिन्होंने खाने, कपड़े, दवा, चश्मे, फर्नीचर, सोने के गहने, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, घरेलू उपकरण और जूते आदि हर सामान बेचना शुरू कर दिया। इसके बावजूद बाजार के स्वरूप में बदलाव की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। ऐसा भी हो सकता है कि भारतीय बाजार की जटिलताओं को देखते हुए शुरुआती कारोबारियों ने सतर्कता बरती हो। परंतु अब जबकि इस कारोबार में भारी निवेश हो रहा है तो बदलाव की गति तेज होनी तय है।
 
कुछ अन्य घटनाएं हैं जो ढांचागत बदलाव को अंजाम देंगी। राजमार्गों और फीडर सड़कों के तेज विकास के साथ ट्रकों की गति बढ़ेगी और आपूर्ति के केंद्र बड़े शहरों से दूर अधिक किफायती जगहों पर स्थापित किए जा सकेंगे। आपूर्तिकर्ता भी कहीं अधिक दूरदराज जगहों पर उत्पादन और खपत केंद्र स्थापित कर सकेंगे। वस्तु एवं सेवा कर भी एकदम सही वक्त पर आया है। इससे बड़े कारोबारियों को फायदा है और नकदी कारोबार मुश्किल हो गया है। यह बात भी संगठित खुदरा कारोबार के पक्ष में जाएगी। 
 
सबसे अधिक संभावित लाभ मेक इन इंडिया से जुड़ा हुआ है। मारुति के वेंडर विकास कार्यक्रम ने देश में वाहन कलपुर्जा उद्योग को जन्म दिया। यह अब एक बड़े निर्यात क्षेत्र में बदल चुका है। संगठित खुदरा कारेाबार की मदद से सफलता की इस कहानी को तमाम क्षेत्रों में दोहराया जा सकता है। सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियम काफी जटिल बना रखे हैं। उसका कहना है कि विदेशी खुदरा कंपनियों के माध्यम से बेची जाने वाली कम से कम 30 फीसदी वस्तुएं स्थानीय रूप से बनी होनी चाहिए। हालांकि इससे पार पाया जा सकता है। वॉलमार्ट का मौजूदा कारोबार पहले ही 90 प्रतिशत तक स्थानीय स्रोतों पर आधारित है। जबकि आइकिया को भी उम्मीद है कि उसके अपने स्टोरों पर स्थानीय उत्पादों की हिस्सेदारी को 15 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी किया जा सकेगा। उधर, तैयार वस्त्र और साज सज्जा क्षेत्र की खुदरा कंपनी फैब इंडिया भी दूसरे देशों में अपने स्टोर खोलने की उम्मीद जता रही है।
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