बिजनेस स्टैंडर्ड - हिस्सेदारी घटाने से मजबूत नहीं होंगे बैंक: जयराम रमेश
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हिस्सेदारी घटाने से मजबूत नहीं होंगे बैंक: जयराम रमेश

ईशान बख्शी /  07 05, 2018

बीएस बातचीत

आईसीआईसीआई बैंक में कॉर्पोरेट प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर हो रही चर्चा के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ईशान बख्शी से कहा कि वह इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं कि बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम करने से बैंकिंग व्यवस्था में जवाबदेही आएगी या नहीं। 'इंटरट्विंड लाइव्स' पुस्तक के लेखक रमेश ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के दौर, इंदिरा गांधी और पी एन हक्सर सहित कई मुद्दों पर बात की। संपादित अंश:

सरकारी बैंकों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए क्या आपको लगता है कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण सही फैसला था?

बिजनेस स्टैंडर्ड हिस्सेदारी घटाने से मजबूत नहीं होंगे बैंक: जयराम रमेशमुझे लगता है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अनिवार्य कारण थे। इसका समय राजनीतिक था लेकिन इसका औचित्य आर्थिक था। दिलचस्प बात यह है कि इंदिरा गांधी और पी एन हक्सर दोनों राष्ट्रीयकरण को लेकर बहुत सतर्क थे। वर्ष 1967 से लेकर 1969 के बीच वे सामाजिक नियंत्रण, क्रेडिट योजना के बारे में बात कर रहे थे। लेकिन 1969 में जुलाई के पहले 10 दिन में ही हक्सर ने आखिरकार इसके लिए अपना मन बना लिया और फिर इंदिरा गांधी भी सहमत हो गईं। 19 जुलाई, 1969 को बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर लिया गया। संयोगवश यह फैसला एक अध्यादेश के जरिये किया गया। हर्षद मेहता का शेयर घोटाला साबित होने के उपरांत संयुक्त संसदीय समिति गठित होने के बाद हक्सर ने डॉ. मनमोहन सिंह को एक दिलचस्प पत्र लिखा था। वर्ष 1994 में उन्होंने डॉ. सिंह को लिखा कि काश संयुक्त संसदीय समिति उन्हें गवाही के लिए बुलाती। अगर ऐसा होता तो वह समिति को बताते कि कैसे आपातकाल के दौरान रिजर्व बैंक सहित पूरी बैंकिंग व्यवस्था में नियुक्तियों का राजनीतिकरण किया गया। उनका कहना था कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मूल उद्देश्य आज भी प्रासंगिक हैं। अलबत्ता नियुक्तियों के राजनीतिकरण ने उन्हें परेशान किया था।

क्या पिछले दशकों के दौरान बैंकों के राष्ट्रीयकरण के आर्थिक और सामाजिक उद्देश्य पूरे हुए?

हां, मुझे ऐसा लगता है। मेरा मानना है कि सरकारी बैंकिंग व्यवस्था ने एक अहम भूमिका निभाई है। स्वयं सहायता समूह क्षेत्र का उदाहरण लीजिए जिसे मैं करीब से जानता हूं। अगर सरकारी बैंक नहीं होते तो देश में बैंकिंग से जुड़ा स्वयंसहायता समूह आंदोलन आगे नहीं बढ़ पाता। भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों के विलय के मुद्दे पर मेरी दुविधा का एक कारण यह था कि मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है कि स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद और मैसूर ने कैसे खास इलाकों में अहम भूमिका निभाई थी। मैं सरकारी बैंकों के निजीकरण के पक्ष में नहीं हूं। एयर इंडिया के मामले में भी मैं दुविधा की स्थिति में हूं। मैं यह कहना चाहता हूं कि शायद एयर इंडिया को निजी हाथों में सौंपा जाना चाहिए क्योंकि हमारे पास विमानन कंपनी चलाने के बजाय कई दूसरे अहम काम हैं। लेकिन जहां तक बैंकिंग व्यवस्था का सवाल है तो मेरा मानना है कि सरकारी को 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी अपने पास रखनी चाहिए। मुझे पता है कि इसके खिलाफ भी एक दलील है। नरसिम्हन समिति की रिपोर्ट के आधार पर यशवंत सिन्हा संसद में एक विधेयक लाए थे। उनका कहना था कि आप सरकार की हिस्सेदारी 33 फीसदी तक ला सकते हैं और इसके बावजूद बैंकों का सरकारी स्वरूप बरकरार रख सकते हैं।

अब यह सरकारी स्वरूप क्या है?

यह दो तरह का होता है। पहला नियुक्ति के जरिये और दूसरा प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लक्ष्यों के जरिये। नरसिम्हन समिति की दलील यह थी कि आप प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लक्ष्यों को रिजर्व बैंक के जरिये हासिल कर सकते हैं। लेकिन नियुक्तियां सरकार नहीं करेगी। अलबत्ता, आईसीआईसीआई बैंक में जो कुछ हुआ, उसे देखते हुए मैं इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हूं कि बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी 50 फीसदी से कम करने से जवाबदेही और कार्यकुशलता बढ़ेगी। 

कई लोग तर्क देंगे कि इसका कारण नियुक्तियां हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव है।

अगर आप सरकारी बैंकों में काम करने वाले लोगों को देखें तो वे बहुत काबिल लोग हैं। निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को देखिए। वे कभी सरकारी क्षेत्र में काम कर चुके हैं। मैं इस बात से इनकार नहीं करता हूं कि अक्सर न केवल बैंकों के अधिकारियों की नियुक्तियों में बल्कि बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति में भी राजनीति की अहम भूमिका होती है। इसके लिए हर राजनीतिक दल दोषी है।  मैं नहीं समझता हूं कि किसी भी राजनीतिक दल के पास यह नैतिक बल नहीं है कि वह कह सके कि उसने बैंक के बोर्डों में केवल पेशेवरों को ही नियुक्ति किया है।

 

 

 

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