बिजनेस स्टैंडर्ड - किसानों को मोदी की सौगात में धन और भंडारण की अड़चन
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किसानों को मोदी की सौगात में धन और भंडारण की अड़चन

रॉयटर्स / नई दिल्ली July 05, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों से पहले चावल सहित खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भारी बढ़ोतरी का दांव खेला है। मगर इससे देश के करोड़ों किसानों को बहुत ज्यादा फायदा नहीं होने का अनुमान है। इसकी वजह यह है कि सरकार के पास भंडारण स्थान और उपज के ज्यादातर हिस्से को खरीदने के लिए पैसे की कमी है।  सरकार द्वारा बुधवार को मंजूर न्यूनतम समर्थन मूल्य में औसत बढ़ोतरी 25 फीसदी हुई है। यह मोदी सरकार के शुरुआती चार वर्षों में 3 से 4 फीसदी थी। मोदी सरकार के लिए अगले साल फिर से जीत हासिल करना वर्ष 2014 के मुकाबले ज्यादा मुश्किल रहने की संभावना है। 
 
विभिन्न अध्ययनों के मुताबिक सरकार एक बेंचमार्क तय करने के लिए ज्यादातर फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। लेकिन सरकारी एजेंसियां उन कीमतों पर चावल और गेहूं जैसी कृषि उपजों की सीमित मात्रा में खरीदारी करती है। इससे ऊंचे एमएसपी का लाभ देश के 26.3 करोड़ किसानों में से केवल करीब 7 फीसदी को मिल पाता है।  अर्थशास्त्रियों का कहना है कि योजना को पूरी तरह लागू करने की बहुत अधिक लागत आएगी। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3.3 फीसदी तय किया है, जिस पर पहले ही तेल की ऊंची कीमतों की वजह से दबाव है। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच में भारतीय इक्विटी रणनीतिकार संजय मुकीम ने कहा, 'धन की उपलब्धता पर पहले ही दबाव है, इसलिए सरकार कृषि जिंसों की खरीद की मात्रा में इजाफा नहीं कर सकती।' उन्होंने कहा, 'अगर सरकार ऐसा करती भी है तो उसके पास भंडारण स्थान नहीं है और दो-तीन महीनों में गोदाम नहीं बनाए जा सकते।' कृषि और खाद्य मंत्रालयों ने अभी इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। सरकार ने कहा कि उसकी सीमित खरीद से इस साल 150 अरब रुपये की लागत आएगी। हालांकि उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि खर्च होने वाली वास्तविक राशि का अनुमान लगाना मुश्किल है। यह खरीदी जाने वाली मात्रा पर निर्भर करेगी। 
 
आम तौर पर एमएसपी उन फसलों का तय किया जाता है, जिन्हें ज्यादातर किसान उगाते हैं। इससे फसल कटाई के समय जिंसों अत्यधिक आवक की स्थिति पैदा हो जाती है। इन जिंसों में से लाखों टन की बिक्री उत्पादन लागत से भी कम दामों पर स्थानीय बाजारों में करनी पड़ती हैं। इससे देश में किसानों के विरोध-प्रदर्शन होते हैं।  महाराष्ट्र के वर्धा जिले के एक ग्रामीण पुरुषोत्तम सोनटके ने सवाल किया, 'इस बढ़ोतरी का क्या फायदा है, जब हमें पिछले साल का एमएसपी भी नहीं मिल पाता।' उन्हें 2017 में अपनी सोयाबीन 2,700 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचनी पड़ी, जो सरकार द्वारा तय कीमत से 11 फीसदी कम थी। पिछले कुछ महीनों के दौरान कृषि जिंसों की कीमतों में भारी गिरावट से ग्रामीण इलाकों में मोदी की लोकप्रियता कम हुई है। देश के ग्रामीण इलाकों में देश की 130 करोड़ आबादी में से दो-तिहाई रहती है। इस वजह से प्रधानमंत्री को पिछले सप्ताह किसानों के एक समूह को अपने आवास पर आमंत्रित किया और लागत के डेढ़ गुना एमएसपी का वादा किया। उन्होंने हाल में एमएसपी में बढ़ोतरी को ऐतिहासिक बताया और कहा कि वह किसानों के लिए और कई कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना है। 
 
भंडारण की कमी 
 
वर्ष 2017-18 में देश में 21 करोड़ टन चावल और गेहूं का उत्पादन हुआ, जिसमें से सरकारी एजेंसियों ने केवल 7.1 करोड़ टन की खरीदारी की। इसी साल देश में करोड़ों टन तिलहन और प्याज एवं आलू जैसी बागवानी फसलों का उत्पादन हुआ, जिनकी आम तौर पर सरकार खरीदारी नहीं करती है। खाद्य मंत्रालय ने मार्च में संसद को बताया था कि केंद्रीय भंडार के लिए चावल और गेहूं जैसे खाद्यान्न के भंडारण की अधिकतम जरूरत 6 करोड़ टन है, जबकि कुल क्षमता 7.35 करोड़ टन है। इसमें से 17 फीसदी खुला भंडारण स्थान है, जो प्लास्टिक या अन्य चीज से ढका हुआ है। मंत्रालय की वेबसाइट पर कहा गया है कि सरकार वर्ष 2020 तक भंडारण क्षमता में और इजाफा करेगी। जाने-माने कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने कहा, 'ऊंचा एमएसपी स्वागत योग्य है, लेकिन चावल और गेहूं को छोड़कर एमएसपी पर सरकारी खरीद अपर्याप्त है।' उन्होंने कहा, 'यह उन किसानों के अनुभवों से साफ है, जिन्होंने सरकार द्वारा खरीद किए जाने की उम्मीद में ज्यादा दलहनों का उत्पादन किया, लेकिन बाजार कीमतों में भारी गिरावट की वजह से उन्हें निराश होना पड़ा।'
 
चुनावी वादा 
 
मोदी ने वर्ष 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री बनने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोतरी और किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था। लेकिन उन्हें दो अंकों में खाद्य महंगाई और ऊंचे राजकोषीय घाटे की वजह से पिछले चार वर्षों में एमएसपी कम बढ़ाने को बाध्य होना पड़ा। इस साल एमएसपी में भारी बढ़ोतरी सरकार के बीते वर्षों के रुख से बिल्कुल अलग है। 
 
मुंबई में इंडीट्रेड डेरिवेटिव्ज ऐंड कमोडिटीज के जिंस एवं करेंसी प्रमुख हरीश गलीपेल्ली ने कहा कि पिछले साल भी किसानों ने एमएसपी से नीचे फसलों की बिक्री की थी और उन्हें इस साल भी ऐसा ही करना पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि निजी गोदामों में अनाज और चीनी का भारी भंडार जमा है। गलीपेल्ली ने कहा कि एमएसपी से नीचे भी दलहन जैसी कुछ जिंसों के दाम वैश्विक कीमतों से 30 फीसदी अधिक हैं, जिससे उनका निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं है। हाल में एमएसपी में बढ़ोतरी से घरेलू कीमतों और वैश्विक कीमतों के बीच अंतर और बढ़ेगा, जिसका भारत के कृषि निर्यात पर असर पड़ेगा। एक वैश्विक ट्रेडिंग कंपनी के भारतीय प्रमुख ने नाम न छापने का आग्रह करते हुए कहा कि भारत का कृषि निर्यात 2016-17 में घटकर 33 अरब डॉलर रहा, जो 2013-14 में 42.6 अरब डॉलर था। उन्होंने कहा, 'एमएसपी में बढ़ोतरी से देश में कृषि जिंसों की अति आपूर्ति की स्थिति ज्यादा बदतर होगी।'
Keyword: agri, farmer, crop, MSP, narendra modi, एमएसपी,
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