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अनुकूल तेल कीमतों से मिला मौका गंवा बैठी मोदी सरकार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  July 05, 2018

जॉन एफ केनेडी ने 1962 में कहा था कि छत की मरम्मत के लिए सबसे मुफीद वक्त उस समय होता है जब सूरज चमक रहा हो। केनेडी ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के संदर्भ में जो बात कही थी, वह भारत के पेट्रोलियम क्षेत्र के लिए भी 2014 में पूरी तरह सही थी। मोदी सरकार को आज अफसोस हो रहा होगा कि उसने पेट्रोलियम क्षेत्र संबंधी सलाहों को पिछले चार वर्षों में काफी हद तक अनसुना किया और कार्यकाल के पांचवें साल में अब उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। पेट्रोलियम क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किल हालात पैदा करने लगा है। 

 
मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के भावों में नरमी शुरू हो गई थी। जून 2014 में भारत 109 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर तेल खरीद रहा था लेकिन उसके बाद से लगातार भाव गिरते रहे। जनवरी 2016 में तो कच्चा तेल 28 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था। भारतीय तेल आयात का बोझ कम होने के सकारात्मक असर विभिन्न क्षेत्रों में नजर आने लगे। पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतों में भी गिरावट देखी गई लेकिन वह कच्चे तेल में आई कमी के अनुपात में नहीं थी। डीजल के दाम तय करने का जिम्मा बाजार पर छोड़ दिया गया जबकि पेट्रोल के मामले में यह कदम 2010 में ही उठाया जा चुका था। बहरहाल तेल विपणन कंपनियों ने इसका भरपूर फायदा उठाया और केरोसिन एवं रसोई गैस को छोड़कर बाकी सभी पेट्रोलियम उत्पादों के मद में होने वाले घाटे को भरने में लग गईं। सरकार भी वर्ष 2013-14 में 854 अरब रुपये रही अपनी तेल सब्सिडी को 2014-15 में 603 अरब और 2015-16 में 300 अरब रुपये पर ले आई। 
 
तेल कीमतों में आई सुस्ती से प्राप्त राजस्व का इस्तेमाल राजकोषीय स्थिति को मजबूत करने के लिए किया गया। पेट्रोल एवं डीजल पर उत्पाद शुल्क में कई बार बढ़ोतरी की गई जिससे केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क संग्रह 2013-14 के 780 अरब से बढ़कर 2014-15 में 992 अरब और 2015-16 में 1,786 अरब रुपये पर जा पहुंचा। राजकोषीय घाटे के भी 2013-14 के 4.4 फीसदी से घटकर 2015-16 में 3.9 फीसदी पर आ जाने के पीछे तेल राजस्व की अहम भूमिका रही थी। उस समय भारत की पेट्रोलियम अर्थव्यवस्था का सूरज चमक रहा था। लेकिन जनवरी 2016 के बाद कच्चा तेल 28 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर उठना शुरू हो गया और हालात बदलने लगे। मार्च 2018 आते-आते भारत को 64 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर तेल आयात करना पड़ा। जून में तो कच्चे तेल के भाव 74 डॉलर प्रति बैरल को भी छू गए। इसके चलते पेट्रोलियम उत्पादों के खुदरा भाव 2014 के स्तर से भी आगे निकल गए। ऐसी स्थिति में इन उत्पादों पर लगने वाले शुल्कों में कटौती की मांग जोर पकडऩे लगी। 
 
अक्टूबर 2017 में पेट्रोल एवं डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में 2 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई थी। लेकिन उसके बाद से सरकार ने कोई और कटौती नहीं की है। सरकार खुदरा कीमतों में कटौती की मांग के दबाव के आगे नहीं झुकी। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने तेल उत्पादों पर लगने वाले करों में कटौती से इनकार किया है। तेल कंपनियों ने कच्चे तेल में तेजी का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया है।  पेट्रोलियम उत्पादों से सरकार को मिलने वाले शुल्क में लगातार बढ़ोतरी होती रही। वर्ष 2016-17 में पेट्रोलियम राजस्व 2,427 अरब रुपये रहा था और 2017-18 में यह 2 रुपये प्रति लीटर की शुल्क कटौती के बावजूद 2,290 अरब रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष में भले ही राजकोषीय घाटा 3.5 फीसदी पर आ गया था लेकिन 2018-19 में इसे 3.3 फीसदी पर रखना है। जेटली ने संकेत दिए हैं कि सरकार अगले कुछ वर्षों में जीडीपी के बरअक्स राजकोषीय घाटे में 1.5 का सुधार करना चाहती है। इसे एक राहत के तौर पर देखा जाना चाहिए। 
 
हालांकि इससे इनकार नहीं कर सकते कि सरकार ने एक बड़ा मौका गंवा दिया। मसलन, सरकार पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण के लिए एक स्थायी एवं सतत नीति बना सकती थी ताकि विसंगतियां दूर हों और तेल बिक्री में प्रतिस्पद्र्धा बढ़े। पेट्रोलियम उत्पादों का मूल्य व्यापार-अनुरूपता पर आधारित न होकर कॉस्ट-प्लस व्यवस्था से तय किया जाना चाहिए। दरअसल व्यापार-अनुरूपता की व्यवस्था सार्वजनिक तेल कंपनियों को सुस्त, गैर-प्रतिस्पद्र्धी एवं निकम्मी बनाती है क्योंकि शोधन, परिवहन एवं विपणन में लागत कटौती का  उन्हें कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता है। इससे भी खराब बात यह है कि निजी तेलशोधन कंपनियां अधिक मार्जिन से व्यापार-अनुरूपता प्रणाली का पूरा फायदा उठा सकती हैं। इसकी जगह कॉस्ट-प्लस मूल्यांकन प्रणाली अपनाई जाए तो खुदरा कीमतों में गिरावट भी हो सकती है क्योंकि तेलशोधक कंपनियों में प्रतिस्पद्र्धा बढ़ेगी। सार्वजनिक तेल अन्वेषण कंपनियों ने नए तेल क्षेत्रों की खोज पर निवेश बढ़ाने की दिशा में भी कोई कदम नहीं उठाया। घरेलू उत्पादन बढ़ाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सकती थी। लेकिन लगातार छठे साल 2017-18 में भी घरेलू कच्चा तेल उत्पादन गिरकर 356.8 लाख टन पर रहा और कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 82.8 फीसदी पर जा पहुंची। 
 
ऐसे में वर्ष 2022 तक तेल आयात में 10 फीसदी की कमी लाने की संभावना काफी कम दिखती है। ईरान से तेल आयात पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने के बाद भारत की ऊर्जा सुरक्षा एवं तेल आयात की देखरेख करने वालों की चिंताएं बढ़ गई हैं। विडंबना यह है कि सबसे बड़ी तेल-गैस कंपनी ओएनजीसी कई तेल क्षेत्रों के खोज की घोषणा के बावजूद उत्पादन के मामले में स्थिर रही है। गत चार वर्षों में ओएनजीसी का पूंजीगत व्यय महज 1,239 अरब रुपये रहा है। अगर एचपीसीएल के अधिग्रहण के लिए उसे 370 अरब रुपये लगाने को नहीं कहा गया होता तो तेल खोज एवं उत्पादन पर उसका पूंजीगत व्यय शायद बेहतर होता। इससे सरकार ने भले ही अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत कर ली लेकिन इस अधिग्रहण के बगैर ओएनजीसी के पूंजीगत व्यय कार्यक्रम को अधिक मजबूती मिली होती।
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