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भारतीय रेल के डिब्बे और उनके नंबर

विवेक देवरॉय /  July 05, 2018

रांची में रेल कोच चोरी करने वाले गैंग से संबंधित रिपोर्ट पूरी तरह गलत है। हां, यह अवश्य हो सकता है दिल्ली में कई तरह के यार्ड के कारण कुछ कोच इधर-उधर हो गए हों। बता रहे हैं विवेक देवरॉय 

 
भारतीय रेलवे (आईआर) के कोच अब अंदर और बाहर से कहीं अधिक बेहतर नजर आएंगे। आईसीएफ (इंटीग्रल कोच फैक्टरी) के 30,000 कोचों को गहरे पीले और भूरे रंग से रंगा जाएगा। इनमें पहला नंबर दिल्ली-पठानकोट एक्सप्रेस (22,429) का है। कोई भी रेल के इंजनों, वैगन या कोच के बाहरी रंग को ज्यादा तवज्जो नहीं देता है।  इसे समझा जा सकता है क्योंकि यात्रियों के आराम का संबंध कोच की भीतरी स्थिति से है, न कि बाहरी। कई वर्ष पहले ट्रेनों के सभी कोच हल्के मरून रंग के यानी जंग के रंग के हुआ करते थे। अभी भी जहां-तहां ये कोच दिख जाते हैं। इसके बाद भारतीय रेल ने वैक्यूम ब्रेक की जगह एयर ब्रेक का इस्तेमाल करना शुरू किया जो कहीं अधिक बेहतर थे। आईसीएफ के एयर ब्रेक वाले कोच नीले रंग में रंगे जाने लगे। परंतु ध्यान रहे कि आईसीएफ के कोच भी विशेष नहीं हैं। विशेष ट्रेन तो वे हैं जिनमें एलएचबी कोच हैं। जहां तक यात्री टे्रनों के रंग की बात है तो उनकी अब तक तीन श्रेणियां हैं। पहला, हल्का मरून का रंग, दूसरा नीला रंग और तीसरा विशेष ट्रेनें। इन विशेष ट्रेनों का दायरा राजधानी और शताब्दी से आगे जाता है और इनके कई रंग हो सकते हैं। ये ट्रेनें रंगीन होती हैं और किसी तरह के मानकीकरण से पूरी तरह मुक्त भी। 
 
ऐसी कोई वजह नहीं है कि बोगी के भीतर और बाहर ये रंगीन डिब्बे विज्ञापनों से वंचित रहें। यह किराये से इतर रेलवे का राजस्व बढ़ाने का एक तरीका है। निश्चित तौर पर नीति इसकी इजाजत देती है। बहरहाल अगर एक कोच के बजाय पूरे रेक के मीडिया अधिकार बेचे जाएं तो यह अपेक्षाकृत आसान होता है। अक्सर कमी के चलते नए पुराने कोचों को मिलाकर रेक तैयार कर दिया जाता है। खासतौर पर उन ट्रेनों के लिए जो विशेष नहीं होते। इन ट्रेनों के रेक तय नहीं होते और इनके मीडिया अधिकार बेचना भी आसान नहीं होता। 
 
मरून रंग वाले कोच, नीले कोच की तुलना में पुराने होते हैं। कोच के नंबर से भी उसकी उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है। परंतु चूंकि यह नंबरिंग भी मानकीकृत नहीं होती है इसलिए इसे भी एकदम सटीक नहीं माना जा सकता।  शायद यह भी एक वजह है कि लोग कोचों पर अंकित संख्या को उतनी तवज्जो नहीं देते जितनी कि वे इंजन पर छपी संख्या को देते हैं। या फिर शायद लोग इंजन के प्रति कहीं अधिक आकर्षित होते हैं। कोच जितना पुराना होता है उस पर उसी हिसाब से चार, पांच या छह अंक लिखे होते हैं। 
 
मुझे लगता है कि अधिकांश कोचों पर अब तकरीबन पांच अंक अंकित होंगे। कुछ अपवाद के अलावा शुरुआती दो संख्याएं कोच के निर्माण का वर्ष बताती हैं। अपवाद यह है कि हो सकता है वह संख्या कोच के निर्माण के वर्ष के बजाय उसके एक जोन से दूसरे जोन में स्थानांतरण के बारे में बताए। यह भी संभव है कि वह निर्माण के बजाय उस वर्ष की जानकारी दे जब उसे दोबारा नए सिरे से बनाया गया हो।  उदाहरण के लिए नई दिल्ली-देहरादून शताब्दी एक्सप्रेस के एक कोच की संख्या है 04901। बहुत संभव है कि यह कोच 2004 में बना हो। परंतु 901 का क्या? अगर मैं गलत हूं तो भारतीय रेल से जुड़े लोग मुझे सही कर सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि यह इस जोन को मिला 901वां कोच होगा। 
 
कुछ दिन पहले एक विचित्र खबर आई। उसके मुताबिक नई दिल्ली और रांची के बीच चलने वाली राजधानी और संपर्क क्रांति एक्सप्रेस ट्रेनों के कोच यार्ड से लापता हैं। चोर छोटी-मोटी चीजें तो चुरा सकते हैं लेकिन बिना रेलवे की जानकारी के कोच कैसे चोरी हो सकते हैं? रेलवे सुरक्षा बल क्या कर रहा था? 12826 झारखंड संपर्क क्रांति एक्सप्रेस और 20839 रांची-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस का स्वामित्व दक्षिण पूर्व रेलवे के पास है।  12826 में आईसीएफ के कोच हैं और वह फिक्स्ड रेक नहीं है। 20839 में एलएचबी कोच हैं। परंतु मुझे शंका है कि यह भी फिक्स्ड कोच नहीं है। यह उन बड़ी राजधानी ट्रेनों में से एक नहीं है जिनके रेक फिक्स्ड रहते हैं। 
 
दक्षिण पूर्व रेलवे के चार डिवीजन हैं। उनमें से एक है रांची डिवीजन। जबकि अन्य हैं आद्रा, चक्रधरपुर और खडग़पुर। चूंकि ये कोच रखरखाव के लिए संबंधित यार्ड में नहीं गए थे इसलिए उनको रांची डिवीजन में ही होना चाहिए था ताकि उन्हें 12826 या 20839 में लगाया जा सके। ज्यादा विशिष्टï होकर बात करें तो रांची डिवीजन के बड़े यार्ड मुरी, रांची और हटिया में से भी इन्हें रांची यार्ड में होना चाहिए था। जाहिर सी बात है कि क्या रांची के यार्ड से कोच चोरी किए जा सकते हैंï? जाहिर है यह रिपोर्ट गलत है। कोई भी कोच न तो चोरी हुआ है न ही गायब हुआ। 
 
इसके उलट नंबर वाली ट्रेन भी तो हैं। उदाहरण के लिए 20840 नई दिल्ली रांची राजधानी का स्वामित्व उत्तर रेलवे के पास है। यानी 20839 के कोच जाने अनजाने 20840 के साथ खड़े थे। 12825/12826 ट्रेनों का मामला थोड़ा अलग है। यह ट्रेन रांची से आनंद विहार जाती है और इसके उलट। इस ट्रेन के दोनों रेक दक्षिण पूर्व रेलवे के पास है। दिल्ली में कई यार्ड हैं और ऐसे में कोचों का इधर-उधर हो जाना कोई मुश्किल बात नहीं। एक और बात, रांची में गैंग द्वारा कोच चोरी करने की बात कई जगहों पर आई। मुझे नहीं पता कि भारतीय रेल ने दिल्ली, दक्षिण पूर्व रेलवे या रांची डिवीजन ने इसका विरोध किया या नहीं। कम से कम औपचारिक रूप से तो ऐसा नहीं किया गया। इसलिए इस झूठी खबर ने भी एक छाप छोड़ दी। जनसंपर्क और मीडिया प्रबंधन के मामले में भारतीय रेल कभी भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं रहा। 
 
हालांकि अब इसमें काफी सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए रेलवे ने चार साल पर जो दस्तावेज जारी किया है वह शानदार है। इसके कवर पेज पर महात्मा गांधी का चित्र है जो एक टे्रन से उतर रहे हैं। इस ट्रेन का नंबर है 3985 (यह श्याम सुंदर आचार्य की एक पेंटिंग है)। भारत में महात्मा गांधी के टे्रन से उतरने की सबसे प्रसिद्घ तस्वीर शायद मोतिहारी की है। या यह 3985 की संख्या सही है। मुझे नहीं पता। 
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं)
Keyword: railway, coach, ranchi,,
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