बिजनेस स्टैंडर्ड - सार्वजनिक धन की लूट को कामयाबी बताने वाली कहानी
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सार्वजनिक धन की लूट को कामयाबी बताने वाली कहानी

देवाशिष बसु /  July 04, 2018

सार्वजनिक बैंकों के कर्ज में कमी और कर्मचारियों का हठधर्मी रवैया आने वाले समय में सरकार के सामने बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
महीने भर पहले जब भूषण स्टील का नियंत्रण टाटा स्टील के हाथों में आया तो सरकार के मंत्रियों और सलाहकारों ने इस बात को लेकर खूब अपनी पीठ थपथपाई कि करीब 65 फीसदी बकाये कर्ज की वसूली हो गई और केवल 35 फीसदी कर्ज ही बट्टïे खाते में डालना पड़ा। उस समय मैंने यह सुझाव दिया था कि फंसे हुए कर्जों का सफल दिवालिया समाधान कुछ भाग्यशाली कारकों पर निर्भर करेगा जिनमें कर्जदार कंपनी की परिसंपत्ति का आकार और उसकी गुणवत्ता तथा बाजार में अच्छे पूंजी आधार वाली कंपनियों की संख्या प्रमुख हैं। तेजी से बढ़ रहे इस्पात कारोबार के बीच भूषण स्टील को खरीदने की मंशा रखने वाली कंपनियों के लिए उसका विशाल स्थापित क्षमता आधार काफी बड़ा आकर्षण था। इसी तरह एस्सार स्टील पहले से स्थापित कंपनियों के लिए बेहद लुभावनी परिसंपत्ति साबित होगी और कर्जदाता बैंकों को भूषण स्टील से भी कहीं अधिक रकम अपने बकाया कर्ज के एवज में मिल सकती है। लेकिन इसके आधार पर कोई सामान्य निष्कर्ष निकालना और वसूली जाने वाली रकम के बारे में जोड़-घटाना करना एक गलती होगी।
 
अब एक अपेक्षाकृत बड़े मामले आलोक इंडस्ट्रीज का रुख करते हैं जिसका कर्ज समाधान पिछले हफ्ते ही हुआ है। कपड़ा बनाने वाली इस कंपनी के कर्ज समाधान के बाद किसी ने भी अपनी पीठ नहीं थपथपाई। इसकी वजह यह रही कि मामूली हेयरकट के लिए जरूरी स्थिति मौजूद नहीं थी, लिहाजा बहुत कम मात्रा में ही बकाया कर्ज वसूला जा सका। इस्पात कंपनियों की खरीद को लेकर तो मांग देखने को मिली थी लेकिन कपड़ा कंपनी की परिसंपत्तियां खरीदने की इच्छा रखने वाली कंपनियां बहुत कम थीं। सच तो यह है कि कोई भी कपड़ा कंपनी इस कर्जदार कंपनी की परिसंपत्ति नहीं खरीदना चाहती थी। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) और जेएम फाइनैंशियल ऐसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी के एक अजीबोगरीब कंसोर्टियम ने इस कंपनी के लिए इकलौती बोली लगाई थी। आरआईएल के पास अपने दम पर ही पर्याप्त धन है, लिहाजा उसे जेएम की जरूरत ही नहीं थी जबकि जेएम किसी कपड़ा मिल का परिचालन नहीं कर सकती। ऐसे में इन दोनों का साथ आना अपने आप में एक रहस्य है। बहरहाल आलोक इंडस्ट्रीज के लिए इस कंसोर्टियम ने केवल 50 अरब रुपये की बोली लगाई जिसमें से कर्जदाताओं को करीब 47 अरब रुपये मिलने वाले थे। लेकिन आलोक इंडस्ट्रीज पर इन बैंकों का 296 अरब रुपये का कर्ज था। इस तरह सार्वजनिक क्षेत्र के इन दिग्गज वित्तीय संस्थानों को करीब 84 फीसदी कर्ज बट्टे खाते में डालने के लिए मजबूर होना पड़ा है। भूषण स्टील के मामले की तुलना में यह स्थिति बिल्कुल अलग है। आलोक इंडस्ट्रीज के कर्ज समाधान से संबंधित कुछ कड़वे सच हैं जो दूसरी कर्जदार फर्मों के लिए भी सही हो सकते हैं:
 
जेएम-आरआईएल गठजोड़ इस मामले में बोली लगाने वाला इकलौता समूह था और उसने कर्जदाताओं की समिति (सीओसी) के समक्ष अप्रैल में जो पेशकश रखी थी वह 'स्वीकार करो या रहने दो' वाली ही थी। सीओसी की बैठक में इस समाधान योजना पर कार्रवाई के लिए पर्याप्त मत नहीं जुटाए जा सके थे। योजना की स्वीकृति के लिए 75 फीसदी मत अनिवार्य थे जबकि केवल 70 फीसदी मत ही मिले। हालांकि एक अध्यादेश के जरिये ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधन कर सीओसी बैठक में जरूरी मत को 75 फीसदी से घटाकर 66 फीसदी कर दिया गया। इस संशोधन के बाद आलोक इंडस्ट्रीज के कर्मचारियों और कर्जदाताओं के एक समूह ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) से जेएम-आरआईएल की पेशकश को स्वीकार करने की दरखास्त की। उसके बाद एनसीएलटी ने आलोक इंडस्ट्रीज मामले में समाधान पेशेवर नियुक्त किए गए अजय जोशी को नए सिरे से मतदान प्रक्रिया पूरी कराने का निर्देश दिया। इस फिक्स्ड मैच के बाद इकलौती बोली को स्वीकार कर लिया गया। कई दूसरी ऋणग्रस्त परिसंपत्तियां भी इस राह पर जा सकती हैं। इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स मामले में कर्जदाताओं को 60 फीसदी का जोरदार नुकसान उठाना पड़ा था क्योंकि वेदांत ने केवल 53.20 अरब रुपये की ही बोली लगाई थी जबकि इलेक्ट्रोस्टील पर 131.75 अरब रुपये का कर्ज बकाया था। वैसे ये सभी बड़े मामले हैं और इनकी सार्वजनिक समीक्षा की जा सकती है। 
 
फंसे कर्ज के समाधान की कहानी का एक अनजाना पहलू यह है कि बैंकरों, अंकेक्षकों और प्रवर्तकों के बीच गहरा गठजोड़ है जो किसी भी ईमानदार समाधान पेशेवर की गंभीर कोशिशों को पलीता लगा सकता है। बैंकिंग, बीमा एवं प्रतिभूति बाजार के नियामकों की नाकामी बहुत जल्द दिवालिया कानून को भी कमतर करना शुरू कर देगी। यह महज अटकलबाजी नहीं है, पहले से ही ऐसा हो रहा है। कम-से-कम ईमानदार समाधान पेशेवरों को तो हरेक खराब मामले में यह पता लगने लगा है कि प्रवर्तकों ने बैंकरों एवं अंकेक्षकों की मौन सहमति से कर्ज की रकम का बड़ा हिस्सा दूसरी कंपनियों में स्थानांतरित कर दिया है। इस तरह के अधिकांश मामलों में जब समाधान पेशेवरों ने नकेल कसनी शुरू की, प्रवर्तकों को किए जाने वाले भुगतान में कटौती और फंड लीक पर रोक लगाई तो उन्हें उस कंपनी के मालिकों और बैंक अधिकारियों के ही प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। कुछ छिटपुट मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक समाधान पेशेवरों को यह भी पता चला है कि बिना किसी परिसंपत्ति आधार के ही कंपनियों को कर्ज दे दिए गए थे। ऐसा बैंकिंग व्यवस्था में गहराई तक पैठ बना चुके भ्रष्टाचार की ही वजह से संभव हो सकता है। बैंकों की शाखाओं से लेकर क्षेत्रीय कार्यालय और उससे भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं है कि मुंबई के एक समाधान पेशेवर राजेंद्र गनात्रा का अनुमान है कि फंसे कर्जों की औसतन वसूली महज 10-15 फीसदी ही रहेगी।
 
दरअसल फंसे कर्ज की वसूली की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और कंपनियों के प्रवर्तकों के बीच बने गठजोड़ को तोडऩे के लिए कोई कदम नहीं उठाती है। बैंकरों को अपने दिए गए कर्ज का 84 फीसदी हिस्सा बट्टे खाते में डालने के लिए किसी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ता है। इसका मतलब है कि फंसे कर्जों के मौजूदा स्तर से भविष्य में इसी तरह के मामलों में बढ़ोतरी ही होगी। या फिर सार्वजनिक बैंक कर्ज बांटने में भारी कटौती करने लगेंगे।  सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक बैंकों का सिकुड़ता कर्ज आवंटन और उसके कर्मचारियों का हठी रवैया सरकार के लिए कहीं बड़ी चुनौती पेश करेगा? इस दौरान कंपनियों को कर्ज के तौर पर दिए गए अरबों रुपये के सार्वजनिक धन को बैंकरों की मिलीभगत से प्रवर्तक लूटते रहेंगे और उसे बट्टे खाते में डाला जाता रहेगा। विडंबना यह है कि उसे भी एक सफलता के तौर पर पेश किया जाएगा। 
 
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं)
Keyword: bank, loan, debt, RBI, भूषण स्टील नियंत्रण टाटा स्टील,
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