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समर्थन मूल्य बढऩे से कृषि जिंसों के निर्यात पर होगा असर

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली July 04, 2018

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय कपास और चावल की प्रतिस्पर्धी क्षमता कम होने के आसार
सरकार लागत से 50 फीसदी अधिक एमएसपी की बना रही है योजना
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कपास और चावल के दाम गिरने पर भारत से निर्यात होगा प्रभावित
इस समय भारतीय और अमेरिकी कपास की कीमतों में अंतर है 18 फीसदी

केंद्र सरकार विपणन सीजन 2018-19 के लिए प्रमुख खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी करने की योजना बना रही है। इससे चावल और कपास जैसी जिंसों की निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धी क्षमता पर असर पडऩे के आसार नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ समय से इन दोनों जिंसों की मांग अनुकूल वैश्विक स्थितियों की वजह से बढ़ी है।

ज्यादातर विशेषज्ञों और बाजार पर नजर रखने वाले लोगों का मानना है कि तत्काल भारतीय कपास और चावल के निर्यात या निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इन जिंसों के दाम वर्तमान स्तरों से नीचे आते हैं तो भारत से इनका निर्यात प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएगा।

इससे किसानों की आय में कमी आएगी, जिसमें पहले ही पिछले कुछ वर्षों के दौरान सुस्त वृद्धि रही है। मध्यम आकार के कपास की किस्म का एमएसपी वर्ष 2017-18 के लिए 4,020 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि लंबे आकार वाले कपास का एमएसपी 4,320 रुपये प्रति क्विंटल है। यह बीते वर्षों में तय किए गए एमएसपी से क्रमश: 4.1 फीसदी और 3.8 फीसदी कम था।

हालांकि आधिकारिक रूप से अभी कोई घोषणा नहीं की गई है। लेकिन ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि अगर केंद्र वास्तविक लागत एवं पारिवारिक श्रम की आकलित लागत से 50 फीसदी अधिक एमएसपी के अपने वादे पर कायम रहता है तो सीजन 2018-19 में मध्यम आकार के कपास का नया एमएसपी करीब 5,100 रुपये प्रति क्विंटल होगा। वहीं लंबे कपास का एमएसपी 5,400 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास तय होगा।

कारोबारी सूत्रों ने कहा कि अगर कपास का समर्थन मूल्य करीब 5,450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया जाता है तो यह अमेरिकी कपास के अंतरराष्ट्रीय दामों से कम होगा। अमेरिकी कपास के दाम 145 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम हैं, जबकि भारतीय कपास के दाम करीब 132 से 135 रुपये प्रति किलोग्राम होंगे।

घरेलू बाजारों में कपास के दाम पिछले कुछ महीनों के दौरान तेजी से बढ़े हैं। इसकी वजह अच्छी वैश्विक मांग और बुआई को लेकर कुछ चिंताएं हैं। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने हाल में एक नोट में कहा है कि घरेलू कपास के दाम हाल के महीनों में बढ़े हैं, जिससे लघु अवधि में घरेलू कताई क्षेत्र के मुनाफे में इजाफा होगा।

शंकर6 किस्म के दाम इस साल मार्च-अप्रैल में 115 रुपये प्रति किलोग्राम थे, जो जून में बढ़कर 134 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गए हैं। इसके नतीजतन वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही में शुरू हुआ मुनाफे में सुधार का रुझान वित्त वर्ष 2019 की पहली छमाही में रफ्तार पकडऩे के आसार हैं। वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही से पहले की दो तिमाहियां कमजोर रही थीं।

इक्रा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और समूह प्रमुख (कॉरपोरेट क्षेत्र रेटिंग) जयंत राय ने कहा, 'यह सुधार अच्छा स्टॉक रखने वाली कताई कंपनियों के लिए और ज्यादा रहने के आसार हैं। ये कंपनियां दिसंबर, 2017 में कपास का भंडार तैयार करने में सफल रहीं। उस समय घरेलू कपास के दाम कुछ समय के लिए गिर गए थे। इससे उनकी कच्चे माल की औसत लागत कम हुई है।'

इक्रा के मुताबिक कपास के अंतरराष्ट्रीय दामों में भारी बढ़ोतरी हुई है। ये मई, 2018 में समाप्त छह महीने की अवधि के दौरान चार वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं। इसकी वजह यह है कि चीन में कपास की मांग बढ़ रही है और वैश्विक स्तर पर कपास की आपूर्ति मांग से कम होने की संभावनाओं से सटोरिया खरीदारी हो रही है। 

इक्रा ने कहा, 'जून, 2018 के अंतिम सप्ताह में कीमतें स्थिर हुई हैं। इससे पहले जून के कुछ सप्ताह में कीमतें 5 से 6 फीसदी बढ़ी थीं। इस वजह से कीमतें अब भी सालाना आधार पर 10 फीसदी ऊंची हैं।'

रेटिंग एजेंसी ने कहा कि इसके विपरीत भारतीय कपास की कीमतों में बढ़ोतरी जनवरी से मई, 2018 के दौरान धीमी रही है क्योंकि स्पिनरों ने फसल की कटाई के समय ही पर्याप्त भंडारण कर लिया था। इसके चलते कपास की भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अंतर बढ़कर 18 फीसदी पर पहुंच गया है, जो आम तौर पर 2 से 5 फीसदी होता है।

हालांकि यह देखना होगा कि यह देखना होगा कि आने वाले महीनों में यह अंतर कितना बना रहता है। दरअसल आगे भारत में कपास की कीमतें बढऩे के आसार हैं, जबकि वैश्विक कपास बाजारों में कीमतें वर्तमान स्तरों से नीचे गिरने की संभावना है। अगर ऐसा हुआ तो भारतीय कपास की निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता को लेकर सवाल पैदा हो जाएगा। दिल्ली की एक अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग कंपनी के एक प्रतिनिधि ने कहा, 'अगर भारतीय कपास निगम (सीसीआई) किसानों को राहत देने के लिए नए एमएसपी पर अपनी खरीद बढ़ाता है तो घरेलू बाजार पर भी बुरा असर पड़ेगा।'

चावल के मामले में भी यही स्थिति है। अगर यह मानकर चलते हैं कि सामान्य किस्म के चावल का एमएसपी 2018-19 के लिए 200 रुपये बढ़ाकर 1,750 रुपये प्रति क्विटंल किया जाता है तो कांडला बंदरगाह से इसकी फ्रेट ऑन बोर्ड कीमत करीब 400 से 410 रुपये प्रति टन हो जाएगी। विश्व बैंक के मुताबिक मई में थाईलैंड के 25 फीसदी टूटे हुए चावल की औसत वैश्विक कीमत करीब 436 डॉलर प्रति टन थी, जबकि 5 फीसदी टूटा हुए इसी चावल के दाम करीब 450 डॉलर प्रति टन थे।

इसका मतलब है कि अभी भारतीय गैर-बासमती चावल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजारों के मुकाबले थोड़े कम हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उतार-चढ़ाव होता रहता है, इसलिए यह अंतर थोड़े ही समय रह सकता है। एक जाने-माने खाद्य नीति विशेषज्ञ तेजिंदर नारंग ने कहा, 'एमएसपी में बढ़ोतरी से भारत के गैर-बामसती चावल की प्रतिस्पर्धी क्षमता लघु अवधि में प्रभावित नहीं होगी। विशेष रूप से पश्चिम एशिया को निर्यात होने वाले चावल की। लेकिन अफ्रीकी देशों को होने वाले निर्यात पर असर पड़ सकता है।'

उन्होंने कहा कि ऊंचे एमएसपी से सरकार पर भी वित्तीय बोझ बढ़ेगा। अगर सरकार ने अपनी सालाना खरीद में भारी बढ़ोतरी नहीं की तो निर्यातकों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। निर्यातकों पर असर तभी होगा, जब सरकार अपनी सालाना खरीद 3.3-3.4 करोड़ टन से बढ़ाकर करीब 4.5 करोड़ टन करती है। 

 

Keyword: central govt, msp, Agri product, Minimum Support price, MSP, चावल, कपास, जिंस, अंतरराष्ट्रीय बाजार,,
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