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बैंकों की समस्या के हल में सरकार ही करे मदद

जैमिनी भगवती /  July 03, 2018

फंसे कर्ज के मामले अंतहीन विवादों में उलझ गए हैं। इस कानूनी विलंब को कम करने के लिए एनसीएलटी और एनसीएलएटी की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। बता रहे हैं जैमिनी भगवती 

देश में लंबी अवधि के निवेश के लिए उच्च ऋण यकीनन वृद्धि दर को बढ़ावा देगा। मार्च 2010 और 2011 के अंत में सरकारी क्षेत्र के बैंकों की ऋण वृद्धि सालाना आधार पर क्रमश: 19.9 और 21.5 फीसदी थी। निजी बैंकों के तुलनात्मक आंकड़े 12.9 फीसदी और 23.9 फीसदी थे। मार्च 2017 तक सरकारी बैंकों की ऋण वृद्धि घटकर 1.5 फीसदी रह गई थी लेकिन मार्च 2018 तक वह सुधरकर 5 फीसदी हो गई।

 

निजी बैंकों के लिए वर्ष 2017 और 2018 में यही आंकड़ा क्रमश: 17.3 फीसदी और 22 फीसदी था (स्रोत: 26 जून, 2018 को जारी आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट)। बहरहाल निजी बैंकों के ऋण का बकाया सरकारी बैंकों की तुलना में बेहद कम है और यह अधिकांशत: अल्पावधि की कार्यशील पूंजी और उपभोक्ता ऋण आदि है। इस्पात, बिजली और सीमेंट परियोजनाओं जैसी लंबी अवधि के लिए यह ऋण कम ही है। 


निजी क्षेत्र को नया ऋण केवल फंड की उपलब्धता पर निर्भर नहीं है। बैंकों को यह यकीन दिलाना पड़ रहा है कि कॉर्पोरेट कर्जदारों के ऋण की गुणवत्ता स्वीकार्य स्तर की है और उन्हें लगना चाहिए कि उनके उत्पादों और सेवाओं की मांग में सुधार का परिदृश्य है। फिलहाल तो कई प्रमुख भारतीय कंपनियों के लिए यह मुश्किल है क्योंकि उनका ब्याज कवरेज अनुपात नए ऋण के अनुरूप नहीं। वर्ष 2009 से 2014 के बीच जो उच्च ऋण बंटा वह आज फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो चुका है। कुल अग्रिम के फंसे हुए कर्ज में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी सितंबर 2017 के अंत तक 13.5 फीसदी थी। मार्च 2018 के अंत तक सरकारी बैंकों का कुल फंसा हुआ कर्ज 15.6 फीसदी तक पहुंच गया।

नीरव मोदी का मामला जिसमें पंजाब नैशनल बैंक के साथ 130 अरब रुपये की धोखाधड़ी हुई, उसमें यह बात एकदम विचित्र है कि एक धोखेबाज अधिकारी ने कुछ अन्य के साथ मिलकर बैंक के वरिष्ठ प्रबंधन और अंकेक्षकों को सात वर्ष तक बेवकूफ बनाया। पीएनबी की यह बात भी भरोसे लायक नहीं लगती कि उसने नवंबर 2016 में आरबीआई के ये निर्देश नहीं मिले कि उसे अपने जोखिम प्रबंधन तंत्र और कोर बैंकिंग व्यवस्था में सुधार करना है।

 

इन दावों की प्रकृति और इनके प्रत्युत्तर में किए गए दावों को देखते हुए वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग को संसद के समक्ष एक स्पष्टीकरण पेश करना चाहिए और बड़े आकार के फंसे हुए कर्ज के मामलों की सूची प्रस्तुत करते हुए यह बताया जाना चाहिए कि ये निस्तारण की प्रक्रिया में या अदालत अथवा वसूली के मामले में फिलहाल किस स्तर पर हैं।


आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक चंदा कोछड़ इन दिनों स्वैच्छिक अवकाश पर हैं क्योंकि आरोप है कि उनके पति आईसीआईसीआई बैंक द्वारा वीडियोकॉन को दिए गए ऋण के मामले में लाभान्वित हुए। वीडियोकॉन समूह के प्रवर्तक वेणुगोपाल धूत हैं और इस समूह की कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं। कुल 200 अरब रुपये के ऋण में आईसीआईसीआई बैंक ने वीडियोकॉन को 35 अरब रुपये का ऋण दिया। खबरों के मुताबिक इस ऋण के बदले वीडियोकॉन ने कोछड़ के पति की कंपनियों में निवेश किया और फिर कोछड़ दंपती को अत्यधिक मुनाफा पहुंचाने वाले मूल्यांकन के साथ समूह उन कंपनियों से बाहर हो गया। पिछले दिनों आईसीआईसीआई के बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्रीकृष्ण से कहा कि वे कोछड़ के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करें कि क्या उनके पति को अवैध तरीके से वित्तीय लाभ हुए। धूत इस मामले में सह अपराधी नहीं हो सकते। अब तक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने वीडियोकॉन समूह को पर्याप्त नियामकीय निगरानी में नहीं डाला है।

व्यापक परिदृश्य में देखें तो 12 फरवरी, 2018 को आरबीआई ने बैंकों के लिए यह जरूरी कर दिया कि वे दिशानिर्देश के मुताबिक ऋण को अलग विशेष उल्लेख वाले खाते में दिखाएं। बैंकों से कहा गया कि वे तय तारीख के एक दिन बाद ब्याज या मूलधन न चुकाए जाने पर इसका उल्लेख विशेष उल्लेख खातों में करें। वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के अनुसार आरबीआई के हालिया दिशानिर्देश के बाद बैंकों को केवल उन ऋण को भी फंसे हुए कर्ज के रूप में दिखाना होगा जिनके भुगतान में एक दिन की भी देरी हुई है। वित्त मंत्रालय का सुझाव है कि आरबीआई को बैंकों को पहले दिन से बकाया भुगतान को चिह्नित करने की आवश्यकता नहीं है। आरबीआई के निर्देशों को गलत समझा गया है क्योंकि भारतीय बैंकों से बकाया भुगतान को पहले दिन से चिह्नित करने को कहा गया है और यह मानक बैंक ऑफ इंगलैंड और अमेरिका के फेडरल रिजर्व के मानकों के अनुरूप ही है।

बैंकिंग क्षेत्र के बढ़ते फंसे हुए कर्ज पर सरकार का कहना है कि वह अपनी तरफ से हरसंभव प्रयास कर रही है। यह सच है कि मौजूदा सरकार के प्रयासों से ही ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता सामने आ सकी। इसके अलावा भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड, राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट और राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपीलीय पंचाट भी दिन रात काम कर रहे हैं ताकि संबंधित मामलों को निपटाया जा सके। 

कोई निस्तारण या ऋण वसूली प्रक्रिया किन हालात से गुजर सकती है इसका उदाहरण हमें कई जगह देखने को मिला। एस्सार स्टील का मामला जो कंपनी लॉ अपीलीय पंचाट के पास लंबित है और इसके लिए बोली लगाने वालों आर्सेलर मित्तल और एस्सार स्टील के प्रवर्तकों को ऋणदाता समिति ने चुने जाने के अयोग्य घोषित कर दिया है। उसके मुताबिक उन्होंने आईबीसी के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। दूसरा मामला अल्ट्राटेक सीमेंट और डालमिया भारत द्वारा बिनानी सीमेंट के लिए बोली लगाने का है। यहां बैंक ऋणदाताओं पर आरोप लगा कि वे अल्ट्राटेक की ऊंची बोली का सहयोग कर रहे हैं। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।

फंसे कर्ज के कई अन्य मामले मूल्यांकन-निस्तारण-वसूली और अदालतों में अंतहीन विवादों में उलझे हुए हैं। कानूनी विलंब को कम करने के लिए अतिरिक्त 5 एनसीएलटी और 2 एनसीएलएटी की आवश्यकता है। इन अतिरिक्त एनसीएलटी और एनसीएलएटी के पीठों पर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को नियुक्त किया जा सकता है। 

यदि बैड बैंक स्थापित किया जाता तो समस्याएं बैंकों की बैलेंस शीट से हटकर बैड बैंक में चली जातीं। उसके बाद वह करदाताओं की लागत पर उसका निपटान करता। सरकार के लिए बेहतर यही है कि वह सरकारी बैंकों को इस समस्या से निपटने में मदद करे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकार स्वयं सरकारी बैंकों के साथ अलग तरह के बरताव की भागी होगी और भारी भरकम कर्ज की वसूली की प्रक्रिया में करदाताओं को कीमत चुकानी होगी।
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