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फिसलता एफडीआई

संपादकीय /  July 03, 2018

हाल में आई कई रिपोर्टों ने पुष्टि की है कि देश में विदेशी निवेश के मामले में सब-कुछ ठीक नहीं चल रहा है। खास तौर पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की स्थिति खराब है। इसे अन्य पूंजीगत निवेश पर तवज्जो दी जाती रही है क्योंकि यह उत्पादक आधार में सीधे इजाफा करता है, यह लंबी अवधि के लिए आता है और इसकी प्रकृति में स्थिरता होती है। यह पोर्टफोलियो निवेश से उलट होता है।

 

औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग (डीआईपीपी) के मुताबिक वर्ष 2017-18 में एफडीआई की वृद्घि दर पांच साल के निचले स्तर पर है। उस वर्ष एस्सार द्वारा रोसनेफ्ट की 13 अरब डॉलर की बड़ी खरीद के बावजूद यह महज तीन फीसदी बढ़कर 44.85 अरब डॉलर हुआ। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास आयोग (अंकटाड) की एक रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 में देश में एफडीआई में गिरावट आई और यह पिछले साल के 44 अरब डॉलर के बजाय 40 अरब डॉलर रह गया। इस बीच अंकटाड ने कहा है कि देश से बाहर जाने वाले एफडीआई की तादाद दोगुनी हो गई है। 


मौजूदा सरकार अक्सर देश को निवेश के अनुकूल बनाने की बात करती रही है। वह एफडीआई में बढ़ोतरी को अपनी सफलता का संकेतक बताती रही है। परंतु अब उसकी यह उपलब्धि बदलती नजर आ रही है। निश्चित तौर पर वर्ष 2018 में विदेशी न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में कम रुचि ले रहे हैं बल्कि भारतीय कंपनियों और पूंजी धारकों में भी उत्साह कम नजर आ रहा है। एफडीआई के देश से बाहर जाने के आंकड़े तो यही बताते हैं। 

सरकार इस रुझान के लिए वैश्विक कारकों को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहरा सकती। अंकटाड का कहना है कि वैश्विक एफडीआई में गिरावट अवश्य आ रही है और यह स्थिति विकसित देशों के लिए चिंता का कारण भी है। उन देशों में  विलय एवं अधिग्रहण के मामलों में भी कमी आई है। परंतु विकासशील देशों में एफडीआई की आवक स्थिर बनी रही। चीन की बात करें तो वहां 2017 में एफडीआई बढ़कर 136 अरब डॉलर हो गया। प्रधानमंत्री ने कई बार जोर दिया है कि भारत दुनिया की सबसे खुली अर्थव्यवस्था वाला देश है। फिर भी वह एफडीआई में उस स्तर की स्थायी बढ़ोतरी के लिए संघर्ष ही कर रहा है जिसने सन 1990 और 2000 के दशक में चीन की वृद्घि को गति प्रदान की। 

यह भी इस बात की ओर स्पष्टï संकेत करता है कि सरकार ने गहन ढांचागत सुधारों को बहुत जल्दी तिलांजलि दे दी। देश में चाहे कोई भी सरकार हो उसके पास सुधारों की राह छोडऩे का कोई विकल्प नहीं है। खास तौर पर देश के विकास के मौजूदा दौर में भूमि और श्रम जैसे कारक बाजारों में सुधार। कारोबारी सुगमता को लेकर सरकार का प्रदर्शन सराहनीय रहा है। इससे संबंधित रैंकिंग में देश ने उल्लेखनीय सुधार किया है। फिर भी अभी जमीन पर काफी प्रयास करने की आवश्यकता है। केवल रैंकिंग में सुधार से बात ही नहीं बनेगी। इसके अलावा अगर विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई पर लगने वाली सीमा भी बढ़ा दी जाए तो विदेशी निवेशकों के लिए प्रक्रियाएं कहीं अधिक आसान हो सकती हैं।  

विदेशी निवेश संवद्र्घन बोर्ड के खात्मे के बाद प्रक्रियाओं के सहज होने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। भारत को अपनी आर्थिक क्षमता और पूंजी जुटाने की काबिलियत को लेकर दंभ नहीं पालना चाहिए। उसे अंतरराष्टï्रीय मध्यस्थता का सम्मान करना चाहिए। विदेशी निवेश में बड़ी और स्थायी वृद्घि के बगैर देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव लाना और श्रम शक्ति में शामिल होने वाले लाखों लोगों को रोजगार देना असंभव है।
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