बिजनेस स्टैंडर्ड - पनबिजली परियोजनाओं की बहाली पर जोर
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पनबिजली परियोजनाओं की बहाली पर जोर

श्रेया जय / शिमला July 03, 2018

पानी के संकट से जूझ रहे शिमला में विभिन्न राज्यों के बिजली मंत्री बिजली क्षेत्र के संकट पर चर्चा के लिए जुटे। हिमाचल प्रदेश ने पनबिजली क्षेत्र में तत्काल और दीर्घावधि सुधार की मांग की। इसके अलावा पनबिजली उत्पादन करने वाले अन्य राज्यों ने भी सरकार से कहा कि पनबिजली पर भी उसी तरह दर्जा, प्राथमिकता और ध्यान दिया जाना चाहिए, जैसा सौर ऊर्जा को मिल रहा है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा, 'वर्षों से हिमाचल के लोग अपनी जमीन और श्रम राज्य के पनबिजली क्षेत्र के विकास में लगा रहे हैं। उन्हें पैतृक जमीन से हटाए जाने का दर्द अभी भी है। हम केंद्रीय एजेंसियों से अनुरोध करते हैं कि मुआवजा बढ़ाया जाए।' 

राज्यों के बिजली मंत्रियों के द्विवार्षिक सम्मेलन में बोलते हुए ठाकुर ने कहा कि राज्य में 27,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता है, लेकिन संसाधनों की कमी की वजह से सिर्फ 653 मेगावॉट क्षमता के संयंत्र लगाए गए हैं। उन्होंने कहा, 'पनबिजली क्षेत्र को सौर ऊर्जा की ही तरह प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस क्षेत्र में पनबिजली खरीद बाध्यता का प्रावधान की जरूरत है, जिससे इसकी बिक्री सुनिश्चित हो सके। इसके अलावा मध्यावधि खरीद समझौते, अक्षय ऊर्जा का दर्जा दिया जाना वक्त की जरूरत है। हम केंद्र से मांग करते हैं कि वह इन पर विचार करे।' ऐसे समय में जब ताप बिजली संयंत्र कोयले की कमी से जूझ रहे हैं और अक्षय ऊर्जा क्षमता का तेजी से विस्तार हो रहा है, ऐसे में ग्रिड संतुलन बरकरार रखने के लिए पनबिजली से संतुलन स्थापित करने की जरूरत है। 

केंद्रीय बिजली मंत्री आरके सिंह ने कहा कि नई पनबिजली नीति जल्द तैयार की जाएगी। अन्य देशों के विपरीत भारत में पनबिजली को अक्षय ऊर्जा नहीं माना जाता है, भले ही संयंत्र की उत्पादन क्षमता 50 मेगावॉट से कम हो। सिंह ने कहा, 'सभी विकसित देशों की पनबिजली क्षमता खत्म हो रही है। पिछले कुछ साल के दौरान विरोध प्रदर्शन और भौगोलिक चुनौतियों की वजह से पनबिजली परियोजनाएं अटक गई हैं। पनबिजली परियोजनाएं शुरू होने में अगर देरी होती है तो उसकी लागत बहुत बढ़ जाती है।' 

मंत्री ने कहा कि नई नीति में पनबिजली परियोजनाओं की पूंजीगत लागत कम करने की राह होगी। एक प्रस्ताव यहह है कि 10-12 साल के लिए बिजली की मुक्त बिक्री अनिवार्य कर दी जाए, जिससे परियोजना डेवलपर अपनी लागत निकाल सके। नीति में 30 साल की दीर्घावधि के लिए सस्ते कर्ज का भी प्रस्ताव है। इससे पनबिजली संयंत्रों की बिजली के दाम भी कम होंगे। उन्होंने कहा कि यह नीति कैबिनेट सचिवालय में लंबित है। 

बिजली उत्पादन में संतुलन बनाने की बात से सहमति जताते हुए सिंह ने भी माना कि कोयले का संकट बहुत ज्यादा है। उन्होंने कहा, 'बिजली की मांग बढ़ी है और इससे आर्थिक वृद्धि के संकेत मिलते हैं। कोयले का संकट अगले 2-3 साल तक बना रहेगा क्योंकि खनन और मंजूरियों में समय लगता है। ऐसे में हमने सभी राज्यों से कहा है कि अगर वे कमी महसूस करते हैं तो कोयले का आयात करें।'  
उत्तराखंड सरकार के अधिकारियों ने अलग से बातचीत में भी हिमाचल की मांग से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को पनबिजली पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के मामले पर फिर से विचार करने की जरूरत है। बिजली विभाग के एक अधिकारी ने कहा, 'हमने हाल में निर्देश दिए हैं कि परिचालन वाले संयंत्रों और निर्माणाधीन संयंत्रों के प्रदूषण का स्तर 15 प्रतिशत से नीचे होना चाहिए। हमें करीब 1 अरब रुपये राजस्व का नुकसान हो रहा है, लेकिन इससे दीर्घावधि के हिसाब से पर्यावरण को बल मिलेगा। हम बिजली, जल संसाधन एवं वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुरोध करते हैं कि वे नीति तैयार करें कि पनबिजली परियोजनाओं में प्रदूषण से कैसे बचा जा सकता है।' 

भाजपा सरकार के चुनावी वादों में से एक वादा निर्मल, अविरल गंगा का था। ऐसे में किसी भी बांध के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। उत्तराखंड के अधिकारी ने कहा कि दिशानिर्देशों की वजह से 4,000 मेगावॉट क्षमता की परियोजना अटक गई है और राज्य को इस साल गर्मी में 10 अरब रुपये की बिजली खरीदनी पड़ी है। 

26 राज्यों में से 18 राज्यों के बिजली मंत्रियों और 29 वरिष्ठ अधिकारियों की खिदमत कर रहे शिमला और कुफ री में पानी संकट के कोई संकेत नहीं मिले। तेज बारिश में हवाई यातायात बाधित होने की वजह से कुछ मंत्री सम्मेलन में नहीं आ सके। 
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