बिजनेस स्टैंडर्ड - उपलब्धियों एवं भविष्य के लिए सीख का साल
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उपलब्धियों एवं भविष्य के लिए सीख का साल

मुकेश बुटानी और तरुण जैन /  July 02, 2018

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू हुए एक साल पूरा हो चका है।  इस दौरान देश नई कर प्रणाली को लेकर व्याप्त अनिश्चितता और संदेह के माहौल से निकलने में काफी हद तक सफल रहा है। मीडिया में की जा रही तमाम आलोचनाओं के बावजूद केंद्र और राज्यों के वित्त मंत्रियों ने अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को लागू करने में वाकई में भागीरथ प्रयास किया है। जीएसटी परिषद की बैठकों में आम सहमति से किए गए फैसलों ने इस ऐतिहासिक सुधार के लिए मजबूत बुनियाद तैयार की। 

पुरानी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की जटिलताओं के साथ केंद्र, राज्य एवं स्थानीय अधिकारियों की तरफ से लगाए जाने वाले विभिन्न शुल्कों के चलते कारोबारियों एवं उद्यमियों को अनुपालन संबंधी दिक्कतों और उपभोक्ताओं को करों के चलते बढ़े बोझ का सामना करना पड़ता था। पहले कारोबार का भौतिक हिस्सा करारोपण से बच निकलता था क्योंकि पूरी व्यवस्था ही खामियों और कामचलाऊ इंतजामों से भरी होती थी। उसके स्थान पर पूरे देश में एकसमान कर प्रणाली को लागू करना निस्संदेह देश को एक साझा बाजार में तब्दील करने की दिशा में उठाया गया आंदोलनकारी कदम है। सभी राज्यों ने एक सुर में काम किया और केंद्र ने भी समयबद्ध तरीके से क्षतिपूर्ति आवंटन का अपना वादा पूरा किया, वह 'सहकारी संघवाद' की भावना को परिलक्षित करता है। नीति-निर्माण में दखल रखने वाले दबाव समूहों को देखते हुए ऐसी उपलब्धि के बारे में सोच पाना भी मुश्किल था लिहाजा इसी आधार पर जीएसटी के पहले साल को उल्लेखनीय माना जा सकता है। 

जीएसटी प्रणाली की स्वीकार्यता को इसी से आंका जा सकता है कि उपभोक्ता एवं सरकार दोनों ही अब पेट्रोलियम उत्पादों को भी इसके दायरे में लाने के मसले पर चर्चा कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो कारोबार जगत एवं सरकार दोनों की ही क्षमता सुधारने में काफी मदद मिलेगी। इसे जीएसटी प्रणाली की कामयाबी के अगले मील के पत्थर के तौर पर देखा जा रहा है। जीएसटी राजस्व संग्रह में लगातार वृद्धि का रुझान राज्यों की चिंताओं को कम करता है। ऐसी सूरत में जीएसटी परिषद के पास पेट्रोलियम उत्पादों, बिजली और रियल एस्टेट खरीद को कर दायरे से बाहर रखने पर पुनर्विचार करने का वाजिब मौका है। उम्मीद है कि आने वाले साल में जीएसटी परिषद के विचार का यह प्रमुख बिंदु होगा।

जहां नीतिगत परिप्रेक्ष्य में ठीकठाक बदलाव की जरूरत है वहीं शुरुआती महीनों में तकनीकी खामियों के चलते प्रतिकूल असर पड़ा। जीएसटी नेटवर्क के ठीक से काम नहीं करने की वजह से कई महीनों तक रिटर्न भरने की तारीखों को बढ़ाना पड़ा। जीएसटी प्रणाली के तहत अंतरराज्यीय कारोबार में कर वंचना रोकने के लिए अहम ई-वे बिल व्यवस्था को भी अब लागू किया जा रहा है। लेकिन जीएसटीएन की अक्षमता के ही चलते ई-वे बिल व्यवस्था को टुकड़ों में लागू करना पड़ा है।
 
शुरुआती महीनों में कारोबार जगत को काफी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा। बड़े पैमाने पर उत्पादों को अंतर-राज्य आवाजाही में जोड़ा गया था और स्थानीय अधिकारियों ने अस्थिर रवैया अपनाते हुए माल जब्त भी कर लिया। इस तरह की जब्तियों को अदालतों में चुनौती देने के भी काफी मामले सामने आए। इन मामलों में अदालतों के रवैये से यही पता चलता है कि कर चोरी रोकने की अतिवादी चाह के चलते कर अधिकारी भी समान रूप से दोषी थे। इसी तरह कारोबारी भी नए कर कानून के मुताबिक जरूरी दस्तावेज नहीं दे पा रहे थे। बीते साल के दूसरे हिस्से में जाकर हालात उस समय सुधरे जब केंद्रीय राजस्व बोर्ड ने स्थानीय अधिकारियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए और प्रक्रियागत बदलाव किए।

सुर्खियों का विषय बना दूसरा मुद्दा निर्यातकों के रिफंड में अव्यवस्था का था। बड़े हिस्से में निर्यातकों को किया जाने वाला कर रिफंड बाधित रहा। रिफंड की गणना का जटिल फॉर्मूला होने और स्थानीय स्तर पर अधिकारियों के लेटलतीफी वाले रवैये के चलते यह समस्या पैदा हुई। हाल में नीति-निर्माताओं ने रिफंड दावों के भुगतान में तेजी के लिए रिफंड पखवाड़ा शुरू करने का फैसला किया। रिफंड में देरी होने से निर्यातकों की कार्यशील पूंजी कई महीनों तक फंसी रही जिससे उनके कारोबार पर भारी दबाव देखने को मिला। निर्यातकों में व्याप्त असंतोष को दूर करने पर अविलंब ध्यान दिए जाने की जरूरत है ताकि असली रिफंड दावों को निर्धारित समय के भीतर निपटाया जा सके।

जीएसटी के बारे में कुछ अन्य पहलू भी हैं जिनके बारे में नीति-निर्माताओं को आने वाले समय में ध्यान देना होगा। पहला ,  जीएसटी कर की दरें और दूसरा, विवादों के निपटान की प्रणाली है। 

जीएसटी की दरें: जीएसटी के तीन पहलू एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। इनपुट टैक्स क्रेडिट की उपलब्धता, जीएसटी परिषद की बार-बार दरों को तर्कसंगत बनाने की कोशिश और मुनाफाखोरी-रोधी प्राधिकरण द्वारा जुर्माना लगाने के डर ने जीएसटी लागू होने से शुरुआत में महंगाई बढऩे की आशंकाओं को दूर करने का काम किया। कई कर दरों के अलावा डिमेरिट एवं लग्जरी उत्पादों पर क्षतिपूर्ति उपकर का प्रावधान होने से कर दरों एवं सीमा में बदलाव की पर्याप्त गुंजाइश है। हमारा मत है कि जीएसटी का औसत मासिक संग्रह 1 लाख करोड़ रुपये के करीब हो जाने से आने वाले साल में दरों में काफी हद तक स्थिरता आएगी। इससे विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं को अलग-अलग कर दायरे में रखे जाने को लेकर पैदा हुए विवादों को भी एक हद तक दूर किया जा सकता है।

विवाद निपटान प्रणाली: भारत के जटिल कारोबारी एवं प्रशासनिक परिदृश्य को देखते हुए जीएसटी संबंधी मामलों में भी विवाद खड़ा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। कई उच्च न्यायालयों में तमाम बिंदुओं को लेकर याचिकाएं दाखिल की गई हैं। अगर जीएसटी क्रियान्वयन संबंधी मसलों को छोड़ दें तो भी कई नीतिगत कदमों को अदालतों में चुनौती दी गई है। मसलन, जीएसटी लागू होने से पहले चुकाए गए कर पर भी क्रेडिट दिए जाने के प्रावधान को न्यायालय में चुनौती दी गई है। हालांकि बंबई उच्च न्यायालय ने इस याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया है कि यह एक नीतिगत कदम है और सरकार को इसका विशेषाधिकार है। हालांकि न्यायपालिका ने जीएसटी के संबंध में कुछ असहज सवाल उठाए हैं लेकिन इस प्रणाली के ढांचे को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं सुनाया है। इसका श्रेय न्यायिक स्तर के नियम अनुपालन वाली कर प्रणाली के अमल एवं डिजाइन को दिया जाना चाहिए।

वैसे समानांतर अर्थव्यवस्था के खात्मे संबंधी वास्तविक लाभ को महसूस किया जाना अभी बाकी है। इसमें कारोबारों के लिए तकनीकी साधनों एवं विश्लेषकों की सेवाएं लेना जरूरी हो गया है। आंकड़े बताते हैं कि जून एवं जुलाई 2017 के बीच ही 6.6 लाख नए कर एजेंटों ने जीएसटी में पंजीकरण कराया था। इसका मतलब है कि पहले अप्रत्यक्ष कर दायरे से बाहर रहने वाले कारोबार भी अब कर दायरे में शामिल हो चुके हैं। राज्यों में ई-वे बिल प्रणाली को लागू किए जाने के साथ उत्पादों की आवाजाही पर भी नजर रहेगी। जीएसटीएन से जुटाए गए विस्तृत आंकड़ों का आयकर विवरणों से मिलान किया जाएगा जिससे सघन जांच की राह खुलेगी। यह साफ है कि जीएसटी नेटवर्क के व्यवस्थित होने पर देश का कर आधार बढ़ेगा और कर चोरी करने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा।
(लेखक सलाहकार फर्म बीएमआर लीगल ऐंड एडवोकेट में साझेदार हैं) 
Keyword: जीएसटी, GST, GST Council, Media, finance minister,
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