बिजनेस स्टैंडर्ड - शराबबंदी पर बंदी के आसार
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शराबबंदी पर बंदी के आसार

सत्यव्रत मिश्रा /  07 02, 2018

बिहार में बहुचर्चित शराबबंदी योजना को महिलाएं और वरिष्ठ नागरिकों ने जरूर सराहा लेकिन एक कानून के तौर पर लोग इसकी आलोचना भी कर रहे हैं

बिजनेस स्टैंडर्ड शराबबंदी पर बंदी के आसारमौका था 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जनता दल (यूनाइटेड) के युवा संकल्प सम्मेलन का। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी रौ में भाषण दिए जा रहे थे। अपने इस एक घंटे के भाषण में कुमार ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का गुणगान किया, विरोधियों पर जुबानी तीर चलाए और शराबबंदी तथा नशाबंदी के फायदे गिनाए। हालांकि, सबसे अहम बात उन्होंने सबसे अंत में की। मुख्यमंत्री ने इशारों-इशारों में बिहार के कठोर शराबबंदी कानून में फेरबदल के संकेत दे डाले।

हालांकि, यह नहीं साफ किया कि ये बदलाव क्या और कैसे होंगे, लेकिन समझने वालों के लिए इशारा ही काफी था। कुछ दिनों के बाद कुमार ने यह भी बता दिया कि इस बारे में काम शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को बताया कि राज्य सरकार ने मुख्य सचिव दीपक कुमार की अध्यक्षता में बड़े नौकरशाहों की एक समिति भी बना दी। यह समिति कानूनविदों के साथ सलाह-मशविरा कर बिहार राज्य शराबबंदी व आबकारी कानून, 2016 में बदलाव के लिए राज्य सरकार को सिफारिश देगी। हालांकि, राज्य सरकार के सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार कई मामलों में पहली बार पकड़े गए लोगों को रियायत देने की सोच रही है।

हालांकि, आदतन अपराधियों और तस्करों को किसी भी प्रकार की रियायत नहीं मिल सकती है। हालांकि, एक सवाल बार-बार पूछा जा रहा है, अभी क्यों? जो नीतीश कुमार आखिर तक शराबबंदी में किसी रियायत से इनकार करते थे, अब अचानक उनका हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? दरअसल, शराबबंदी कानून की कठोरता को लेकर कुमार को विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं की कड़ी आलोचना झेलनी पड़ रही है। राज्य सरकार के दावों के बावजूद सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि इस कानून की सबसे ज्यादा मार समाज के कमजोर तबके पर लगी है। 

प्रक्रिया या अति-सक्रियता?

इस समय बिहार में शराबबंदी कानून की हरेक धारा गैर-जमानती है। मतलब इस मामले में जमानत हासिल करने के लिए आरोपी को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। पुलिस को महज शक के आधार पर किसी भी व्यक्ति या परिसर की तलाशी लेने का अधिकार यह कानून देता है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो इस महीने की 17 तारीख तक इस कानून के तहत राज्य में 1.44 लाख से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इस कानून के तहत राज्य में अप्रैल, 2016 के बाद हर रोज औसतन 179 लोगों को जेल भेजा जा चुका है।  

साथ ही, आबकारी विभाग और पुलिस बीते 26 महीनों में बिहार में 7,77,690 जगहों पर छापेमारी कर चुकी है और अब तक 1.1 लाख से ज्यादा मामले दर्ज कर चुकी है। इसका मतलब है कि इस कानून के तहत बिहार में हर दिन करीब 1,000 छापे और 150 प्राथमिकी दर्ज की जा रही है।राज्य सरकार अपने आंकड़ों को स्वीकारती तो है, लेकिन इस बात से इनकार करती है कि इस कानून के तहत लाखों लोग जेल में हैं। उसके मुताबिक राज्य में 10,000 से भी कम लोग इस मामले तहत जेल में हैं।

अप्रैल में बिहार में शराबबंदी के दो साल पूरे होने के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री कुमार ने कहा था, 'मुझे उन लोगों पर दया आती है, जो शराबबंदी कानून के तहत बिहार की जेल में लाखों लोगों के होने का दावा करते हैं। राज्य में इस कानून के तहत कुल गिरफ्तार लोगों में से महज 8,123 ही इस समय जेल में हैं। जब लोग नकली शराब बनाते या उसकी तस्करी करते हुए पकड़े जाते हैं, तो हम उनकी जाति नहीं देखते। इस कानून के तहत सभी जाति के लोग गिरफ्तार हुए हैं और उन सभी के लिए कानून बराबर है।'

हालांकि, इस आंकड़े को बिहार में राजनीतिक विश्लेषक और अधिकारी सरकारी विफलता के रूप में देख रहे हैं। उनके लिए ये आंकड़े बिहार में शराब के अवैध कारोबार को रोकने में सरकारी नाकामयाबी का नमूना है। राज्य के एक नौकरशाह ने कहा, 'ये आंकड़े दिखाते हैं कि राज्य में शराबबंदी कानून की धार कितनी कुंद हो गई है। अगर डेढ़ लाख लोगों में से 93 फीसदी में से ज्यादा आरोपियों को जमानत मिल जाती है, तो ऐसे कानून की जरूरत क्या है? राज्य सरकार आरोपियों को सजा दिलाने में मोटे तौर पर विफल रही है।'

राज्य सरकार को इस कानून से गरीबों, महिलाओं, दलित, महादलितों और अति पिछड़ी जातियों की समस्याओं में कमी की उम्मीद थी। हालांकि, उत्पाद विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक इसकी सबसे ज्यादा मार भी इन्हीं को उठानी पड़ रही है। नाम नहीं छापने की शर्त पर इस अधिकारी ने बताया, 'अमीर और ऊंची जातियों का पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर दबदबा होता है, जिस वजह से उनके लिए बचना आसान होता है। लेकिन दलित, महादलित, अति-पिछड़ों और गरीबों के पास यह सुरक्षा नहीं होती है। इसी वजह से ज्यादातर इसी वर्ग के लोग जेलों में पड़े हैं। जरा सोचिए उनके बीवी-बच्चों का क्या होगा?'

फलता-फूलता कारोबार

विकास (बदला हुआ नाम) करीब 20-25 साल का नौजवान है। वह पटना में शराब कूरियर का काम करता है। उसने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'यह बेहद खतरनाक काम है। हम सिर्फ पुराने खरीदारों से ऑर्डर लेते हैं और नए लोगों से संपर्क कम से कम रखते हैं। डिलिवरी भी शाम के वक्त करते हैं, ताकि पुलिस की जांच से बच सकें।' हालांकि, आजकल विकास को दूसरे गिरोहों से कड़ी टक्कर मिल रही है। उसने बताया, 'पहले हमें शराब की एक बोतल के लिए 2,000-2,500 रुपये मिलते थे। लेकिन अब कीमत कम हो रही है और अब वही बोतल 1,500-1,800 रुपये में मिल रही है।

दरअसल, बीते कई दिनों में कई गिरोह इस कारोबार में उतर चुके हैं। इस वजह से कीमतें कम हो रही हैं। दूसरी तरफ, पुलिस भी अब या तो सुस्त हो चुकी है या फिर बड़ी मछलियों के साथ मिल चुकी है।' हालांकि, पुलिस अधिकारी इस बारे में साफ इनकार करते हैं। उनके मुताबिक बिहार में हर रोज बड़े पैमाने पर शराब की बरामदगी इस सफलता को दिखाती है। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल, 2016 से 17 जून, 2018 तक बिहार में 21.21 लाख लीटर अंग्रेजी शराब की बरामदगी हो चुकी है।

इसके अलावा अब तक करीब 9.3 लाख लीटर देसी शराब बरामद की जा चुकी है। पुलिस अधिकारियों के दावों पर भरोसा करें तो इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई के बाद तस्करी पर लगाम कसी होगी और शराब की जब्ती कम हुई होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। बीते साल अप्रैल में बिहार में 7,299 लीटर अंग्रेजी शराब और 7,513 लीटर देसी शराब की जब्ती हुई थी। इस साल मई में 16,302 लीटर अंग्रेजी शराब और 12,330 लीटर देसी शराब की जब्ती हुई है।

आबकारी विभाग के एक सूत्र ने कहा, 'शराबबंदी के बाद से हर दिन पुलिस और हमारा विभाग कार्रवाई कर रहा है, लेकिन यह धंधा मंदा होने का नाम ही नहीं ले रहा है। राज्य में अब तो बड़े अपराधी इस कारोबार में उतर चुके हैं।'

नए इंतजाम 

शराबबंदी को लेकर बड़ी आलोचनाओं और खामियों के उजागर होने के बाद अब राज्य सरकार ने इसे लागू करने की पूरी जिम्मेदारी पुलिस विभाग को सौंप दी है। इसके तहत सरकार ने महकमे में पुलिस उप-महानिदेशक (एडीजी) का पद सृजित किया है और एक कॉल सेंटर भी बनाया है। महकमे के सूत्रों के मुताबिक इसमें राज्यभर से लोग कॉल कर सकते हैं। इसके तहत जब भी कोई व्यक्ति कहीं शराब को लेकर कोई सूचना देगा, तो वह कॉल रिकॉर्ड की जाएगी। फिर पुलिस मुख्यालय से स्थानीय थाने को जांच करने के लिए भेजा जाएगा।

स्थानीय थानेदार को दो घंटे में मामले की जांच कर मुख्यालय को रिपोर्ट करना होगा। इसके बाद सूचना देने वाले व्यक्ति से फोन कर इसे सत्यापित किया जाएगा। अगर थानेदार रिपोर्ट तय समय में रिपोर्ट नहीं करता है या गलत रिपोर्ट देता है, तो इस बारे में स्थानीय पुलिस डीएसपी को जांच के लिए भेजेगा। उन्हें पांच घंटे के भीतर मामले की जांच कर रिपोर्ट करना होगा। अगर डीएसपी भी रिपोर्ट नहीं करते तो जिले के एसपी को 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट करना होगा।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक इस कागजी भूल-भुलैया का सीधा असर राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर होगा। राज्य के एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने बताया, 'इस तरह से तो स्थानीय थाने और पुलिस वाले पूरी तरह से शराबबंदी के काम में लगे रहेंगे और दूसरे अपराधियों को आसानी होगी। वैसे ही राज्य में बलात्कार, हत्या और दंगों के मामले में बीते साल की तुलना में काफी ज्यादा हो चुके हैं। इस नई व्यवस्था की स्थिति और खराब होगी।'  

राजनीति की बिसात

शराबबंदी का असर बिहार में नीतीश कुमार की सरकार पर प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से होने लगा है। वैसे तो एक विचार के रूप में महिलाएं और वरिष्ठ नागरिक शराबबंदी को अच्छा बताते हैं, लेकिन एक कानून के रूप में सभी इसकी आलोचना कर रहे हैं। वहीं, राज्य सरकार को अब इस कानून की वजह से खास तौर पर कमजोर वर्गों की तीखी आलोचना झेलनी पड़ रही है। ऊपर से विपक्षी दल, खास तौर पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा, इस कानून को लेकर मुख्यमंत्री पर सीधा हमला बोल रहे हैं। राजद ने यहां तक ऐलान कर दिया है कि अगर वह सत्ता में आई तो इस कानून के कई प्रावधानों में बदलाव करेगी।

विधानसभा और लोकसभा उपचुनावों में करारी हार के बाद जद (यू) के कई नेता खुल कर इस कानून में बदलाव की मांग करने लगे हैं। उनके मुताबिक इस कानून की वजह से महादलित और अति पिछड़ी जातियां जद (यू) से दूर हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार को इस कानून में बदलाव के लिए उच्चतम न्यायालय से भी हरी झंडी मिल चुकी है। उम्मीद है कि राज्य सरकार विधानमंडल के मॉनसून सत्र में इस बारे में संशोधन विधेयक भी ला सकती है।  कुमार ने 5 जून को पहली बार माना कि राज्य में शराबबंदी का गलत इस्तेमाल भी हो रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि शराबबंदी से कोई समझौता नहीं होगा, लेकिन सजा के प्रावधानों में बदलाव किया जा सकता है।  

 

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