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भारत में कई विदेशी कंपनियां नहीं हो पा रहीं सफल

संजय कुमार सिंह / नई दिल्ली 07 01, 2018

जब निजी क्षेत्र का म्युचुअल फंड उद्योग अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है, ऐसे में यह देखना आश्चर्यजनक है कि कुछ विदेशी कंपनियां इस कारोबार को अलविदा कह चुकी हैं। निजी क्षेत्र में पहली कंपनी कोठारी पायनियर को शुरुआती कुछ वर्षों के अंदर फ्रैंकलिन टेम्पलटन को बेच दिया गया था। हालांकि जहां पायनियर ने बैंक ऑफ बड़ौदा की म्युचुअल फंड इकाई में हिस्सेदारी खरीद कर भारतीय बाजार में पुन: प्रवेश करने में कामयाबी हासिल की, वहीं भारत में विकास के मजबूत परिदृश्य से आकर्षित होकर यहां आईं ब्लैकरोक, गोल्डमैन सैक्स, फिडेलिटी, जेपी मॉर्गन, आईएनजी जैसी अन्य कंपनियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा और उन्हें आखिरकार भारत में अपना म्युचुअल फंड व्यवसाय समेटने को मजबूर होना पड़ा।
 
विदेशी कंपनियों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए, वर्ष 2009 में एंट्री लोड पर प्रतिबंध की वजह से फडेलिटी के लिए मजबूत इक्विटी आधार के बावजूद व्यवसाय ज्यादा उपयोगी नहीं रह गया और बाद में आखिरकार वह इस कारोबार से बाहर हो गई। 2013 में जब यह कंपनी म्युचुअल फंड व्यवसाय से बाहर हुई तो उसे वित्त वर्ष 2011 तक 3 अरब रुपये के कुल नुकसान से जूझना पड़ा था। कुछ कंपनियों ने वितरकों को सिर्फ उनके उत्पाद बेचने को कहकर व्यवस्था में  बदलाव की कोशिश भी की। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ गई और फंड हाउस प्रभावित हुए।
 
इसके अलावा कई अन्य समस्याएं भी थीं। जहां यूटीआई ने 1960 के दशक से मौजूद थी और इसने निर्धारित प्रतिफल वाली योजनाओं पर जोर दिया। हालांकि निजी कंपनियों को प्रवेश की अनुमति मिल गई, लेकिन उन्हें निर्धारित प्रतिफल का वादा करने की अनुमति नहीं दी गई थी। फ्रैंकलिन टेम्पलटन ऐसेट मैनेजमेंट (इंडिया) में पूर्व मुख्य निवेश अधिकारी केएन शिवसुब्रमण्यन कहते हैं, 'उस समय निवेशकों को उत्पादों के बारे में जानकारी देने की जरूरत थी कि प्रति व्यक्ति आय में इजाफे के लिए उन्हें बाजार जोखिम उठाना पड़ सकता है।'
 
वितरण व्यवस्था को मजबूत बनाना अन्य समस्या थी। साइट्रस एडवाइजर्स के संस्थापक (और एलऐंडटी म्युचुअल फंड के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी) संजय सिन्हा का कहना है, 'फंड उद्योग तब बाल्यावस्था के दौर से गुजर रहा था और वितरण व्यवस्था को मजबूत बनाए जाने की जरूरत थी। मजबूत वितरण पहुंच में विफल रहने वाली विदेशी कंपनियों को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा था।' भारत में वितरण चैनल विविध रहा है। बैंकिंग चैनल विकसित देशों में मजबूत रहा है, जबकि भारत में इसे स्वतंत्र वित्तीय सलाहकारों (आईएफए) का मार्गदर्शन हासिल है। आईएफए का नेटवर्क तैयार करने में समय और प्रयास की जरूरत होती है।
 
भारत में प्रवेश करने वाली कई विदेशी कंपनियों के लिए परिसंपत्ति प्रबंधन प्राथमिक व्यवसाय नहीं था। उनका जोर बैंकिंग और इन्वेस्टमेंट बैंकिंग पर था। उनमें यहां सफल होने के लिए जरूरी दीर्घावधि अंतर्दृष्टिï का अभाव था। अपने वैश्विक परिचालन की तुलना में भारतीय व्यवसाय का दायरा बढ़ाने में असमर्थता और छोटे आकार की वजह से उन्हें यहां कारोबार समेटने के लिए बाध्य होना पड़ा।  कंपनी-केंद्रित कारकों की वजह से भी विदेशी फंड कंपनियों के लिए यहां अपने कारोबार को बंद करने के लिए बाध्य होना पड़ा। गोल्डमैन सैक्स ने ऐसे समय में पैसिव फंडों पर जोर देने की रणनीति अपनाई थी जब उन्हें खरीदने वाले कम थे। वहीं जेपी मॉर्गन द्वारा कारोबार बंद करने का निर्णय उसकी वैश्विक पुनर्गठन पहल का हिस्सा माना जा सकता है।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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