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सफलता की राह का चुनौतीपूर्ण सफर

जयदीप घोष / मुंबई 07 01, 2018

मौजूदा समय में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लांस (एसआईपी) के जरिये हर महीने लगभग 75 अरब रुपये के पूंजी प्रवाह के मजबूत आधार से संपन्न म्युचुअल फंड उद्योग को 90 के दशक से ही कड़ी चुनौतियों से जूझना पड़ा है।  90 के दशक के एक प्रख्यात म्युचुअल फंड (एमएफ) प्रबंधक याद करते हुए कहते हैं, 'मैंने सिविल सेवा में जाने के बजाय बैंक में शामिल होने का निर्णय काफी देर से लिया था। पहले दिन प्रबंधक ने मुझे बताया कि मुझे सिर्फ इक्विटी रिसर्च की जिम्मेदारी देखनी पड़ सकती है।'

म्युचुअल फंड उद्योग के लिए 1993 कई मायनों में ऐतिहासिक घटनाक्रम वाला वर्ष था। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपने पहले एमएफ प्रावधानों को पेश किया जिनमें सभी म्युचुअल फंड हाउसों (यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया को छोड़कर) को पंजीकृत किया जाना और उसके द्वारा शासित किया जाना शामिल था। जुलाई 1993 में, निजी क्षेत्र के पहले म्युचुअल फंड कोठारी पायनियर को पंजीकृत किया गया था। वर्ष 1993 और 1996 के बीच परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 32 पर पहुंच गई थी। आईसीआईसीआई, रिलायंस, बिड़ला, आईटीसी और टï्वेंटीथ सेंचुरी जैसी कंपनियों ने अपनी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियां बनाईं।
 
एएसके कैपिटल के कार्यकारी निदेशक भरत शाह का कहना है, 'पहली बात, लोग एमएफ के जरिये रकम प्रबध्ंान की अवधारणा से पूरी तरह अवगत नहीं थे। भले ही यूएस-64 फंड लंबे समय से मौजूद था, लेकिन नए खिलाडिय़ों के लिए यह वास्तव में उपयोगी नहीं था। इसके अलावा, ऐसे निवेशकों को समझाना चुनौतीपूर्ण था जो यह समझते थे कि उनके लिए इस तरह का निवेश करना खतरनाक साबित हो सकता है।' शाह 90 के दशक के मध्य में बिड़ला सन लाइफ के मुख्य निवेश अधिकारी (सीआईओ) थे।
 
लेकिन रिटेल निवेशकों को जल्द ही गलत जानकारी देकर बिक्री (मिस-सेलिंग) का पहली बार अहसास हो गया। 1994 में मॉर्गन स्टैनली (इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाला विदेशी नाम था) ने अपनी 15 वर्षीय क्लोज-एंड ग्रोथ फंड योजना को शुरू किया। शुरू में फंड हाउस ने 3 अरब रुपये का लक्ष्य रखा था और निवेशकों को 'पहले आओ पहले पाओ' आधार पर आवंटन दिया गया। निवेशकों का मानना था कि यह एक आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) की तरह है और इसमें आवंटन आनुपातिक होगा। परिणाम: आवेदकों के लिए यह एकदम नया था। हालांकि फंड हाउस ने पूरी 10 अरब रुपये की वैल्यू को बरकरार रखा। जब इस याजना ने अपनी शुद्घ परिसंपत्ति वैल्यू (एनएवी) घोषित की तो यह 10 प्रतिशत कम थी, और चूंकि यह एक्सचेंजों पर सूचीबद्घ थी इसलिए निवेशक भारी नुकसान के साथ बाहर निकले।
 
इससे निवेशक धारणा प्रभावित हुई। 1990 के दशक में अमेरिका स्थित अलायंस कैपिटल के सीआईओ समीर अरोड़ा याद करते हुए कहते हैं, 'मॉर्गन स्टैनली ने रिटेल बाजार को बर्बाद कर दिया। हमारी योजना 'अलायंस 95' उसके ठीक बाद आई और उसके जरिये पूंजी जुटाना बेहद कठिन रहा।' इस योजना ने महज 75 करोड़ रुपये जुटाए थे। अरोड़ा मौजूदा समय में हेलियोस कैपिटल के साथ पार्टनर हैं। इन शुरुआती झटकों के बावजूद निवेशकों के साथ साथ निजी क्षेत्र के फंड प्रबंधकों को 90 के दशक के अंत में प्रौद्योगिकी की मजबूती के साथ पहली बार उम्मीद की किरण दिखाई दी। शाह और अरोड़ा दोनों ने उस दौर में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई थीं।
 
मौजूदा समय में बिड़ला सन लाइफ म्युचुअल फंड के मुख्य कार्याधिकारी ए बालासुब्रमण्यन कहते हैं, 'उस समय डिजिटल इक्विपमेंट, ई-सर्व, पोलारिस, एनआईआईटी और विजुअल सॉफ्ट जैसे कई विजेता थे।' 90 के दशक के मध्य में शाह के अधीन उप-सीआईओ की जिम्मेदारी के तहत प्रीमियर पदमिनी में दोस्तों के साथ किए गए दौरे को वे अभी भी नहीं भूले हैं। यह मौका रिलायंस एमएफ ने अपने प्रबंधकों को दिया था। लेकिन वर्ष 2000 के शुरू में आईटी का बुलबुला जल्द ही फूट गया जिससे हर कोई प्रभावित हुआ। उद्योग के जानकारों का कहना है कि दिलचस्प तथ्य यह है कि ज्यूरिख के प्रशांत जैन (एचडीएफसी म्युचुअल फंड के मौजूदा मुख्य निवेश अधिकारी) ही इसे बचे रहे क्योंकि उन्होंने इस संकट से लगभग 6 महीने पहले ही अपने आईटी शेयर बेचने का निर्णय ले लिया था। वह संकट म्युचुअल फंड उद्योग के लिए एक सबब था। उसके ठीक बाद, जब डेट फंड 15-20 प्रतिशत का प्रतिफल दे रहे थे तो फंड हाउसों ने सक्रियता बढ़ाई और ग्राहकों को एक अन्य संकट से बचने की सलाह दी। इसके परिणामस्वरूप, निर्धारित आय परिसंपत्तियों में 85-90 प्रतिशत तक की कमी आई। कोटक म्युचुअल फंड के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह का कहना है कि 2000 के आईटी संकट और 2008 के इन्फ्रास्ट्रक्चर संकट के बीच बड़ा अंतर शेयरों की गुणवत्ता से संबंधित था। वह कहते हैं, 'भले ही ये शेयर भारी गिरावट के शिकार हुए थे, लेकिन हमने अच्छी कंपनियों को अपनाए साथ बनाए रखा। कई फंड प्रबंधकों ने बड़ी गलती यह की थी कि इसकी आशंका होने के बाद भी वे पैसा एकत्रित करते रहे कि बाजार में जल्द गिरावट आने वाली है।'
 
उद्योग को शुरुआती वर्षों में इस वजह से भी कुछ राहत मिली थी कि तब नए फंड ऑफर के विपणन एवं वितरण के लिए खर्च अनुपात 6 फीसदी था। इसके अलावा मौजूदा योजनाओं पर 2-2.5 फीसदी का प्रवेश शुल्क भी था। लेकिन इससे गलत जानकारी के जरिये बिक्री को भी बढ़ावा मिला। दरअसल, कुछ निवेशक पोर्टफोलियो में 150 से ज्यादा फंड योजनाएं थीं।   मौजूदा समय में यह उद्योग सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लांस (एसआईपी) के जरिये हर महीने लगभग 75 अरब रुपये के पूंजी प्रवाह के मजबूत आधार से संपन्न है और कुल परिसंपत्तियों का आकार 23.6 लाख करोड़ रुपये है। यूटीआई म्युचुअल फंड के प्रबंध निदेशक लियो पुरी को आने वाले वर्षों में रुझान में बड़ा बदलाव आने की संभावना है। 
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