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जीएसटी ने बदल दी भारत की अर्थ-राजनीति

अर्चिस मोहन /  07 01, 2018

देश की राजनीतिक फिजा में एक 'फेडरल फ्रंट' बनाने की कोशिशें अभी तक नवजात स्तर पर ही हैं। लेकिन वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था जीएसटी परिषद के तौर पर इस तरह का एक फ्रंट आर्थिक मोर्चे पर आकार ले चुका है। राज्यों के वित्त मंत्रियों की भागीदारी वाली जीएसटी परिषद की आने वाले महीनों में होने वाली बैठकों में अगर केंद्र सरकार किसी मुश्किल कर प्रस्ताव के लिए जोर देती है तो ये मंत्री मतदान की मांग करने के लिए भी तैयार नजर आ रहे हैं।

जीएसटी परिषद की अभी तक हुई 27 बैठकों में आम सहमति की भावना ही नजर आई है। लेकिन परिषद की 21 जुलाई को होने वाली 28वीं बैठक को लेकर विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों ने अभी से कड़े तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। कांग्रेस, वामदलों और क्षेत्रीय दलों के शासन वाले राज्यों के वित्त मंत्रियों ने ऐसे संकेत दिए हैं कि वे विवादास्पद कर प्रस्तावों को तभी अपना समर्थन देंगे जब उनकी चिंताओं पर भी गौर किया जाएगा। चीनी पर उपकर लगाने और पेट्रोल एवं डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की केंद्र सरकार की मंशा को लेकर इन विपक्षी राज्यों को एतराज है।
 
वाम शासन वाले केरल के वित्त मंत्री थॉमस आइजैक ने शुक्रवार को इसकी बानगी पेश कर दी कि परिषद की आगामी बैठकों से आमसहमति किस तरह दूर रह सकती है? आइजैक ने कहा, '28 फीसदी का कर दायरा खत्म नहीं किया जाएगा। जब तक सभी बातें साफ नहीं हो जाती हैं और हम उसके परिणाम को देख नहीं लेते हैं तब तक जीएसटी के ढांचे में कोई भी बुनियादी बदलाव नहीं होगा। हम निरंतर बदलावों की स्थिति में नहीं रह सकते हैं।' 
 
अभी तक विपक्ष शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों ने जीएसटी परिषद की बैठकों में मतदान की मांग से परहेज ही किया है। परिषद की बैठक में कोई भी फैसला कम-से-कम तीन-चौथाई बहुमत से ही करना होता है। अकेले केंद्र के मत को एक-तिहाई भारांक दिया गया है जबकि सभी राज्य सरकारों के मतों को बैठक में पड़े कुल मतों का दो-तिहाई भारांक दिया गया है। 
 
पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने कुछ समय पहले कहा था कि जीएसटी परिषद में मतदान की मांग करने का कोई राजनीतिक औचित्य नहीं है। बादल ने कहा था, 'भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की केंद्र एवं कई राज्यों में अपनी या सहयोगी दलों के साथ सरकारें चल रही हैं। ऐसी स्थिति में उनका जीएसटी परिषद में जबरदस्त बहुमत रहा है।' लेकिन लोकसभा चुनाव में महज नौ महीनों का ही वक्त रह जाने और तीन बड़े राज्यों में नवंबर-दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए तस्वीर का बदलना तय है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को जीएसटी लागू करने में जल्दबाजी दिखाने के लिए राजनीतिक विरोधियों, तमाम अंशधारकों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे अनुषंगी संगठन के भी लगातार तेज होते हमलों का सामना करना पड़ रहा है। नीति आयोग शासकीय परिषद की 17 जून को हुई चौथी बैठक में कई विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने जीएसटी क्रियान्वयन को लेकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया था। खुद जीएसटी परिषद के भीतर भी मोदी सरकार के आलोचकों की संख्या बढ़ी है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू पहले कर सुधारों के प्रबल समर्थक रहे लेकिन मोदी सरकार से अपनी तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के अलग होने के बाद वह इसके कटु आलोचक बन गए हैं। भाजपा नेता सुशील मोदी बिहार का वित्त मंत्री होने के नाते परिषद में शामिल हैं लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई वाले जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने मोदी सरकार की योजनाओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। वैसे जीएसटी कानून के निर्माण एवं उसके क्रियान्वयन में तत्कालीन वित्त मंत्री जेटली की भूमिका काफी अहम रही। तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों और वित्त मंत्रियों के साथ जेटली के निजी ताल्लुकात काफी अच्छे रहे हैं और जीएसटी परिषद की बैठकों में इसका उन्हें खूब फायदा भी मिला। 
 
इसकी एक वजह तो यह भी रही कि जेटली ने कुछ राज्यों के वित्त मंत्रियों के योगदान को खुलकर सराहा। पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्रा और जम्मू कश्मीर के वित्त मंत्री हसीब द्राबू इनमें प्रमुख नाम रहे। लेकिन जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन लग जाने के बाद द्राबू के तौर पर जेटली का एक सहयोगी कम हो गया है। इसी तरह जीएसटी का शुरुआती समर्थन करने वाले अमित मित्रा भी अब इसके कटु आलोचक बन चुके हैं। मित्रा ने हाल ही में एक टेलीविजन चैनल के साथ बातचीत में जीएसटी के मौजूदा ढांचे को 'भयंकर गड़बड़ी' बताया है।
 
आने वाले महीनों में राज्यों के वित्त मंत्री जीएसटी के चलते छोटे कारोबारियों एवं दुकानदारों को पेश आ रही समस्याओं का मुद्दा लगातार उठा सकते हैं। परंपरागत तौर पर कारोबारी समुदाय भाजपा का पुरजोर समर्थन करता रहा है लेकिन अब उसका धैर्य भी जवाब देने लगा है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने सरकार से रिटर्न जमा करने और रिफंड लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने की गुहार लगाते हुए कहा है कि जीएसटी के प्रति सहयोगी रवैया रखने के बावजूद उसका सब्र टूटने लगा है। यह अलग बात है कि अब भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार गरीबों एवं वंचितों को अपना वोट आधार बनाने की कोशिशों में लगी हुई है। छोटे एवं मझोले स्तर के उद्यमी भी लगातार भाजपा नेताओं से मिलकर अपनी समस्याएं रखते रहे हैं। यहां तक कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से भी मिलकर इन उद्यमियों ने जीएसटी से उपजी अपनी पीड़ा से अवगत कराया है। 
 
गुजरात में पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों के पहले केंद्र को कारोबारियों की शिकायतें दूर करने के लिए कई कदम उठाने पड़े थे। उसी तर्ज पर केंद्र सरकार को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के आसन्न चुनावों और अगले साल अप्रैल-मई में लोकसभा चुनावों को देखते हुए भी कारोबारियों को राहत देने के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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