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छोटे कारोबारियों के लिए अनुपालन अभी बनी हुई है बड़ी चुनौती

दिलाशा सेठ /  07 01, 2018

ऐसा लगता है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) शुरुआती उथल-पुथल के बाद अब स्थिर हो चुका है और इसे लागू होने के बाद प्रणाली से करीब 45 लाख नए करदाता जुड़े। बड़ी कंपनियां नई कर व्यवस्था और रिटर्न फाइल करने की नई प्रणाली को पूरी तरह आत्मसात कर चुकी हैं लेकिन छोटी इकाइयों को इनपुट टैक्स क्रेडिट, नियमों में लगातार हो रहे बदलाव और फाइलिंग में देरी होने पर भारी जुर्माने सहित अनुपालन संबंधी तमाम चुनौतियों का लगातार सामना करना पड़ रहा है। 

कम से कम बड़े कारोबारी रिटर्न फाइल करने की इस नई सरलीकृत व्यवस्था को लेकर काफी उत्साहित हैं क्योंकि इससे कारोबार उनके लिए आसान हो जाएगा। जबकि छोटे कारोबारी काफी सतर्क होते हुए अनुपालन बोझ कम होने की उम्मीद कर रहे हैं। त्रिस्तरीय रिटर्न फाइलिंग प्रक्रिया को खारिज करने के बाद सरकार अगले छह महीने के दौरान रिटर्न फाइल करने के लिए एक सरल प्रक्रिया के साथ सामने आ रही है। प्रस्तावित ढांचे के लिए करदाता को हर महीने केवल एक ही रिटर्न भरने की जरूरत होगी जबकि फिलहाल उन्हें महीने में तीन रिटर्न भरना पड़ रहा है।
 
हिंदुस्तान कोका कोला बेवरिजेस के उपाध्यक्ष (आर श्रीधर) ने कहा कि जीएसटी ने केंद्र और राज्यों के तमाम अप्रत्यक्ष करों को एकीकृत कर वास्तव में जीवन आसान कर दिया है। उन्होंने कहा, 'परिषद (जीएसटी परिषद) को जीएसटी नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि उसकी डेटा-माइनिंग क्षमता के साथ क्रेडिट का मिलान किया जा सके।' हालांकि उद्योग नई कर व्यवस्था के तहत सभी तरह के लेवी को एकीकृत करने के पक्ष में नहीं है। श्रीधर ने कहा, 'हम उचित एवं संतुलित आकलन, अपील वातावरण की उम्मीद करते हैं क्योंकि हम वार्षिक अनुपालन तिथि की ओर रुख कर रहे हैं।' पिछले साल नवंबर में काफी हो-हल्ले के बाद जीएसटीएन प्रणाली को खत्म करते हुए जीएसटीआर-2 रिटर्न फॉर्म और जीएसटीआर-3 इनपुट-आउटपुट रिटर्न फॉर्म को हटा दिया गया था। फिलहाल उद्योग को विक्रेता रिटर्न फॉर्म जीएसटीआर-1 और इनपुट-आउटपुट रिटर्न फॉर्म जीएसटीआर-3बी भरना जरूरी है जिसके लिए स्वचालित इनवॉइस मिलान की व्यवस्था नहीं है।
 
डीएलएफ लिमिटेड के मुख्य वित्तीय अधिकारी (समूह) और पूर्णकालिक निदेशक अशोक त्यागी ने हाल में कहा था कि जीएसटी के कारण रियल एस्टेट में कराधान की एकसमान एवं सरल व्यववस्था आई जिससे इनपुट क्रेडिट पारदर्शी प्रवाह सुनिश्चित होगा। उन्होंने कहा, 'हम जीएसटी व्यवस्था को आगे और युक्तिसंगत होने की उम्मीद करते हैं और ग्राहकों के लिए स्टाम्प शुल्क को घटाकर कर के अनुरूप किया जाना चाहिए।'
 
नई फाइलिंग व्यवस्था
 
नई फाइलिंग व्यवस्था को दो चरणों में लागू किया जाएगा। शुरू में जीएसटी के तहत खरीदारों को छह महीने के लिए प्रोविजनल क्रेडिट मिलेगा जो खुद उनकी गणना पर आधारित होगा। विक्रेता यदि सौदे के इनवॉइस को अपलोड नहीं करता है तो भी ग्राहक को इसका लाभ मिलेगा। उसके बाद अगले चरण में खरीदारों के लिए किसी भी प्रोविजनल इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति नहीं होगी। इनपुट टैक्स क्रेडिट तभी उपलब्ध होगा जब विक्रेता द्वारा इनवॉइस को अपलोड किया जाएगा। हालांकि कर भुगातन करने का दायित्व विक्रेता का होगा।
 
एचएसबीसी ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के अपने वादे पर खरा नहीं उतरा और न ही उससे नकदी की मांग में कमी आई बल्कि उसमें बढ़ोतरी हुई है। जबकि वित्त सचिव हसमुंख अढिया का कहना है कि नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के कारण 45 लाख नए करदाता जुड़े। उन्होंने कहा, 'मैं नकदी के उपयोग को लेकर भी अधिक आश्वस्त नहीं हूं। हालांकि अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने का मतलब यह हुआ कि पहले रिटर्न दाखिल ने करने वाले कुछ हितधारक अब कर की जाल में आ चुके हैं। क्या यह पर्याप्त नहीं है कि पिछली कर व्यवस्था के मुकाबले जीएसटी के कारण 45 लाख नए करदाता जुड़े।' अप्रैल 2018 के लिए 62 लाख रिटर्न फाइल किए गए थे जबकि इससे पिछले महीने यह संख्या 60 लाख रही थी। इससे पता चलता है कि अनुपालन में सुधार हुआ है।
 
अनुपालन में विविधता
 
पीडब्ल्यूसी इंडिया के लीडर (अप्रत्यक्ष कर) प्रतीक जैन के अनुसार, बड़ी कंपनियां नई व्यवस्था के अनुरूप खुद को ढाल चुकी हैं जबकि एसएमई मुख्य तौर पर दो कारणों से अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। पहला, वे पहले से तैयार नहीं थे और दूसरा, फाइलिंग प्रणाली की जटिलता के कारण उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जैन ने कहा, 'उद्योग का एक बड़ा हिस्सा असंगठित है जिसे जीएसटी के तहत स्व-नीति निर्धारण व्यवस्था के तहत कर के दायरे में आने के लिए बड़ी कंपनियां प्रेरित कर रही हैं।' लेकिन कंपोजिशन स्कीम के तहत कारोबार की सीमा बढ़ाए जाने और व्यवस्था को सरल बनाने संबंधी अन्य तमाम उपायों से एसएमई काफी हद तक व्यवस्थित हो चुके हैं। हालांकि छोटे कारोबारी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि जीएसटी का पहला वर्ष व्यापारियों के लिए मिश्रित रहा और इस दौरान छोटे कारोबारियों को सबसे अधिक संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने कहा, 'जागरूकता अभाव, नियमों में लगातार बदलाव होने और ई-अनुपालन जरूरतों के कारण छोटो कारोबारियों को परेशानी हुई।' उन्होंने कहा कि 50 फीसदी से अधिक छोटे कारोबारियों के पास कंप्यूटर नहीं है जिससे ऑनलाइन रिटर्न फाइल करना उनके लिए एक चुनौती है।
 
फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो ऐंड स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज के महासचिव अनिल भारद्वाज ने कहा कि सरकार और बड़े खरीदारों से एमएसएमई को भुगतान में लगातार देरी हो रही है। साथ ही अधिक कर दरें और जीएसटी प्रणाली के तहत भारी जुर्माने के प्रावधान से एमएसएमई की कार्यशील पूंजी को झटका लगा। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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