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न्यायपालिका के समक्ष असहज करने वाले कुछ सवाल

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  07 01, 2018

लंबी गर्मियों के बाद सरकार और न्यायपालिका दोनों एक अहम दौर में प्रवेश कर रही हैं। सरकारें जहां सुसुप्तावस्था में जा सकती हैं और सत्ता से बाहर भी हो जाती हैं, वहीं न्यायपालिका रुकना नहीं जानती। वह हमेशा एकदम चौकन्नी रहती है। बहरहाल राजनीतिक हवाएं निरंतर न्यायपालिका को धक्का पहुंचाती रहती हैं। यह बात अब पहले किसी भी स्थिति की तुलना में कहीं अधिक स्पष्टï नजर आ रही है।  उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति का काम लंबे समय से ठहरा हुआ है। इस विषय पर सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों के कॉलेजियम के बीच टकराव चल रहा है। बीते दो साल से अधिक वक्त से वे न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं। सरकार का जोर है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में वह सर्वोच्च रहे। इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी वजह गिनाई जा रही हैं। 

इस मसले पर गतिरोध बना हुआ है और उधर न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की सेवानिवृत्ति के बाद कॉलेजियम की व्यवस्था में एक बदलाव आया है। चेलमेश्वर वही न्यायाधीश हैं जिनकी अगुआई में तीन वरिष्ठïतम न्यायाधीशों ने देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ बगावत की थी। बहरहाल, बदलाव के तहत अब पांच सदस्यीय कॉलेजियम में प्रधान न्यायाधीश, तीन बगावती न्यायाधीश और न्यायमूर्ति ए के सीकरी शामिल होंगे। इससे क्या बदलाव आएगा यह तो कॉलेजियम की अगली बैठक के दौरान ही समझ में आएगा।
 
कॉलेजियम के सदस्य न्यायाधीशों ने अवकाश पर जाने के पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ को सर्वोच्च न्यायालय में प्रोन्नत किए जाने के कष्टïप्रद विषय को छिपा ही लिया था। जोसेफ ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन खत्म किया था और सरकार को उनके इस कदम के बाद प्रतिशोध में बताया जाता है। सरकार ने कहा कि वरिष्ठïता, क्षेत्रीयता और सामुदायिक प्रतिनिधित्व जैसी बातें उनकी राह में आ गईं।  अगर कॉलेजियम कोई नाम सुझाने वाली फाइल सरकार के पास भेजता है और सरकार बिना मंजूरी के उसे वापस कर देती है तो कॉलेजियम ही अंतिम निर्णय लेता है और सरकार को उसकी अनुशंसा को स्वीकार करना होता है। परंतु न्यायाधीश दुविधा में रहे और छुट्टी पर चले गए। जाने से पहले उन्होंने एक और पहेली खड़ी कर दी। जोसेफ का नाम चार अन्य नामों के साथ कर दिया गया। अब अटकल यह है कि सरकार इन चारों को नए प्रस्तावित नामों की तरह देखेगी और एक बार फिर जोसेफ का नाम खारिज कर देगी। इस दौरान कई अन्य नाम भी खारिज हुए। न्यायाधीशों का यह कदम आगे के लिए नजीर भी बन जाएगा। 
 
नए प्रधान न्यायाधीश का चयन भी इससे जुड़ा हुआ मसला है। परंपरा के मुताबिक तो निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश वरिष्ठïतम न्यायाधीश का नाम इस पद के लिए अनुशंसित करता है। चूंकि न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ही वरिष्ठïतम हैं इसलिए सामान्यत: उनके नाम की अनुशंसा की जानी चाहिए। परंतु वह उन चार विद्रोहियों में शामिल हैं जिन्होंने प्रधान न्यायाधीश मिश्रा के खिलाफ बगावत की थी। वह बनेंगे या नहीं? इन दिनों तो ऐसे सिद्घांत माहौल में तैर रहे हैं जिनके बारे में सोचा तक नहीं जा सकता। 
 
ढेर सारी अन्य बारीकियां भी हैं। पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ की अध्यक्षता देश के प्रधान न्यायाधीश करते हैं। माना जा रहा है यह पीठ इस बात पर फैसला देगा कि अयोध्या मामला एक और बड़े पीठ को सौंपा जाए या नहीं। अपील को एक परिसंपत्ति विवाद के रूप में सीमित कर दिया गया है। अन्य तमाम पहलुओं को छोड़ दिया गया। इस बात की संभावना बेहद कम है कि इस विवादित भूमि के मालिकाने का निर्णय अगले आम चुनाव के पहले हो सकेगा। इस मामले में कानून नहीं बल्कि राजनीति अपना काम करेगी। 
 
अनिश्चितता की जिम्मेदारी इस बात पर डाली जा रही है तमाम अहम मामलों को प्रधान न्यायाधीश के पीठ ने अपने पास रखा है और इनकी सुनवाई एकदम मंथर गति से हो रही है। आधार मामले के निपटारे में चार महीने और 38 सुनवाइयां लगीं। देश के प्रधान न्यायाधीश ने कई और बड़े संवैधानिक मसले अपने पास रखे हैं। उनकी सेवानिवृत्ति के पहले सुनवाई के लिए अधिकतम 30 दिन बचे हैं। ऐसे में इन मामलों को निपटाने के लिए उनको अत्यंत तेजी से काम करना होगा। अगर वह ऐसी कोशिश करते हैं तो ऐसे आरोप लग सकते हैं कि जल्दबाजी में न्याय के साथ समझौता किया जा रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि उनके साथी न्यायाधीश इस बार यह कहते हुए सार्वजनिक बयान दें कि उन्हें अपना नजरिया रखने के लिए पूरा वक्त नहीं दिया जा रहा।
 
कुछ ऐसे मामले हैं जिन्हें मिश्रा का पीठ ही सुनेगा। इनमें आरोपित विधायकों, सांसदों की अयोग्यता, एलजीबीटी अधिकार और पूजास्थलों पर महिलाओं के प्रवेश आदि के मामले शामिल हैं। ऐसे में अगर एक पीठ दूसरे पर यह आरोप लगाए कि उसने कानून की अनदेखी की तो क्या होगा? यह सूची एक पीठ द्वारा निपटाए जाने की दृष्टिï से तो बहुत ही लंबी है।  अदालत फैसले देने में भी बहुत लंबा समय लेती हैं। दिल्ली सरकार और उप राज्यपाल के अधिकारों पर चल रही बहस दिसंबर में समाप्त हो चुकी है। अगर अदालत ने अपना निर्णय सुना दिया होता तो हाल के दिनों में जो नया विवाद देखने को मिला, उससे बचा जा सकता था। कुछ न्यायाधीश तो लंबी सुनवाई के बाद बिना निर्णय लिखे ही सेवानिवृत्त हो गए। अब देखना यह है कि क्या संवैधानिक पीठ के साथ भी ऐसा हो सकता है?
Keyword: supreme court, high court,,
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