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वैश्विक संबंधों के मोर्चे पर गड़बडिय़ां कहां !

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  07 01, 2018

देश का बाहरी और सामरिक माहौल एक त्रासदी जैसा नजर आ रहा है। इसका संबंध अमेरिका द्वारा तीसरी बार 'टू प्लस टू' संवाद को टालने से उपजी शर्म भर से नहीं है।  आज हालात एक साल पहले की तुलना में काफी बदल गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वक्त एक देश से दूसरे देश के दौरे पर रहते, वहां के राष्ट्राध्यक्षों के गले लगते उनकी तस्वीरें आतीं। भारत एक उभरती हुई शक्ति था और मोदी उसके ताकतवर, मुखर, ऊर्जावान नेता। उनकी हैसियत एक सितारे जैसी थी। उदाहरण के लिए उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते में अपने सकारात्मक और निर्णायक हस्तक्षेप से दुनिया को आश्वस्त किया। पिछले छह महीनों में इस छवि को काफी धक्का पहुंचा है। विश्व स्तर पर भारत जितने सहज और स्थिर ढंग से उभरा था, उसका पराभव उतना ही अचानक हुआ है।

मोदी के समर्थक इसका विरोध करेंगे। राजनीतिक पक्षधरता जहां देश को भ्रमित कर सकती है लेकिन महाशक्ति के दर्जे की महत्त्वाकांक्षा रखने वाला कोई देश हकीकत से मुंह नहीं मोड़ सकता। हमें यह परीक्षण करना होगा कि आखिर क्यों यह सिलसिला थम गया। कुछ कारक तो भारत के नियंत्रण से बाहर हैं। मिसाल के तौर पर डॉनल्ड टं्रप का अमेरिकी राष्ट्रपति बनना। परंतु इसके साथ-साथ कुछ गलतियों ने भी भारत के बाहरी रिश्तों को कमजोर किया। हर नेता की अपनी कूटनीति होती है। साउथ ब्लॉक में मोदी के समर्थक इस बात का जश्न मनाते हैं कि उनकी कूटनीतिक शैली लेनदेन वाली है। भाजपा के भीतर और उसके साथ मित्रवत कूटनीतिक समुदाय में भी यही बात प्रचारित की जाती है। यही वजह है कि मोदी सरकार के कार्यकाल के शुरुआती तीन सालों को एक के बाद एक कई बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में मनाया गया। भारत को तीन वैश्विक मिसाइल-परमाणु तकनीक वाले समूहों में एक जवाबदेह शक्ति के रूप में शामिल किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिकी नीति को भी थामने में मदद मिली। एक सामरिक रिश्ता हकीकत नजर आने लगा। बिल क्लिंटन के दूसरे कार्यकाल के साथ ही विदेशी मोर्चे पर भारत बेहतर स्थिति में था। नीतिगत निरंतरता और 15 साल की आर्थिक प्रगति ने इसकी दिशा तय कर दी थी। मोदी ने अपनी ऊर्जा, अपनी निजी शैली और बहुमत के साथ इसे गति दी। आखिर यह सिलसिला कहां बिगड़ा? 
 
ट्रंप के राष्ट्रपति बनने और चीन की आक्रामकता में तो मोदी का कोई दोष नहीं था। ट्रंप के कदम, खासतौर पर ईरान नीति में बदलाव से तेल कीमतों में इजाफा हुआ। इससे भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति प्रभावित हुई। चीन ने भारत की परवाह न करते हुए पाकिस्तान के साथ आर्थिक गलियारे पर जोर दिया। श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश में उसके कदमों ने दिखाया कि चीन अब भारतीय उपमहाद्वीप में भारत की सर्वोच्चता नहीं चाहता। वे दिन नहीं रहे जब जॉर्ज बुश हू चिंताओ को फोन कर भारत को एनएसजी रियायत देने को कहते थे। शी चिनफिंग ऐसी बातें नहीं सुनेंगे। बल्कि ट्रंप भी अब ऐसा नहीं करेंगे। मोदी सरकार की सबसे बड़ी चूक है संवेदनशील विदेशी रिश्तों को घरेलू राजनीति में मिलाना। सफल नेताओं का एक गुण है उनका धैर्य। वे मजबूती से आगे बढ़ते हैं लेकिन थोड़े बहुत बदलाव की गुंजाइश भी रखते हैं। कूटनीतिक रिश्ते बनाने वाले नेता सुनील गावसकर की तरह होते हैं, न कि सहवाग की तरह। मोदी ने अपने लिए कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी।
 
हर प्रमुख विधानसभा चुनाव अभियान में उन्होंने अपनी विदेश नीति की सफलता को केंद्र में रखा। उन्हें कामयाबी भी मिली लेकिन बहुत जल्दी अपनी जीत घोषित करने की अपनी दिक्कतें हैं। इससे आपके पास गुंजाइश कम होती है। अतीत की सरकारों की तरह चुप रहने के बजाय उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक को सियाचिन में सन 1984 की सफलता के समकक्ष बताना शुरू किया। जबकि खुद इंदिरा गांधी ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था। अगर आप सामरिक कदमों को तात्कालिक राजनीतिक लाभ की दृष्टि से देखेंगे तो आगे जाने के रास्ते बंद हो जाएंगे। आपके दुश्मन भी इसे समझ जाएंगे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली प्रतिक्रिया से उत्साहित होकर ऐसी चर्चा शुरू हो गई कि ऐसा ही एक और बड़ा कदम 2018 में उठाया जाए तो 2019 के आम चुनाव जीतने में मदद मिल सकती है। डोकलाम और उसके बाद चीन ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह भारत को एक सीमा से अधिक सैन्य शक्ति नहीं दिखाने देगा। पाकिस्तान भी अब उसकी छत्रछाया में है। व्यापार के क्षेत्र में भी ऐसी ही गलतियां हुईं। चिकित्सा उपकरणों, स्टेंट आदि की कीमत पर नियंत्रण को चुनावी बहस में लाया गया। ऐसे में ट्रंप की प्रतिक्रिया पर कहने को क्या बचा? हार्ली डेविडसन बाइक पर शुल्क कम कराने की उनकी मांग दिलचस्प है। भारत में ये बाइक चुनिंदा बिक्री वाली हैं और कोई भारतीय निर्माता इनके आयात से नहीं घबराता। अमेरिका को इस पर खुश हो लेने देना था। स्टेंट की कीमतों को नियंत्रित करने के बजाय सरकार सब्सिडी दे सकती थी। आर्थिक राष्ट्रवाद को केंद्र में रखकर ऐसे कदम उठाना उचित नहीं। 
 
गत वर्ष 13 नवंबर को ट्रंप और मोदी के बीच मनीला में हुई बैठक में ट्रंप में पुरानी गर्मजोशी नहीं नजर आई। बल्कि उनका व्यवहार अपमानजनक था। एक वीडियो सामने आया जिसमें वह मोदी की बोलने की शैली का मजाक उड़ा रहे हैं। इसके बाद ट्रंप ने भारत के व्यापार पर चोट पहुंचाई। इस बीच ब्रिटेन ने वीजा को लेकर कड़े कदम उठाए। अपनी ताकत का बखान करते रहना हमेशा जोखिम भरा होता है। भारत पिछले कुछ समय से यही करता रहा है। ऐसे में सावधानी बरतना जरूरी है। आत्मप्रशंसा के जाल में उलझना बेहद आसान होता है। चार साल से भारत अमेरिका के स्वाभाविक सामरिक सहयोगी होने का जश्न मना रहा है लेकिन इस बीच उसका सैन्य पराभव हुआ है। अगर आपकी सेना सीमा पर रक्षा में लगी रहती है तो आप बहुत बड़ी नीतियां नहीं बना सकते। चार सालों में हमने चार रक्षा मंत्री देख लिए। सेना की पेंशन का बजट दो साल में उसके वेतन के बजट को पार कर जाएगा। अभी भी दोनों पूंजीगत बजट से अधिक हैं। यह एक पुरानी शैली की सेना है, न कि आक्रामक और प्रभावी सामरिक शक्ति। आप एशिया-प्रशांत को अमेरिका द्वारा हिंद-प्रशांत कहने का जश्न मना सकते हैं लेकिन केवल चंद युद्घपोतों को सहयोगी नौसेनाओं के साथ कवायद में भेजने से हम कोई सामरिक बढ़त नहीं हासिल कर सकते। चीन हर साल तीन युद्घपोत बना रहा है। हम तीन साल में एक युद्घपोत नहीं बना पा रहे। युद्घपोत में मिसाइल और सेंसर लगाने में हमें और वक्त लगता है। मेक इन इंडिया और निजी क्षेत्र को लेकर भारी भरकम शोर के बाद भी हमारी कोई खास उपलब्धि नहीं है। 
 
घटती सैन्य शक्ति के साथ आर्थिक मंदी और बुरे हालात बना रही है। आप जीडीपी आकलन की व्यवस्था बदलकर लोगों को मूर्ख बना सकते हैं। परंतु अगर आप इस पर यकीन करने लगें तो यह खतरनाक है। भारत उदय की बात लगातार सुनने को मिलती रही है। कैसे दुनिया भारत की ओर देख रही है, योग दिवस अब भारत की सॉफ्ट पॉवर का वैश्विक उदाहरण बन चुका है और क्रिसमस को टक्कर दे रहा है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा प्रणव मुखर्जी वाले आयोजन में दिए गए भाषण को सुनिए जहां वह घोषणा करते हैं कि भारत विश्व गुरु बनने की राह पर है। अगर ऐसा है तो हमारे सदाबहार और बेहतरीन मित्र अमेरिका के साथ रिश्ते क्यों कमजोर पड़ रहे हैं, हमारे सभी पड़ोसी चीन के पाले में क्यों हैं और बांग्लादेश को छोड़कर सभी शत्रुतापूर्ण और संदेहास्पद क्यों बने हैं? ट्रंप इस विश्वगुरु देश के प्रधानमंत्री के साथ अशिष्टïता कैसे बरत सकते हैं? निक्की हेली जिनकी ट्रंप प्रशासन में कोई खास हैसियत नहीं है, वह भारत आकर उसे अपनी ईरान नीति बदलने का आदेश कैसे दे सकती हैं? यह भी देखिए कि कैसे शी चिनफिंग के साथ मोदी की भाव भंगिमा बदल चुकी है। आखिर कब भारतीय नेताओं ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के भारतीय क्षेत्र के जरिये पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरने का विरोध किया? अब वक्त आ गया है कि हम अति उत्साह दिखाना बंद करें और हकीकत पर नजर डालें।
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