बिजनेस स्टैंडर्ड - दूसरे वर्ष में जीएसटी
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दूसरे वर्ष में जीएसटी

संपादकीय /  07 01, 2018

अपनी शुरुआत के एक वर्ष बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था में अभी भी सुधार कार्य जारी हैं। नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था दो एकदम विपरीत तस्वीरों के बीच छिपी हुई है जो सरकार और विपक्ष द्वारा पेश की जा रही हैं। सरकार जीएसटी को 'अच्छा और सामान्य कर' बता रही है जिसने अप्रत्यक्ष कर का बोझ कम किया, कारोबार को आसान बनाया और कर दायरा बढ़ाकर पारदर्शी कराधान व्यवस्था की दिशा में पहल की। वहीं कांग्रेस ने इसे भयावह कर बताया है। उसने उन असुविधाओं की ओर भी ध्यान दिलाया है जिनका सामना करदाताओं को करना पड़ा।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जीएसटी दो वजहों से सबसे जटिल सुधार है। पहला, इसमें 17 करों और 23 उपकरों का विलय किया गया। इसके तहत दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक तंत्रों में से एक में पूरा बदलाव करने की जरूरत पड़ी। दूसरी बात, इसके लिए कर आधार के केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक बंटवारे की व्यवस्था में संशोधन किया गया। इसके लिए तमाम संघीय भेद और राजनीतिक फलक के बीच राजनीतिक सहमति की आवश्यकता पड़ी। जीएसटी परिषद को इस असंभव नजर आ रहे काम को पूरा करने का पूरा श्रेय मिलना चाहिए। राज्यों की एक बड़ी चिंता यह थी कि उन्हें राजस्व का नुकसान हो सकता था लेकिन चालू वित्त वर्ष में मासिक जीएसटी संग्रह के अब औसतन 10 खरब रुपये हो जाने की आशा है। इससे केंद्र और राज्य दोनों को अपने राजस्व लक्ष्य प्राप्त होंगे और जीएसटी व्यवस्था थोड़ी स्थिर होगी। जीएसटी की एक बड़ी उपलब्धि कर दायरे का विस्तार है। सरकार के मुताबिक 45 लाख नए नाम कर दायरे में आए। यह किसी भी नई व्यवस्था के लिए पहले साल में उल्लेखनीय उपलब्धि है। अरुण जेटली का यह दावा भी सही है कि जीएसटी क्रियान्वयन ने प्रत्यक्ष कर दायरे के विस्तार में भी मदद की है। यह बात इस वर्ष निजी तौर पर चुकता अग्रिम आय कर संग्रह में 44 फीसदी के इजाफे से जाहिर होता है।
 
बहरहाल, यह भी सच है कि जीएसटी का क्रियान्वयन बिना पर्याप्त तैयारी के किया गया और यह बात विभिन्न तरीकों से जाहिर भी हुई। तकनीकी दिक्कतों से लेकर दरों को लेकर अस्पष्टता ने बहुत भ्रम पैदा किया और रिटर्न दाखिल करने और रिफंड की मंजूरी में समस्याएं आईं।  हालांकि इसमें से कुछ बातों में बाद में सुधार कर लिया गया लेकिन अभी भी जीएसटी को अच्छा और सहज कर बनाने में काफी काम करना होगा। मूलरूप से जीएसटी की अवधारणा विविध अप्रत्यक्ष करों को समेट कर चुनिंदा कर दायरों में लाने की थी ताकि इस जटिल व्यवस्था को सरल बनाया जा सके। वह समस्या अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कर जुटाने के लिहाज से अहम उत्पाद मसलन पेट्रोलियम, डीजल, शराब और बिजली अभी भी जीएसटी के दायरे से बाहर हैं। इतना ही नहीं निर्यातकों के कर रिफंड को आसान बनाने से संबंधित जीएसटी की कई पहल मसलन ई-वे बिल या ई-वॉलेट आदि के क्रियान्वयन को लेकर अभी तक दिक्कतें बनी हुई हैं। आखिर में, जीएसटी परिषद चुनावी परिदृश्य को लेकर शंकालु नजर आ रही है। चीनी उपकर की मांग से इस बात को समझा जा सकता है। अगर उस मांग को स्वीकार कर लिया गया तो देश में जीएसटी का मूलभूत सिद्धांत ही ध्वस्त हो जाएगा। भारत को एक सहज और आसान अनुपालन वाली कर व्यवस्था की आवश्यकता है। इसकी अनुपालन लागत बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इससे छोटे उद्यमों की उत्पादकता प्रभावित होती है। दूसरे वर्ष में यह जीएसटी परिषद के सामने एक बड़ी चुनौती है।
Keyword: arun jaitley, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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