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संघ और मोदी का साथ मगर लोकप्रिय नहीं खट्टर सरकार

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 29, 2018

कुछ सप्ताह पहले हिसार में एक व्यक्ति ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर काला तेल फेंका था। उसके कुछ ही दिन बाद कुरुक्षेत्र में एक रोड शो के दौरान स्त्री पुरुषों के एक समूह ने काली पट्टी बांध कर उनका विरोध किया और उन्हें काले झंडे दिखाए। आखिर यह हो क्या रहा है? पहली बात तो यह कि हरियाणा के लोगों के साथ उनकी समझ चाहे जो भी हो लेकिन पार्टी ने यही दिखाया है कि वह पूरी तरह खट्टर के समर्थन में है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कुछ महीने पहले हरियाणा का दौरा किया था। उन्होंने वहां एक साइकिल रैली का नेतृत्व किया। रैली में अच्छी खासी भागीदारी रही और वह खट्टर के विरोधियों को यह संकेत देने में भी कामयाब रहे कि उनके अभियान को कोई खास तवज्जो नहीं मिलने वाली है। खट्टर के कई विरोधी हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले 12 विधायकों ने दिल्ली में पार्टी आलाकमान से गुहार लगाई थी कि अफसरशाहों और साथी विधायकों पर खट्टर का नियंत्रण नहीं है। कुल 90 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 47 विधायक हैं और उसे पांच विधायकों का समर्थन हासिल है लेकिन खट्टर निश्चिंत हैं क्योंकि उन्हें अमित शाह और नरेंद्र मोदी के रूप में दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण लोगों का समर्थन प्राप्त है। 

 
खट्टर और मोदी एक दूसरे को उस समय से जानते हैं जब मोदी हरियाणा के प्रभारी थे। सन 1975 में आपातकाल के दौर में खट्टर राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए और सन 1977 में इसमें शामिल हो गए। आरएसएस की विचारधारा और आपातकाल के दौरान स्वयंसेवकों के आचरण से प्रभावित होकर वह सन 1980 तक आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। वह हरियाणा की राजनीति में रुचि लेने लगे और मोदी के साथ जुड़ गए। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने और भुज तथा कच्छ में भूकंप आया तो खट्टर को पुनर्निर्माण एवं पुनर्वास समिति का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया गया। सन 2002 में वह जम्मू कश्मीर के चुनाव प्रभारी बने और सन 2014 में उन्हें हरियाणा की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। खट्टर का परिवार मूल रूप से पश्चिमी पाकिस्तान से ताल्लुक रखता था। उनका परिवार विस्थापित होकर हरियाणा में बसा था और वह निहायत गरीब था। मोदी ने उनकी क्षमताओं को पहचाना। उनके पक्ष में दो बातें गईं। एक तो उन्हें आरएसएस के संगठन के बारे में गहरी जानकारी थी और भाजपा के समर्थन ढांचे का पूरा ज्ञान था। दूसरी बात, उनके व्यक्तित्व में पूर्ण ईमानदारी नजर आती है। हरियाणा एक के बाद एक ऐसी सरकारें झेल रहा था जिनमें जबरन वसूली करने और अपना हित साधने वाले हावी थे। ऐसे में खट्टर अपने व्यक्तित्व के चलते स्वाभाविक उम्मीदवार के रूप में नजर आए। 
 
परंतु कई दिक्कतें ऐसी थीं जिन्होंने तत्काल सर उठा लिया। खट्टर ने भाजपा के लिए चुनाव जीते हों लेकिन वह अपने जीवन में पहली बार विधायक तब बने जब करनाल से चुनाव लड़े और जीते। पार्टी की ओर से सबसे अनुभवी विधायक रामविलास शर्मा थे जिन्होंने बंसीलाल के साथ काम किया था। एक अन्य विधायक अनिल विज के पास गहरा विधायी अनुभव था। परंतु मुख्यमंत्री का पद खट्टर को सौंपा गया। ऐसे में दूसरों की नाराजगी जाहिर थी।  खट्टर ने वही किया जो वह जानते और समझते थे तथा जिस पर उन्हें सबसे अधिक भरोसा था। वह आरएसएस या उससे जुड़े लोगों की सलाह पर चले। शीर्ष अफसरशाहों को उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्ति नहीं मिली बल्कि उन्हें उनके या उनके परिवार के संघ के साथ संपर्क के आधार पर पद सौंपे गए। भारतीय समाज और राजनीति कभी जाति से परे नहीं हो सकते। यही वजह है कि खट्टर सरकार की प्रशासकीय विफलता के लिए जाति (जाट प्रदेश में काफी अहम जाति समूह है जिसके भड़कने पर प्रशासन नियंत्रण करने में नाकाम रहा) और अनुभव की कमी (स्वयंभू गुरु रामपाल द्वारा 43 बार अदालत में पेश होने पर नाकाम रहने पर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का प्रयास और बाद में डेरा सच्चा सौदा मामला) को दोष दिया गया। परंतु मोटे तौर पर लोग इसे सरकार की अक्षमता ही मानते हैं। 
 
हरियाणा में खट्टर सरकार की स्थिति का ताजा प्रमाण द ट्रिब्यून समाचार पत्र से सामने आता है। खबरों के मुताबिक उन्होंने गोपनीय तरीके से एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण कराया है। सर्वेक्षण कहता है कि मौजूदा विधायकों और सांसदों में से 80 से 90 फीसदी को दोबारा टिकट नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि उनके जीतने की संभावना बहुत क्षीण है। द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक खट्टर के मंत्रियों में से केवल चार ही चुनाव जीतने की स्थिति में हैं। हरियाणा के 10 सांसदों में से केवल दो- फरीदाबाद के कृष्णपाल गुर्जर और गुरुग्राम के राव इंद्रजित सिंह ही दोबारा लोकसभा पहुंचने की स्थिति में हैं। इस पूरे सर्वेक्षण में राहत की बात केवल इतनी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्वयं खट्टर की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ है।  यह भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं हो सकती। अगर सर्वेक्षण सही है तो पार्टी को हरियाणा में नई नीति बनानी होगी। अब बिल्कुल भी वक्त नहीं है।
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