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एकीकृत परिवहन प्रणाली अपनाने का आ गया वक्त

विनायक चटर्जी /  June 29, 2018

भारतीय शहरों की परिवहन व्यवस्था में अब सवारियों को केंद्र में रखते हुए नीतियां बनाने की जरूरत है। एकीकृत शहरी परिवहन प्राधिकरण का गठन अपरिहार्य नजर आने लगा है। बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
अगस्त 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नई मेट्रो रेल नीति को मंजूरी दी थी जिसमें शहरी परिवहन में मेट्रो रेल प्रणालियों की भूमिका का विस्तार करने का मसौदा पेश किया गया था। कई शहरों ने नई मेट्रो रेल परियोजनाएं शुरू करने की प्रतिबद्धता जताई है लेकिन यह समझने की कोशिश कम ही की गई है कि कोई भी मेट्रो रेल प्रणाली किसी शहर की समग्र सार्वजनिक परिवहन जरूरतों में किस तरह मुफीद बैठती है? नई मेट्रो नीति इसी बिंदु पर कारगर लगती है। इसमें यह कहा गया है कि अगर एक शहर अपनी मेट्रो रेल परियोजनाओं के लिए केंद्रीय मदद चाहता है तो वहां की राज्य सरकार को एकीकृत मेट्रोपोलिटन परिवहन प्राधिकरण (यूएमटीए) का गठन और उसके परिचालन की प्रतिबद्धता जतानी होगी। यूएमटीए एक ऐसा निकाय है जो शहरी परिवहन के सभी साधनों के लिए जिम्मेदार होगा, लिहाजा आवागमन के लिए एक समेकित नजरिया अपनाया जा सकेगा। जिन शहरों में पहले से ही मेट्रो परियोजनाएं चल रही हैं वहां एक साल के भीतर यूएमटीए का गठन करना है।
 
सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए आदर्श के तौर पर देखे जाने वाले कई विदेशी शहरों में इस तरह की एक नीति-नियामक संस्था मौजूद है जो शहरी आवागमन के सभी पहलुओं से संबंधित योजना बनाने, उसका क्रियान्वयन करने और परिचालन के लिए उत्तरदायी होता है। न्यूयॉर्क सिटी ट्रांजिट अथॉरिटी, लंदन ट्रांसपोर्ट और सिंगापुर का एसबीएस ट्रांजिट एवं एसएमआरटी इसके कुछ उदाहरण हैं। एक एकीकृत परिवहन प्राधिकरण में परिवहन के सभी साधनों को इस तरह समेकित किया जाएगा कि यात्री को उसके घर तक पहुंचने के लिए जरूरी संपर्क मुहैया कराया जा सके और हरेक परिवहन प्रणाली का दूसरी प्रणाली से प्रभावी सम्मिलन हो। सभी परिवहन साधनों में किराये के डिजिटल भुगतान के लिए एक साझा यात्रा कार्ड की व्यवस्था करना भी इसी निकाय का दायित्व होगा। यह पैदल चलने वाले यात्रियों की जरूरतों, इंटरचेंज व्यवस्था, सड़कों का डिजाइन और परिवहन प्रणालियों का कॉन्कोर्स बनाने के बारे में भी गौर करेगा।
 
शहरी यातायात नियोजन के प्रति खंडित नजरिया बताता है कि दिल्ली और बेंगलूरु के 27 फीसदी कामकाजी और लखनऊ के केवल 11 फीसदी कामकाजी लोग ही अपने काम पर जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के ये आंकड़े लंदन और सिंगापुर के क्रमश: 45 फीसदी और 59 फीसदी अनुपात की तुलना में काफी कम हैं। सार्वजनिक परिवहन का कम इस्तेमाल किए जाने की एक अहम वजह तो यह है कि इसका सुविधाजनक घर-घर संपर्क नहीं है। शहरी यातायात को लेकर समेकित दृष्टिकोण नहीं होना ही इसकी मुख्य वजह है। शहरों की सीमाओं का विस्तार होने से अब लोगों को कार्यस्थल पर जाने के लिए अधिक दूर जाना पड़ रहा है। ऐसे में यह समस्या और गंभीर रूप ही अख्तियार करेगी।
 
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने हैदराबाद में यूएमटीए के गठन को लेकर मई 2016 में जारी एक रिपोर्ट में कहा था कि तेलंगाना की राजधानी में शहरी परिवहन के विभिन्न पहलुओं को 20 कानून और 13 एजेंसियां नियमित कर रही हैं। इन एजेंसियों के बीच बहुत कम सामंजस्य होता है क्योंकि इनमें से कई एजेंसियों के उद्देश्य और लक्ष्य विरोधाभासी होते हैं। नतीजा यह होता है कि टिकटों की एकसमान व्यवस्था, बहुपक्षीय यात्री सूचना और विभिन्न परिवहन साधनों की उपलब्धता वाले टर्मिनल बनाने की राह में रोड़े खड़े होते हैं। इन परिवहन साधनों के किराये एकांगी तरीके से तय कर दिए जाते हैं और बसों के मार्ग का निर्धारण ऑपरेटरों के दबाव में होता है। बस ऑपरेटर जांचे-परखे मार्गों पर ही बसें चलाना पसंद करते हैं जबकि दूसरे मार्गों पर परिचालन से परहेज करते हैं।
 
भारत में विभिन्न परिवहन प्रणालियों को एक प्राधिकरण के मातहत लाने की शुरुआती कोशिशें छिटपुट और काफी हद तक असफल रही हैं। दिल्ली में दिल्ली समेकित बहुस्तरीय परिवहन प्रणाली (डिम्ट्स) का गठन अपने शुरुआती वादे पर खरा उतरने में नाकाम रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि डिम्ट्स को मुख्य रूप से क्लस्टर बस व्यवस्था तक ही सीमित रखा गया है। यहां तक कि डिम्ट्स के दायरे में दिल्ली की समूची बस परिवहन प्रणाली भी नहीं है क्योंकि सरकारी बस सेवा दिल्ली परिवहन निगम पर इसका कोई नियंत्रण नहीं है।
 
वैसे हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं। वर्ष 2006 में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति (एनयूटीपी) जारी की थी जिसमें 10 लाख से अधिक आबादी वाले सभी शहरों में यूएमटीए के गठन की सिफारिश की गई थी। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश भर में 10 लाख से अधिक आबादी वाले 53 शहर हैं। वर्ष 2016 में भोपाल, हैदराबाद, जयपुर, कोच्चि, लखनऊ, तिरुचिरापल्ली और विजयवाड़ा जैसे कुछ गिने-चुने शहरों में यूएमटीए के गठन की कोशिशें हुईं। पिछले साल घोषित मेट्रो रेल नीति ने इन प्रयासों को और गति देने का काम किया है। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में भारतीय रेलवे पहले से ही उपनगरीय रेल सेवाएं संचालित करता रहा है लेकिन यूएमटीए के वजूद में आने के बाद इन सेवाओं की कमान भी प्राधिकरण के सुपुर्द करनी होगी। इसके बदले में यूएमटीए ढांचागत-उपभोग शुल्क और अन्य शुल्कों का रेलवे को भुगतान करेगा।
 
सिंगापुर लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (एसएलटीए) समेकित परिवहन संभावनाओं का दायरा और शहरी यातायात पर इसका असर समझने का एक बढिय़ा उदाहरण है। एसएलटीए भूतल परिवहन के लिए हरेक पांच साल पर एक मास्टरप्लान लेकर आता रहा है। इसने 2008 में एक मास्टरप्लान पेश किया था और फिर 2013 में दूसरा प्लान लेकर आया। इन दोनों मास्टरप्लान का मकसद सिंगापुर के द्वीपीय शहर में सार्वजनिक परिवहन को पसंदीदा परिवहन विकल्प के रूप में स्थापित करना है। एसएलटीए के 2013 के मास्टरप्लान में वर्ष 2030 तक 20 किलोमीटर तक की दूरी वाली करीब 80 फीसदी यात्राओं को 60 मिनट के भीतर पूरा कर लेने, व्यस्ततम समय वाली 75 फीसदी यात्राओं के लिए सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने और करीब 80 फीसदी घरों से मेट्रो स्टेशन का फासला महज 10 मिनट के पैदल सफर तक पहुंचा देने का लक्ष्य रखा गया है। इस मकसद को पूरा करने के लिए सिंगापुर रेल नेटवर्क और ट्रेनों में नियोजित विस्तार करने, ढके हुए रास्तों का निर्माण और साइक्लिंग के लिए खास रास्ते का निर्धारण कर रहा है। अब वक्त आ गया है कि भारत के शहरों में भी परिवहन नीतियों को तय करते समय यात्रियों की जरूरतों को केंद्र में रखा जाए। इसके लिए यूएमटीए एक अपरिहार्य और अत्यावश्यक पूर्व-शर्त है।
 
(लेखक ढांचागत सलाहकार फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं) 
Keyword: transport, metro, नई मेट्रो रेल नीति,
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