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राजनीतिक गठबंधन को विभिन्न सिद्धांतों से समझने का प्रयत्न

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  June 28, 2018

आप बता सकते हैं कि चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी, प्रफुल्ल महंत, किम जोंग उन और डॉनल्ड ट्रंप में भला क्या समानता है? इनमें केवल एक समानता है: ये सभी किसी भी गेम थिअरिस्ट की रुचि का विषय हो सकते हैं। गेम थिअरी अर्थशास्त्र की एक शाखा है जो मोलतोल के जरिये सौदेबाजी से संबंधित है। इसमें नीतिगत अध्ययन अनिवार्य तौर पर शामिल है।  ऐसी सैकड़ों नीतियों या गेमों का विश्लेषण गेम थिअरी से जुड़े लोग करते हैं। राजनेताओं के लिए सौदेबाजी सीखने के क्रम में जो दो गेम सबसे अधिक प्रासंगिक हैं वे हैं ग्रिम ट्रिगर नीति और फोक थिअरम। ग्रिम ट्रिगर नीति में एक ही घटक होता है और वह है विश्वास। जैसे ही यह टूटता है आप हमेशा के लिए खेल हार जाते हैं और फिर कभी उसे दोबारा हासिल नहीं कर सकते। 

 
इस खेल के लिए नीतीश कुमार एक आदर्श उम्मीदवार प्रतीत होते हैं। परंतु इसके साथ ही उनके मामले में राजनीतिक अवसरवाद विश्वास का एक स्वीकार्य विकल्प नजर आता है।  यह बात प्रकाश करात पर लागू नहीं होती जिन्होंने नाभिकीय समझौते के मसले पर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। उन्होंने भी भरोसा तोड़ा था और इस तरह माकपा को नुकसान पहुंचाया था। सीताराम येचुरी उसे बहाल करना चाहते हैं लेकिन अब तक ऐसा हो नहीं सका है।  वहीं दूसरी ओर फोक थिअरम धैर्य और दूरदर्शिता पर निर्भर खेल है। यह गुण हम नरसिंह राव, मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं में देख चुके हैं। जब आप पूरा गणित लगा चुके होते हैं तब यह खेल कहता है कि जो भी व्यवहार्य और तार्किक हो वह हल संभव है। ये नीतियां ऐसी हैं जिन्हें अनेक राजनेता अपनाते हैं जबकि उनको इसका अहसास तक नहीं है। इन नीतियों को लेकर सिद्घांतकारों ने बहुत लंबी बहस की हैं लेकिन आम आदमी चकित होता रहता है कि ये राजनेता भला कर क्या रहे हैं? 
 
ग्रिम ट्रिगर
 
इस नीति के सबसे स्पष्टï उदाहरण डॉनल्ड ट्रंप हैं। अपने 18 महीने के कार्यकाल में उन्होंने अब तक हर भरोसा तोड़ा है। जी 7 की बैठक में उनकी गतिविधियां इसका उदाहरण हैं। उनका प्रमुख प्रतिद्वंद्वी चीन भी अगर उनसे बुरा नहीं तो भी उनके समान तो है।  इस नीति में खेल में दोहराव होता है। इसके उदाहरण के रूप में हम व्यापार वार्ताओं को ले सकते हैं। परंतु यहां यह विकल्प रहता है कि एक खिलाड़ी दूसरे को निकल जाने को कहे। ट्रंप ने यही किया है और यही कर रहे हैं। हम देख ही रहे हैं कि व्यापार युद्घ शुरू भी हो चुका है। 
 
इस नीति का इस्तेमाल हर किसी के लिए बहुत बुरी तरह खत्म होता है क्योंकि वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। ऐसे में आप बस यही उम्मीद कर सकते हैं कि आप किसी तरह सर्वश्रेष्ठï प्रदर्शन कर सकें। जैसा कि हमने पहले भी कहा भारत में नीतीश कुमार इस नीति के लिए एकदम सटीक उदाहरण हैं। उन्होंने इसका इस्तेमाल दो बार किया और वे सफलतापूर्वक राजग से संप्रग और फिर वापस राजग में आ गए। अब उन पर कोई यकीन नहीं करता।  इसके विपरीत लालू प्रसाद एकदम उलट हैं। उन्होंने कभी ट्रिगर का इस्तेमाल नहीं किया है और वह हमेशा उन दलों के साथ सहयोगी रहे हैं जो खुलकर मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। 
 
अब बात आती है नरेंद्र मोदी की। अगर उनके सभी गठबंधन सहयोगियों को अन्य खिलाड़ी मान लिया जाए तो मोदी ने ट्रिगर का इस्तेमाल बहुत पहले ही कर लिया है। तेलुगू देशम पार्टी के राजग से बाहर होने की घटना को इसकी शुरुआत माना जा सकता है। उसके बाद जम्मू कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भाजपा के बीच का गठबंधन टूट गया। शिव सेना के हाव भाव भी बहुत आश्वस्त नहीं करते और अब तक असम गण परिषद भी धमकी दे रही है। अन्य दल भी इस राह पर चल सकते हैं।  मोदी दोबारा भरोसा हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन चुनाव के पहले ऐसा होगा नहीं। ट्रिगर दरअसल ऐसा ही करता है। वापसी की कोई गुंजाइश नहीं रहती। परिणाम यह होता है कि किसी न किसी हद तक सबको हार का मुंह देखना पड़ता है। 
 
फोक थिअरम
 
यहां मामला थोड़ा अधिक जटिल है। यही वजह है कि केवल श्रेष्ठï राजनेता मसलन नरसिंह राव, मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी का नाम इस श्रेणी में लिया जाता है। हां, किम जोंग उन को भी इसे खेलने में कोई कठिनाई नहीं है। मूलरूप से यह खेल नीतियों को ग्रहण करने से संबंधित है जिसके लिए तब तक आपको बदलना नहीं है जब तक कि सामने वाला खिलाड़ी नहीं बदलता। ट्रंप के पहले पूर्वोत्तर एशिया में ऐसा ही हो रहा था। इतना ही नहीं ऐसा किसी भी तरह की नीतियों के साथ हो सकता है। यहां खिलाड़ी बार-बार एक ही काम करते रहते हैं। यहां सबसे अहम बात है औसत प्रतिफल या सहयोग के लाभ पर ध्यान केंद्रित करना कि बजाय एकतरफा जीत हासिल करने की कोशिश करने के। ध्यान रहे कि मोदी और शाह की जोड़ी हाल के दिनों में यही कोशिश करती दिखी है। संक्षेप में कहें तो इस नीति के तहत औसत लाभ को लंबी अवधि के दौरान बढ़ाने के लिए समझौते की इच्छा होना आवश्यक है। 
 
राहुल गांधी अब इस बात को समझ चुके हैं। सोनिया गांधी ने सन 2000 में ही इस बात को समझ लिया था। मायावती और अखिलेश यादव भी अब इसे समझ चुके हैं लेकिन ममता बनर्जी इसे नहीं समझ पाई हैं।  लब्बोलुआब यही है कि सहयोग करना हमेशा असहयोग से बेहतर होता है। अरविंद केजरीवाल जल्दी ही इस बात का उदाहरण बन सकते हैं।
Keyword: BJP, congress, politics, राजनीतिक गठबंधन,
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