बिजनेस स्टैंडर्ड - कृत्रिम बुद्घिमत्ता क्रांति और देश में रोजगार की स्थिति
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कृत्रिम बुद्घिमत्ता क्रांति और देश में रोजगार की स्थिति

अजय शाह /  June 28, 2018

देश के नीति निर्माण क्षेत्र में निकट भविष्य में रोजगार का नुकसान होता नहीं दिख रहा। बहुत बड़े पैमाने पर वैश्विक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन भारत से संबद्घ रहेगा। बता रहे हैं अजय शाह 

 
नए दौर की कृत्रिम बुद्घिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई) की क्षमताओं को लेकर हम सभी विचार करते रहते हैं। क्या यह देश के व्यापक श्रम आधारित उत्पादन को भी प्रभावित कर सकता है? इस मामले में तस्वीर अनुमान से कहीं अधिक खुशनुमा है।  एआई क्रांति आंकड़ों में जरूर नजर आती है लेकिन हकीकत यह है कि तकनीक को मानव क्षमताओं की बराबरी करने में अभी काफी वक्त लगने वाला है। रोबोट सीमित भूमिकाओं में ही प्रभावी हैं। आज के रोबोट की तुलना में इंसान बेजोड़ हैं। वैश्विक उत्पादन का बहुत बड़ा हिस्सा भारत से संबद्घ हो सकता है। हमारी नीतियां अभी भी काफी हद तक पारंपरिक हैं। 
 
हम देख चुके हैं कि कैसे एक कंप्यूटर ने शतरंज के खेल में गैरी कास्पारोव को पराजित किया। उसके बाद एक अन्य कंप्यूटर आया जिसने जेपर्डी नामक खेल में जीत हासिल की। अब हर सप्ताह ऐसी खबरेें आ रही हैं कि कैसे रोबोट नए-नए काम कर सकते हैं।  अगर उत्पादन पूंजी के माध्यम से किया जाए और उसमें श्रम की भूमिका नहीं हो तो कंपनियों के जगह बदलने के निर्णय बदल जाते हैं। भारतीय और वैश्विक कंपनियों द्वारा परिपक्व जगहों पर रोबोटिक उत्पादन शुरू किया जाएगा ताकि लागत कम हो और बेहतर संस्थानों की स्थिरता प्राप्त हो। 
 
उस लिहाज से देखें तो भारत में उत्पादन पूंजी आधारित हो जाएगा और तब वह भारत में नहीं रहेगा। क्या हम अगले एक या दो दशक में संकट से दो चार होने वाले हैं? क्या हमारे यहां रोजगार खत्म होंगे? मुझे लगता है ये आशंकाएं अतिरंजित हैं।  दरअसल तकनीकी उन्नति जितनी दिख रही है उससे कहीं कम है। कृत्रिम बुद्घिमता शब्द बहुत भ्रामक है। आज जो मॉडल काम कर रहे हैं वे सांख्यिकीय हैं, वहां कोई बुद्घिमता नहीं है। गहरी समझ से तात्पर्य कहीं अधिक दूरगामी अंतर्दृष्टिï से है। यहां गहरे से एक खास तरह के गणितीय मॉडल के प्रकारों से है। यहां ज्ञान की गहराई से कोई लेनादेना नहीं है। 
 
कुछ उदाहरण बहुत जानकारीपरक हैं। कार निर्माता कंपनी टेस्ला रोबोटिक विनिर्माण को लेकर काफी उत्साहित है। परंतु उसे लग रहा है कि आज के बेहतरीन से बेहतरीन रोबोट भी कुछ बेहद सामान्य काम करने तक में नाकाम हैं। ऐसी ही एक प्रक्रिया में एक रोबोट फाइबर ग्लास की मैट को एक बैटरी के ऊपर रखने में नाकाम रहा। एलन मस्क ने गत अप्रैल में कहा था कि मनुष्य की क्षमताओं को बहुत कम करके आंका गया है।  इंसान जटिलता, अनिरंतरता और तयशुदा मार्ग से विचलन से आसानी से निपट लेते हैं। कई वैश्विक कार निर्माताओं ने कार असेंबली के काम को स्वचालित करने का प्रयास किया लेकिन नाकाम रहे क्योंकि रोबोट असेंबली करने वाले कर्मियों की तरह हाथ, आंख और दिमाग के तालमेल से काम नहीं कर पाते। जब कोई काम ठीक से नहीं हो रहा हो तो इंसान रुक जाते हैं और सामान्य समझ के भरोसे समस्या को हल करने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सामान्य कामगार भी समझ के मामले में दुनिया के बढिय़ा से बढिय़ा रोबोट से अच्छा होता है। 
 
चैटबॉट पर विचार कीजिए। कुछ साल पहले कंप्यूटर में रुचि रखने वाले लोग कहते थे कि चैटबॉट मानव चैट ऑपरेटरों की भूमिका को समाप्त कर देंगे। परंतु धीरे-धीरे यह स्पष्टï हो गया कि रोबोट इस मामले में एक साधारण बीपीओ कर्मी तक से पीछे है। आज तक कंप्यूटर इंसानों के साथ सामान्य चैट तक करने में सफल नहीं हो सके हैं।  गूगल ने हाल ही में अपने नए डुप्लेक्स सिस्टम के उदाहरण पेश किए जहां एक रोबोट रेस्तरां को फोन करता है और फोन उठाने वाले व्यक्ति से बात करता है और अपने लिए बुकिंग कराता है। 
 
कुछ मामलों में यह जीत की तरह है। उनके बीच की बातचीत सुनकर उत्साहित होना स्वाभाविक है। परंतु अगर आप ध्यान से सुने तो वहां सामान्य बुद्घिमता तक नजर नहीं आती है। जिस तरह कोई कंप्यूटर तय प्रोग्राम के मुताबिक शतरंज खेलता है उसी तरह यह कंप्यूटर रेस्तरां में फोन करके बुकिंग करने के लिए प्रोग्राम किया गया है। यहां कोई बुद्घिमता नहीं है।  डेटा की गुणवत्ता और मात्रात्मकता में सुधार हुआ है। हमारा प्रदर्शन बेहतर हो रहा है। इससे एक नई दिलचस्प व्यवस्था सामने आई है जो सीमित समस्याओं को हल करने में कारगर है। यह निस्संदेह प्रगति है और हमें इन संभावनाओं का पूरा लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। परंतु हमें इन संभावनाओं को बहुत बढ़ाचढ़ाकर नहीं पेश करना चाहिए। अभी मनुष्य जैसी बुद्घिमता परिदृश्य में कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। 
 
भारतीय जन नीति के विचार से देखें तो बड़े पैमाने पर रोजगार का नुकसान होने की कोई आशंका नहीं है। वैश्विक वस्तु एवं सेवा का काफी उत्पादन भारत के लिए उपयुक्त बना रहेगा। हमारे लिए अभी भी बहुत अवसर हैं बस हमें एकजुट तरीके से उनका लाभ लेना होगा।  व्यापक तौर पर देखें तो नीतिगत क्षेत्र को लेकर पारंपरिक सोच प्रासंगिक है। हमें कुशल श्रम शक्ति का विकास करना होगा जहां लोग हर कुछ वर्ष में नया काम सीख सकें और बदलते विश्व से तालमेल बिठा कर रख सकें। देश में उत्पादन केंद्रित करने के क्षेत्र में बुनियादी विकास और श्रम शक्ति की समस्याएं रही हैं। ये गतिरोध हमें दूर करने होंगे। 
 
हमें यह समझना होगा कि पूंजी आधारित उत्पादन को विकसित देशों में रखना तार्किक विचार है क्योंकि पूंजी की लागत कम पड़ती है और पूरी प्रक्रिया में स्थिरता आती है। विभिन्न फर्मों को अपने हित का ध्यान रखते हुए पहल करनी चाहिए और हमें भी उन पर अपना उत्पादन भारत में करने का विचार थोपना नहीं चाहिए।  स्थानीय और विदेशी निवेशक संस्थागत गुणवत्ता के मामले में भारत की तुलना विकसित लोकतांत्रिक देशों से कर रहे हैं। हमें पूंजी आधारित परियोजनाओं की स्थिति बेहतर करने के लिए निवेश में सुधार करना होगा। हमें ऊर्जा नीति का नीतिगत ढांचा तैयार करना चाहिए ताकि देश को सस्ती बिजली मिले, हमें  वित्तीय क्षेत्र में सुधार करने की आवश्यकता है और मजबूत कर नीति की भी। इनकी मदद से हम पूंजी की लागत कम कर पाएंगे। ऐसे संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है जो स्थिरता ला सकें और विधि का ऐसा शासन सुनिश्चित कर सकें जो निजी क्षेत्र को सुरक्षित महसूस करा सके। 
Keyword: AI, jobs, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई,
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