बिजनेस स्टैंडर्ड - ई-वे बिल से नहीं घटी मुश्किल
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ई-वे बिल से नहीं घटी मुश्किल

मयंक जैन / नई दिल्ली/लखनऊ 06 27, 2018

1 अप्रैल से देश भर में शुरू की गई ई-वे बिल व्यवस्था
पहले तीन दिनों में तैयार हुए थे 1.7 लाख बिल
ई-वे बिल से यात्रा का समय कम होने की कही जा रही थी बात
जमीनी स्तर पर स्थिति अलग, बिलों को तैयार करने में लगताहै लंबा वक्त
ट्रक चालकों के मुताबिक एक निरीक्षण में ही 45 मिनट का समय लगता है

बिजनेस स्टैंडर्ड ई-वे बिल से नहीं घटी मुश्किलदेवेंद्र कुमार को अपने ट्रक में दिल्ली से माल भरकर लखनऊ पहुंचने के लिए जरूरी ई-वे बिल करीब 72 घंटे के इंतजार के बाद शनिवार सुबह मिला। कुमार खुद अपना ट्रक चलाते हैं और बड़ी लॉजिस्टिक कंपनियों के साथ ठेके पर काम करते हैं, जो उन्हें नियमित रूप से डिलिवरी का काम देती हैं। देवेंद्र के साथ इस संवाददाता ने भी दिल्ली से लखनऊ तक ट्रक में सफर कर ई-वे बिल और जीएसटी के बाद की स्थितियों का जायजा लिया।

देवेंद्र ने इस संवाददाता को लखनऊ का सफर तय करते हुए बताया कि ट्रक चालकों को डिपो में कम से कम 48 से 72 घंटे इंतजार करना पड़ता है क्योंकि कंपनियां समय पर ई-वे बिल नहीं देती हैं। इतना ही नहीं, कई बार दस्तावेज इतने जटिल होते हैं कि ट्रक चालकों को डिपो में एक घंटा यह समझने में लग जाता है कि अलग-अलग बिल किसके लिए है। 

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली के तहत ई-वे बिल इस साल 1 अप्रैल को शुरू किए गए थे ताकि प्रत्येक राज्य की पारगमन पास व्यवस्था को समाप्त कर वाहनों के यात्रा समय को कम किया जा सके। माना जाता है कि ई-वे बिल 50,000 रुपये से अधिक कीमत के सामान के लिए होते हैं और यह बिल ट्रांसपोर्टर या माल भेजने वाले तैयार करेंगे। हालांकि ट्रांसपोर्टर को खेप के प्रत्येक बिल के लिए खुद ई-वे बिल तैयार करने होते हैं। ट्रांसपोर्ट डिपो में तैनात अजय के लिए यह सबसे बड़ी सिरदर्दी है। उन्हें कंप्यूटर पर प्रत्येक बिल के लिए अलग-अलग बहुत से ई-वे बिल तैयार करने पड़े।

वह आरोप लगाते हैं कि सरकार ट्रांसपोर्टरों की दिक्कतों पर ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने कहा, 'प्रत्येक ट्रक को डिपो से बाहर निकलने के लिए कम से कम दो घंटे कागजी कार्रवाई में लगाना होता है। ऐसे में नई व्यवस्था को बेहतर कैसे कहा जाए?' हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि माल के अवैध परिवहन और राज्य कर कार्यालयों में भ्रष्टाचार जरूर कम हुआ है। अजय ने कहा कि एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के रूप में वे इस प्रणाली में कुछ बदलाव चाहते हैं ताकि प्रत्येक ट्रक चालक के लिए जरूरी ई-वे बिल तैयार करने, सत्यापन और चालकों को मुहैया कराने का काम का बोझ कम हो।

 ट्रक चालकों को शिक्षित करने की चुनौती बड़ी है क्योंकि ज्यादातर चालक जांच से डरते हैं और प्रमुख राजमार्गों पर पूछताछ करने वाले इंस्पेक्टरों से बचने के लिए आम तौर पर लंबा रास्ता पकड़ते हैं। देवेंद्र ने कहा कि उन्होंने नया आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पकडऩे के बजाय उत्तर प्रदेश के देहाती इलाकों की टूटी-फूटी सड़कें पकड़ीं।  देवेंद्र को गांवों से होकर लंबा रास्ता तय करने में 4 घंटे ज्यादा लगे, लेकिन फिर भी वह निरीक्षण से नहीं बच पाए।

राज्य के बाईपास पर सड़क निर्माण का काम होने से ट्रक को राज्य के राजमार्ग पर लाना पड़ा, जहां अधिकारियों ने ट्रक को रोक लिया और दस्तावेज दिखाने को कहा। प्रत्येक बिल के बारे में बताने में करीब 45 मिनट का समय लगा। इसके बाद इंस्पेक्टर ने देवेंद्र को जाने दिया। देवेंद्र ने अपने लंबा चक्कर लगाकर पहुंचने के अपने फैसले को तर्कसंगत ठहराते हुए कहा, 'अगर मैं प्रत्येक नाके पर 45 मिनट खर्च करूंगा और लखनऊ तक के 600 किलोमीटर के रास्ते में 3 नाके मिलेंगे तो मुझे दो घंटे की देरी होगी।'

लेकिन किस्मत उनके साथ नहीं थी।  निरीक्षण अधिकारियों का एक दूसरा दल आगरा शहर में प्रवेश से पहले खड़ा था, जो किसी-किसी ट्रक को रोक रहा था और देवेंद्र को नाके पर बुला लिया गया। इस बार भी वही प्रक्रिया दोहराई गई। लेकिन इस बार देवेंद्र से खेप के सामान की वास्तविक मात्रा और ब्रांड के बारे में सवाल पूछे गए, जिनका वह जवाब नहीं दे सका। इसके बाद उसने डिपो में अजय को कॉल किया, जिन्होंने इंस्पेक्टर से बात की और उन्हें संतुष्ट किया।

यहां तक कि दिल्ली-लखनऊ मार्ग पर विभिन्न जगहों पर टोल बूथ भी भ्रष्टाचार के गढ़ हैं।  भारी वाहन चालक हल्के वाणिज्यिक वाहनों की पर्ची बनवा लेते हैं। इनकी कीमत में अंतर राज्य के अंदरूनी टोल पर अमूमन करीब 300 रुपये होती है। इसके लिए वे टोल अधिकारी को 100 रुपये देते हैं और 200 रुपये अपनी जेब में डाल लेते हैं। देवेंद्र ने कहा, 'हमारी यही कमाई है। इससे यात्रा के दौरान खाने-पीने पर होने वाला खर्च निकलता है।'

देवेंद्र ने दो चेकनाकों से गुजरने और दो घंटे की देरी के बाद राजमार्गों को पूरी तरह छोडऩे और ओरैया, फैजाबाद सिकोहाबाद जैसे छोटे कस्बों एवं गांवों से होकर कानपुर में करीब रात 2 बजे प्रवेश किया। वह नींद और सड़क निर्माण के कारण धीमे यातायात से जूझते हुए लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर में रात 4 बजे पहुंचे।  

उन्होंने कहा, 'ई-वे बिलों से हमारे लिए आसानी होनी चाहिए थी लेकिन अब ट्रांसपोर्टरों के पास समय पर दस्तावेज नहीं मिलने का बहाना है और वे हमें लगातार कई घंटों चलने के लिए मजबूर कर सकते हैं।'

Keyword: e way bill, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,, ई-वे बिल, कंपनियां,
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