बिजनेस स्टैंडर्ड - बुनियादी विकास और ऋण बाजार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, December 15, 2018 10:20 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बुनियादी विकास और ऋण बाजार

नितिन देसाई /  06 26, 2018

बुनियादी विकास से जुड़ी नीति, बैंक संचालन और ऋण बाजार में सुधार की मदद से भविष्य में फंसे हुए कर्ज के संकट से बचाव संभव है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

नीति निर्माता कई ऐसी समस्याओं से दो चार हैं जिनके मूल में एक ही वजह है। वह वजह है एक तार्किक नीति ढांचे का निर्माण न कर पाना और लंबी अवधि की बुनियादी परियोजनाओं के लिए प्रभावी वित्तीय व्यवस्था नहीं बना पाना। बैंकों में फंसे हुए कर्ज की बढ़ती समस्या, निवेश में ठहराव और निजी-सार्वजनिक भागीदारी की व्यवहार्यता को लेकर निवेशकों की चिंता आदि सभी का संबंध पूंजी बाजार की कमी से है। बुनियादी परियोजनाओं को अपरिपक्व पूंजी बाजार से चुनौती मिल रही है। उनकी फंड की जरूरतें मौजूदा उपलब्ध फंड की तुलना में काफी अधिक हैं। वे व्यापक तौर पर विनियमित माहौल में काम करते हैं जहां आर्थिक तार्किकता पर राजनीतिक आकलन भारी पड़ते हैं। 
 
उदारीकरण के पहले के दौर में बुनियादी परियोजनाओं के लिए फंडिंग पूरी तरह बजट प्रावधानों और विशिष्ट ऋण संस्थानों पर निर्भर होती थी जो अद्र्ध आधिकारिक वित्त को संचालित करते थे। बहरहाल, कई तरह के दबाव बनने के बाद निजी-सार्वजनिक उपक्रम व्यवस्था अपनाई गई। बुनियादी विकास के क्षेत्र में लगे सरकारी उपक्रमों के प्रदर्शन की लागत और समय पर काम पूरा न होने के कारण काफी आलोचना हुई। इसके अलावा भ्रष्टाचार और खराब वित्तीय प्रदर्शन भी आलोचना की वजह रही। इसके साथ ही बजट आवंटन केंद्र और राज्य में दबाव में आते क्योंकि सत्ताधारी दलों को राजनीतिक वजहों से संसाधनों को लोकलुभावन कामों में खर्च करना पड़ता। राजनीतिक वजहों से नीतियों का मूल्यांकन अतार्किक हुआ और बुनियादी क्षेत्र के सरकारी उद्यमों की वित्तीय व्यवहार्यता को नुकसान पहुंचा।
 
इन दबावों और निजी क्षेत्र के पूर्वग्रह उदारीकरण की प्रक्रिया में नजर आते हैं। हमने सन 1991 के बाद निजी निवेश और प्रबंधन को बुनियादी ढांचा क्षेत्र में शामिल करने के कई प्रयास किए। सड़क, बंदरगाह, हवाई अड्डा और बिजली उत्पादन आदि के क्षेत्र में कई परियोजनाओं की शुरुआत की गई लेकिन नीतिगत सुधार नहीं किए गए। इस बीच अधिकांश जोखिमों का बोझ निजी क्षेत्र के कंधे पर डाल दिया गया। इन परियोजनाओं के लिए काफी हद तक बैंक ऋण पर भी निर्भरता रही।  कुछ मामलों में मसलन बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के मामले में जहां राजनीतिक बाधाएं बहुत कम हों, वहां निजी सार्वजनिक भागीदारी अपेक्षाकृत बेहतर रही। परंतु कई अन्य जगहों पर कंपनियों को दिवालिया भी होना पड़ा और बैंकों को फंसे कर्ज में इजाफे के बावजूद कर्ज देना पड़ा।
 
भारतीय बैंक उदारीकरण के बाद टर्म फाइनैंसिंग के काम में लगे। बुनियादी परियोजनाओं के लिए उनका ऋण सन 1998 से 2015 के बीच सालाना 42 फीसदी की दर से बढ़ा। कुल मिलाकर बुनियादी क्षेत्र में बैंकों का बकाया ऋण मार्च 1998 के 30 अरब रुपये से बढ़कर मार्च 2016 तक 96.5 खरब रुपये हो गया। यानी सकल ऋण में इसकी हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई। बुनियादी ऋण पारंपरिक बैंक ऋण की तरह नहीं होता है जो आमतौर पर कार या घर खरीदने के लिए दिया जाता है। वहां तो कर्ज लेने वाली की क्षमता का आकलन बैंक शाखा के स्तर पर किया जा सकता है। बुनियादी परियोजनाओं को ऐसे फंड की आवश्यकता होती है जो शाखा स्तर के लेनदेन से काफी आगे की बात है। वहां क्षेत्रवार जोखिम, प्रवर्तक की स्थिति और कारोबारी संचालन पर नजर रखनी होती है। इस तरह के ऋण लंबी अवधि के होते हैं।
 
क्या हमारे वाणिज्यिक बैंकों में यह क्षमता है कि वे पारंपरिक बैंकिंग से इतर इन परियोजनाओं की क्षमता और इनसे जुड़े जोखिम का आकलन कर सकें? क्या हमने सरकारी बैंकों के संचालन को पेशेवर बनाया है और उनमें सरकार के हस्तक्षेप को रोकने का प्रयास किया है? क्या बैंकों के पास अपने ऋण डिफॉल्ट के उच्च जोखिम के प्रबंधन की कोई कारोबारी योजना है? बहुत खेद की बात है कि इन सब का उत्तर न है।  इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है? फंसे हुए कर्ज की रिपोर्टिंग के मानक कड़े करने, सरकारी बैंकों में नई पूंजी डालने और दिवालियापन के नए प्रावधान के रूप में कुछ कदम उठाए गए हैं। ये कदम अस्थायी निदान दिला सकते हैं लेकिन इनसे यह समस्या पूरी तरह समाप्त होती नहीं दिखती।
 
हमें और अधिक कदम उठाने होंगे। बुनियादी विकास की नीति पर पुनर्विचार, सरकारी बैंकों के प्रबंधन और संचालन में सुधार तथा कॉर्पोरेट ऋण उपायों के लिए प्रभावी बाजार तैयार करना आदि इसका हिस्सा हैं। ऐसा करके बैंक वित्त पर निर्भरता कम की जा सकती है। बुनियादी विकास के लिए सुसंगत योजना और क्रियान्वयन में तालमेल की आवश्यकता होती है। खासतौर पर तब जबकि नेटवर्क लिंकेज महत्त्वपूर्ण हो। इसके लिए ऐसी मूल्य व्यवस्था चाहिए जो व्यवहार्य हो। निजी सार्वजनिक उपक्रम पर अधिक निभर्रता से उक्त नियोजन टूट सकता है और कीमतों का राजनीतिकरण हो सकता है। चीन का तेज बुनियादी विकास ऐसी साझेदारियों पर निर्भर नहीं था। हमें बुनियादी विकास के लिए निजी और सरकारी क्षेत्र के संतुलन पर ध्यान देना होगा। सरकारी बैंकों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराना होगा। निजीकरण राजनीतिक रूप से अव्यवहार्य है और निजी क्षेत्र के कारोबारी प्रशासन की कमियों को देखते हुए इसका इस्तेमाल उचित भी नहीं है। परंतु वित्तीय सेवा विभाग के अंतर और सरकारी बैंकों पर रिजर्व बैंक को निजी बैंकों जैसे अधिकार देकर शुरुआत की जा सकती है। अधिकाधिक निजी निवेशकों को साथ लाने, काबिल पेशेवरों के रोस्टर से बोर्ड बनाकर तथा शीर्ष प्रबंधकों को लंबा कार्यकाल देकर राह आसान की जा सकती है।
 
लंबी अवधि के ऋण के लिए बैंकों को प्रमुख उपकरण के रूप में अमल में नहीं लाना चाहिए। फिलहाल फंसे हुए कर्ज और सतर्कता के दबाव में पहले ही वे बड़ी परियोजनाओं को ऋण नहीं दे रहे। लंबी अवधि में हमें कारोबारी ऋण का एक प्रभावी बाजार तैयार करना होगा ताकि बैंकों पर निर्भरता कम हो। विकसित देशों में डेट और बैंक ऋण के बीच लंबी अवधि का ऋण 20:80 में बंटा रहता है। विकासशील देशों में यह अनुपात 55:45 का है। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार बीते एक दशक में सालाना 22 फीसदी की दर से बढ़ा है। परंतु द्वितीयक बाजार कमजोर है और निजी ऋण परिसंपत्तियों का नकदीकरण हो सकता है। हमें बड़े संस्थागत निवेशक जुटाने के लिए, ऋण डिफॉल्ट की स्वैपिंग और ब्याज दर वायदा में जोखिम की हेजिंग के लिए शीर्ष श्रेणी की प्रतिभूतियों की आवश्यकता है।  हमने ऋण बाजार की तात्कालिक चुनौतियों से निपटने के उपाय तो अपनाए हैं। अब हमें सुधारों की ओर बढऩा चाहिए जो व्यवस्था को चाक चौबंद करें और फंसे हुए कर्ज की समस्या का दोहराव रोकें।
Keyword: infrastructure, bank, loan, बुनियादी विकास,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या राफेल सौदे पर अब थम जाएगा विवाद?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.