बिजनेस स्टैंडर्ड - प्लास्टिक पर प्रतिबंध
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प्लास्टिक पर प्रतिबंध

संपादकीय /  06 26, 2018

महाराष्ट्र सरकार ने प्लास्टिक की सामग्री के निर्माण, इस्तेमाल, बिक्री, वितरण और भंडारण पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय किया है। उसके इरादों पर किसी तरह की बहस की गुंजाइश नहीं है। जहरीले कचरे का उत्पादन रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। हालांकि हमारे देश में इसकी प्रति व्यक्ति खपत कम है लेकिन फिर भी कचरा प्रबंधन के खराब बंदोबस्त और देश की विशाल आबादी को देखते हुए वैश्विक स्तर पर इस जहरीले कचरे में हमारा योगदान काफी अधिक हो जाता है।  इससे देश की जमीन तो प्रदूषित हो ही रही है, साथ ही पेयजल संक्रमण, पालतू पशुओं की मौत, नदियों में प्रदूषण भी हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक समुद्र में होने वाले वैश्विक प्रदूषण में भारतीय नदियों का योगदान 60 फीसदी है।

स्वास्थ्य और पर्यावरण को होने वाली हानि को देखते हुए विकल्प की तलाश करना आवश्यक है। हालांकि उद्योग जगत का कहना है कि सरकार के इस निर्णय के चलते करीब 3 लाख लोग बेरोजगार होंगे और समूची मूल्य शृंखला पर इसका नकारात्मक असर होगा। परंतु एक स्वच्छ पर्यावरण निश्चय ही स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को भी कम करेगा। इससे हम अपनी भविष्य की पीढिय़ों के लिए जैव विविधता भी बचा पाएंगे। इतना ही नहीं जूट और पुनर्चक्रित होने वाले प्लास्टिक जैसी श्रेणियों के साथ रोजगार के नए अवसर भी सामने आएंगे। कपड़े से बनने वाले थैलों का उत्पादन यकीनन मशीन से बनने वाली प्लास्टिक थैलियों की तुलना में अधिक रोजगार देगा।

 इस उपाय का क्रियान्वयन और परीक्षण देखने वाली बात होगी। हालांकि महाराष्ट्र प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने वाला देश का 25वां राज्य है। मोटे तौर पर यह एक उच्च औद्योगीकृत राज्य है और देश में प्लास्टिक कचरे का सबसे अधिक उत्पादन यहीं होता है। राज्य से सालाना 4.60 लाख टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। देश के अधिकांश राज्यों में इस प्रतिबंध का अनुपालन ठीक तरह से नहीं होता। हालांकि उत्साहित करने वाली खबरें भी आती हैं।

उदाहरण के लिए सिक्किम ने सन 1998 में प्रतिबंध लगाने के बाद प्लास्टिक का इस्तेमाल काफी कम कर दिया है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने का दावा है। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने संबंधी कोई भी नीति ऐसी बनाई जानी चाहिए कि वह लोगों के व्यवहार में कई स्तरों पर बदलाव को प्रोत्साहित करे। यूरोपीय संघ के देश कुछ तरह के प्लास्टिक के इस्तेमाल पर भारी जुर्माना लगाते हैं और वहीं पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन देते हैं। उनका कचरा प्रबंधन तंत्र भी बहुत बेहतर है।

भारत ने ऐसा कुछ नहीं किया है। हालांकि प्रधानमंत्री ने इस वर्ष पर्यावरण दिवस पर कहा था कि देश में एक बारगी इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक का चलन सन 2022 तक बंद कर दिया जाएगा। परंतु इसके लिए कोई योजना नहीं बनाई गई। महाराष्ट्र का नीतिगत ढांचा भी आदर्श नहीं है। सरकार ने मौजूदा भंडार को खत्म करने और विकल्प तलाशने के लिए तीन महीने का वक्त दिया है। उल्लंघन करने वालों पर भारी भरकम जुर्माना लगाने और जेल की सजा देने की बात भी कही गई है।

आम जनता और प्लास्टिक का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों के बीच काफी भ्रम है कि कौन सी श्रेणी इस्तेमाल के लायक है और कौन सी प्रतिबंधित। जाहिर है जनता के बीच इसे बेहतर ढंग से पहुंचाया जा सकता था। उपभोक्ताओं को प्लास्टिक समेत तमाम कचरे के निपटान के बारे शिक्षित करना भी जरूरी है। तभी ऐसे प्रतिबंध प्रभावी होंगे। इसके लिए धैर्य की आवश्यकता है। जहरीले प्लास्टिक की समस्या रातोरात नहीं खत्म होगी। आम जन का व्यवहार बदलने में सालों लग सकते हैं। महाराष्ट्र ने अच्छी पहल की है लेकिन इसके साथ समुचित नीतिगत उपाय भी होने चाहिए।

Keyword: mumbai, plastic, ban, महाराष्ट्र, प्लास्टिक,
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