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पीयूष गोयल की कमान पर जेटली का भी पूरा ध्यान

अरूप रायचौधरी और आदिति फडणीस /  06 25, 2018

इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह से ही यह साफ हो गया था कि वित्त मंत्री अरुण जेटली की जगह लेने के लिए कोई व्यक्ति तलाशना होगा। उस समय जेटली अस्पताल में भर्ती थे। उनका गुर्दा प्रत्यारोपण से पहले डायलिसिस चल रहा था। नए व्यक्ति को तलाशना केवल वित्त और कंपनी मामलों के मंत्रालयों को संभालने के लिए ही जरूरी नहीं था बल्कि विश्व-बैंक-आईएमएफ की बैठक में हिस्सा लेने की तात्कालिक जरूरत को भी पूरा करना था। इस बैठक में हमेशा वित्त मंत्री शिरकत करते हैं।  

बैठक से पहले तक प्रधानमंत्री मोदी ने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। लेकिन साफ है कि मोदी इस बैठक में हिस्सा नहीं ले सकते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने कई संभावनाओं पर विचार किया। वित्त राज्य मंत्रियों पर भी विचार किया जा सकता था, लेकिन क्या यह सबसे बेहतर पसंद होती? खुद जेटली ने सुझाव दिया था कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को भारतीय प्रतिनिधिमंडल की नेता बना दिया जाए। आखिर में प्रधानमंत्री कार्यालय ने फैसला किया कि आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल प्रतिनिधिमंडल की अगुआई करेंगे और जरूरत पड़ी तो विश्व बैंक के प्रमुख से भी मिलेंगे। इसके बाद कुछ सप्ताह के भीतर ही पीयूष गोयल को वित्त मंत्री बना दिया गया।  

गोयल अर्थव्यवस्था पर तेल की ऊंची कीमतों के असर को लेकर विशेष रूप से चिंतित थे। इसके समाधान का एक तरीका उत्पाद शुल्क में कटौती हो सकता था। हालांकि अधिकारियों ने कहा कि इस विकल्प को अपनाने का राजकोषीय घाटे पर असर होगा। जिस समय बहुत से मंत्रालय 'तेल की कीमतों के दीर्घकालिक समाधान' का संकेत दे रहे थे, उसी समय वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सीधे शब्दों में बताया कि पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में एक रुपये प्रति लीटर की कटौती करने से ही 140 अरब रुपये के राजस्व का नुकसान होगा और ऐसा न करने का पुरजोर सुझाव दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने मई में इस मसले पर एक बैठक बुलाई। कुछ दिनों में जेटली ने एक ब्लॉग पोस्ट में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। 

जेटली को गुर्दे का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण होने के बाद 4 जून को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। उन्होंने वित्त सचिव हसमुख अढिया, आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष गर्ग और मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के साथ वीडियो-कॉन्फें्रस की। जेटली के सहयोगियों ने कहा कि उन्होंने उस कामकाज का जायजा लिया, जो उनकी गैर-मौजूदगी में किया जा रहा था। उन्होंने वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आर्थिक और नीतिगत मसलों पर विचार-विमर्श किया। ऐसा होने के बाद सोशल मीडिया और सत्ता के गलियारों में कयासों का खेल शुरू हो गया। ये कयास लगाए जाने लगे कि वित्त मंत्रालय पर नियंत्रण किसके हाथों में है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि जेटली को प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर 'बिना मंत्रालय वाला मंत्री' बताया गया है। 

 

एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'जेटली पार्टी और सरकार के एक वरिष्ठ व्यक्ति होने के नाते फैसलों की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों की सलाह पर एहतियात बरतते हुए जेटली लोगों से कम संवाद कर रहे हैं। लेकिन वह न केवल अधिकारियों और मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ नियमित रूप से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर रहे हैं।'  माना जा रहा है कि जेटली को वित्त मंत्रालय और सरकार के सभी प्रमुख फैसलों और काम से अवगत कराया जा रहा है। दरअसल एयर इंडिया पर मंत्री समूह की वह बैठक जेटली के निवास पर हुई, जिसमें इस सरकारी विमानन कंपनी की बिक्री प्रक्रिया को टालने का फैसला किया गया।  इसके अलावा मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अपना कार्यकाल समाप्त होने से काफी पहले ही पद छोडऩे के अपने फैसले की जेटली को सूचना दे दी थी। इसलिए मुख्य आर्थिक सलाहकार का इस्तीफा भी जेटली को भेजा गया। 

 

जहां तक आधिकारिक काम का सवाल है, गोयल वित्त मंत्री हैं। उनके पास फाइलें जाती हैं, वह कैबिनेट बैठकों और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। मंत्रालय के 5 सचिव उन्हें ब्योरा देते हैं और दैनिक कामकाज का अंतिम फैसला वही करते हैं। हालांकि बहुत सा काम प्रधानमंत्री कार्यालय और संयुक्त सचिव ब्रजेंद्र नवनीत करते हैं।  कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि चर्चाओं से दूर रहने वाले कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा को वित्त सलाहकार का लंबा अनुभव (करीब 7 वर्ष) है और वह व्यय की बारीकियों और नीतियों को अन्य किसी व्यक्ति से बेहतर समझते हैं। 

 

गोयल को 14 मई को वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। इसलिए उन्होंने जो काम किया है, उसमें सबसे ज्यादा दिखने वाला काम सार्वजनिक बैंकों पर है। वह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों से एक बार मुंबई और एक बार दिल्ली में मिल चुके हैं। इसकी वजह यह है कि केंद्र सरकार बैंकों के फंसे कर्ज, सुदृढ़ीकरण योजना, पुनर्पूंजीकरण की जरूरत और नीरव मोदी जैसे वित्तीय अपराधों से जूझ रही है।  हालांकि गोयल पहले ही इस बात पर जोर देते रहे हैं कि बैंक ऋण देना, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों को कर्ज देना शुरू करें।

वित्त मंत्री के रूप में गोयल के कार्यकाल के दौरान सबसे बड़ी नीतिगत घोषणा यह रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) को विशेष उद्देश्य कंपनी (आस्ति पुननिर्माण कंपनियां या आस्ति प्रबंधन कंपनियां) में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव फिर से एजेंडा में आ गया है। बैंक अधिकारियों का एक समूह ऐसे कदम की व्यवहार्यता का फैसला लेगा। इस बीच जेटली निष्क्रिय नहीं हैं। वह राजनीतिक और नीतिगत मसलों पर नियमित रूप से फेसबुक और ट्विटर पर टिप्पणी कर रहे हैं। वह अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद फेसबुक पर आठ ब्लॉग लिख चुके हैं। इनके विषय दिवालिया संहिता, तेल कीमतें एवं कराधान, राहुल गांधी, अन्य विपक्षी नेता, न्यायिक नियुक्तियां और आपातकाल आदि हैं। 

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