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चुनावी जीत के प्रयास में दांव पर लगा कश्मीर

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  06 25, 2018

इंदिरा गांधी को छोड़ दिया जाए तो आजादी के बाद की कोई भी सरकार देश के संस्थानों की अक्षुण्णता को लेकर इतनी गैरजिम्मेदार नहीं थी जितनी कि मौजूदा सरकार है। इसके तमाम प्रमाण मौजूद हैं। सांस्कृतिक संस्थानों में पार्टी से जुड़े लोगों को पदस्थापित किया गया है, न्यायपालिका को क्षति पहुंची है, सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है और माहौल शैक्षणिक संस्थानों के भी खिलाफ है। देश का पूर्वी और दक्षिणी हिस्सा हाशिये पर है और मीडिया भयभीत है। इन सब बातों के बीच लापरवाही का सबसे अधिक चिंतित करने वाला पहलू है कश्मीर मसले के साथ ठीक से निबाह न करना। 

किसी ने यह दलील तक देने की कोशिश नहीं की कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कश्मीर की गठबंधन सरकार से बाहर होने का निर्णय कुछ और नहीं बल्कि देश में अन्य चुनाव जीतने के लिए सोच विचारकर उठाया गया कदम है। भाजपा द्वारा कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पीडीपी (पीडीपी) के साथ गठबंधन करना भी एक पहेली थी। आखिर दोनों दल किन बिंदुओं पर साथ आ सकते थे। बहरहाल हुआ यह कि कश्मीर घाटी में मुख्यधारा की पत्रकारिता का और अवमूल्यन हुआ। हालात किस कदर खराब हुए इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के आम चुनाव में श्रीनगर लोकसभा सीट पर जहां 25 प्रतिशत मतदान हुआ था, वहीं पिछले साल हुए उपचुनाव में वह घटकर 7 प्रतिशत पर आ गया।
 
परंतु सरकार से बाहर निकलने के बाद से भाजपा का व्यवहार और अधिक खराब हो गया। टेलीविजन एंकर तो जाने कब से अपने कार्यक्रमों में कश्मीरी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अमानवीय रुख अपनाने की वकालत कर ही रहे थे, भाजपा ने भी सत्ता से बाहर निकलते ही गहरे धु्रवीकरण के साथ खतरनाक संदेश देना शुरू कर दिया। भाजपा आईटी सेल ने शुक्रवार को ट्विटर पर एक हैशटैग चलाया जिसका कहना था कि कांग्रेस और पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा के बीच गठबंधन है। यह सीधी सपाट राजनीति नहीं है। यह अधिक खतरनाक इसलिए है क्योंकि भाजपा इसकी मदद से एक खास संदेश देने की कोशिश कर रही है। गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कश्मीर घाटी में सैन्य कार्रवाई आतंकियों के खिलाफ होनी चाहिए, आम लोगों के खिलाफ नहीं। सैफुद्दीन सोज ने चेतावनी देते हुए कहा कि कश्मीर घाटी में कई लोगों के लिए अब आजादी ही प्राथमिक विकल्प है। वहीं राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि कश्मीर घाटी में हमारे बहादुर जवानों के साथ कई निर्दोष लोग भी मारे गए। वहीं इसके उलट भाजपा यह दलील तैयार करने की कोशिश कर रही है कि सभी कश्मीरी स्वत: दोषी होते हैं और कोई भी व्यक्ति जो सतर्कता बरतने की बात कर रहा है या सावधानी से काम करने की मांग कर रहा है वह आतंकियों से मिला हुआ है। देश के अंतरिम वित्त मंत्री का ट्वीट भी यही कह रहा है। विधि एवं संचार मंत्री ने इस विषय पर एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया। भाजपा के एक वरिष्ठ प्रवक्ता ने ट्वीट किया कि लश्कर ए तैयबा के लिए राहुल गांधी की सहानुभूति से हर कोई परिचित है।
 
हर कोई अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का मजाक उड़ा रहा है। ऐसा हो भी क्यों नहीं आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यह दावा कर चुके हैं कि उनके पूर्ववर्ती ने पाकिस्तान के साथ षडयंत्र करके गुजरात की चुनाव प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। यह आज की भाजपा के बारे में काफी कुछ बताता है। बहरहाल, कांग्रेस भी कतई सहानुभूति की पात्र नहीं है। पार्टी या तो भारतीय राजनीति के इन नए सबकों का प्रतिरोध करते हुए आगे बढ़ेगी या फिर उसका अंत हो जाएगा।  दिक्कत यह है कि भाजपा की कोशिश कश्मीरियों को व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर खल चरित्र के रूप में पेश करना है। ऐसा करके वह हिंदी क्षेत्र में वोट हासिल कर सकती है। पार्टी के नेता कश्मीर घाटी की समूची आबादी के दमन की बात करते हैं। लोगों द्वारा स्थानीय कश्मीर पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की अत्यंत घृणित ढंग से अवमानना की जाती है उन सभी को इस्लामिक कट्टïरपंथियों के रूप में चित्रित किया जाता है। भाजपा के मन में यह भय समा गया है कि अपने निराशाजनक प्रदर्शन के चलते वर्ष 2019 के आम चुनाव में उसे देश के उत्तरी और पश्चिमी इलाकों में हार का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में भाजपा कश्मीर का इस्तेमाल चुनाव जीतने के हथियार के रूप में करने की फिराक में है। हमने इसके कुछ संकेत उस समय देखे जब तथाकथित 'सर्जिकल स्ट्राइक' को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले सरकार की उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया। उसकी इस कोशिश की सफलता ने भाजपा को इस बात की हिम्मत दी होगी कि वह वर्ष 2019 के आम चुनाव की होड़ में इस प्रक्रिया को और गहन तरीके से दोहराए। 
 
इस पूरी प्रक्रिया में कश्मीर जल रहा है। इसकी चिंता हम सब को होनी चाहिए। मैं यह बात केवल इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि तमाम वैचारिक असहमतियों से परे कश्मीरियों को भी संविधान प्रदत्त मानवाधिकार हासिल हों। बल्कि हम सब को यह बात स्वीकार करनी होगी कि हमारी गैरजिम्मेदारी और इसी दंड की आशंका न होने के कारण राज्य की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अलग-थलग पड़ गया है।  हमें फिलहाल उनके गुस्से को नियंत्रित करना होगा और लंबी अवधि के दौरान उनका दिल दोबारा जीतना होगा। अगर हमें देश की एकता और अखंडता को बनाए रखना है तो इसके अलावा कोई विकल्प हमारे पास नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी भी बार-बार इसी रुख को अपनाने की दलील देते थे। मनमोहन सिंह की इसी के ख्वाहिशमंद थे और खुद मोदी ने भी कुछ मौकों पर यही रुख दिखाया है। इस राज्य को लेकर अगर समझदारी नहीं दिखाई गई और सहज मानवीय रुख नहीं अपनाया गया तो केवल एक चुनाव जीतने की कोशिश में देश की एकता खतरे में पड़ जाएगी। 
Keyword: jammu, kashmir, BJP, PDP,,
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