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एलआईसी को बख्श दें

संपादकीय /  06 25, 2018

संकटग्रस्त आईडीबीआई बैंक में नई जान फूंकने के लिए विकल्प सुझाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि उनमें एक तरीका यह भी है कि भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) उसे खरीद ले। फिलहाल देश की सबसे बड़ी सरकारी बीमा कंपनी की आईडीबीआई बैंक में 11 प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी है। आईडीबीआई बैंक, बैंक राष्ट्रीयकरण अधिनियम के दायरे में नहीं आता है और इसलिए सरकार उसका नियंत्रण आसानी से बदल सकती है। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2016-17 के बजट भाषण में कहा था कि आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कम करने पर विचार किया जा रहा है। बहरहाल, अगर एलआईसी, आईडीबीआई को खरीदती है तो इसे निजीकरण नहीं कहा जा सकता। एलआईसी स्वयं एक सरकारी निगम है। सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि एलआईसी द्वारा की जाने वाली खरीद का निर्णय स्वयं आईडीबीआई बैंक और एलआईसी के बोर्ड द्वारा लिया जाएगा। परंतु यह आश्वासन भरोसेमंद नहीं है। सरकार ने अक्सर एलआईसी का इस्तेमाल अपने विनिवेश कार्यक्रम के लिए किया है। अब वह एलआईसी को बैंक सुधार और निजीकरण के काम में भी इस्तेमाल करना चाहती है।

 
एलआईसी द्वारा की जाने वाली खरीद से वास्तविक निजीकरण का लक्ष्य हासिल नहीं होगा।  निश्चित तौर पर एलआईसी के लिए भी बैंकिंग क्षेत्र में मौजूदगी की वजह हैं लेकिन अगर ऐसा ही है तो उसे बैंकिंग लाइसेंस प्रदान किया जाना चाहिए। उसे देश के सबसे संकटग्रस्त बैंकों में से एक को खरीदने के लिए मजबूर करना एक खतरनाक कदम होगा। एलआईसी का आईडीबीआई बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का कोई तुक ही नजर नहीं आता। आईडीबीआई बैंक के फंसे हुए कर्ज का अनुपात करीब 28 फीसदी है जो देश के बैंकिंग जगत के इतिहास में दूसरा सर्वोच्च स्तर है। गत वित्त वर्ष में बैंक को 82 अरब रुपये का शुद्घ घाटा हुआ। ऐसे में यह एलआईसी जैसे व्यवस्थित और महत्त्वपूर्ण संस्थान के लिए कतई जरूरी नहीं है। 
 
लब्बोलुआब यह कि सरकार बीमाधारकों के पैसे का इस्तेमाल संकटग्रस्त बैंक को उबारने में करना चाहती है। वह बीमा धारकों को एक ऐसे बैंक के पुनर्पूंजीकरण के लिए इस्तेमाल करना चाहती है जो ऋण देने के मामले में अक्षम साबित हुआ है। बीमाकर्ता की अपने ग्राहकों के प्रति एक जवाबदेही होती है। उसके काम के प्रति यह एक किस्म की अवमानना का भाव है जो अपने आप में चिंतित करने वाली बात है। कुल मिलाकर इससे सिर्फ एक पक्ष का लाभ होगा और वह है सरकार। फिलहाल सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य हासिल करने को लेकर जूझ रही है और उसके सामने राजकोषीय घाटे की समस्या भी मौजूद है। 
 
हाल के दिनों में सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र के संकटों से निपटने के लिए जो भी कदम उठाए हैं उनमें से कोई उत्साहवर्धक नहीं रहा है। अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने पंजाब नैशनल बैंक के प्रमुख सुनील मेहता के नेतृत्व में एक समिति के गठन की घोषणा की जो एक बैड बैंक की स्थापना पर विचार करेगी। यह उचित तरीका नहीं है क्योंकि इससे फंसे हुए कर्ज से निपटने के लिए उठाने जाने वाले कड़े कदम कुछ और दिनों के लिए लंबित हो जाएंगे। फिलहाल एक ऐसा बैंक है जिसका निजीकरण करके संचालन सुधार शुरू किए जा सकते हैं लेकिन यहां भी सरकार सरकारी क्षेत्र की एक संस्था के धन का दुरुपयोग करना चाहती है। इससे यह संकेत भी मिला है कि वह नियामकों को उचित छूट तय करने की ओर बढ़ रही है। अगर नियामक और एलआईसी बोर्ड सही मायनों में स्वायत्त हैं तो वे इस मामले में सरकारी दबाव को खारिज करके अपनी स्वायत्तता का प्रदर्शन भी करेंगे।
Keyword: IDBI bank, LIC, NPA,,
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