बिजनेस स?टैंडर?ड - योग से निरोग का बढ़ता उद्योग
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योग से निरोग का बढ़ता उद्योग

मानवी कपूर /  06 24, 2018

सरकार के नीतिगत समर्थन से योग अपनी जन्मस्थली में आखिरकार लोकप्रियता के नए मुकाम हासिल करने लगा है। मानवी कपूर ने इस उभरते उद्योग का लिया जायजा 

बिजनेस स?टैंडर?ड योग से निरोग का बढ़ता उद्योग

दिल्ली के एक महंगे जिम में मौजूद एक ह्रष्ट पुष्ट जिम प्रशिक्षक गुजारिश करते हुए कहते हैं, 'बस तीन बार और।' वह अपने 33 वर्षीय बैंकर ग्राहकों को प्रेरणा दे रहे हैं कि वह पांव दबाने वाली कसरत पूरी कर लें। उनका उत्साह बढ़ाने के लिए स्पीकर से संगीत की आवाज गूंज रही है। ठीक 30 मिनट बाद वह जिम प्रशिक्षक बिल्कुल बदला सा नजर आता है। अब एक शालीन व्यक्ति अपने छात्रों से धीमी आवाज में जिम की सबसे लोकप्रिय कक्षा, हठ योग की शुरुआत करने से पहले दिन के आहार नियमों, परहेज आदि के बारे में बात करते हैं। स्टूडियो के बाहर पुरुष और महिलाएं कतार से खड़ी हैं क्योंकि यहां जगह की कमी है। एक छोटी कद काठी की प्रौढ़ महिला ने स्टाइलिश रेसर-बैक टॉप और प्रिंट वाला टाइट्स पहना है। वह कहती हैं, 'आज दिन की छुट्ट है लेकिन मैंने सोचा कि कम से कम योग तो करना ही चाहिए।' 

भारत में ही योग की शुरुआत हुई है और अब यहां योग करने का रुझान बढऩे लगा है। अब वह दिन लद गए जब पुराने दौर में योग सीखने के लिए धोती पहने साधु और योगिनी का ही सहारा लिया जा सकता था। अब योग का दायरा बाबा रामदेव के नित्य दिनचर्या वाले योग और उनके योग शिविरों, श्री श्री रविशंकर के आध्यात्मिक पुट वाले योग और कॉरपोरेट शैली में जग्गी वासुदेव उर्फ सद्गुरु के निरोग रहने की योगशैली से काफी आगे बढ़ चुका है। इस बदलाव में केवल सफल पश्चिमी फॉर्मूले का अनुसरण करना ही शामिल नहीं है जिसकी वजह से योग ने युवाओं को आकर्षित किया है बल्कि यह शहरी पेशेवर लोगों के लिए दिमाग और शरीर का व्यायाम बनता जा रहा है।

आजकल योग कक्षाओं से जुडऩा भी फैशन की बात बन गई है। योगाभ्यास के लिए चुस्त कपड़े पहन कर कठिन योगासन से जुड़ी तस्वीरें इंस्टाग्राम पर पोस्ट करना, स्टूडियो में श्रमसाध्य व्यायाम के बाद स्वास्थ्यवर्धक स्नैक्स के साथ ग्रीन टी की चुस्कियों लुत्फ उठाना और योग आश्रम के बजाय योग स्टूडियो का सबस्क्रिप्शन लेना आम बात हो गई है। ऐसा भी नहीं है कि योग जैसे व्यायाम के माध्यम से हम अपनी उन जड़ों की ओर वापस लौट रहे हैं। बल्कि सच तो यह है कि पश्चिमी जगत जिस तरह से इस संस्कृति का इस्तेमाल कर रहा है हम उसे ही अपना रहे हैं और उसे ही अंगीकार कर रहे हैं।

यह एक ऐसा योजनाबद्ध रास्ता है जो कारोबार को प्रतिफल देने के साथ ही किसी युवा के लिए खुशगवार साबित हो रहा है हालांकि दोनों ही इसको लेकर आशंकित भी हैं और 'मेक इन इंडिया' के इस विचार की तरफ आकर्षित भी हो रहे हैं। योग उद्योग में अचानक हलचल लाने के लिए 2015 का वह दिन बेहद खास साबित हुआ जब इस साल 21 जून को पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन किया गया। नई दिल्ली में मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (एमडीएनआईवाई) के सहायक शोध अधिकारी (योग) क्षेत्रीमायूम दोरेन सिंह कहते हैं, 'पहला योग दिवस एक उत्सव की तरह मनाया गया। लेकिन प्रधानमंत्री को सफेद रंग के ट्रैक सूट और गले में तिरंगे स्कार्फ को देखकर ही अंदाजा लग गया था कि योग के विचार को अब काफी बढ़ावा मिलेगा।'

इस साल ट्विटर पर शुरू हुए 'फिटनेस चैलेंज' और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वायरल हुआ योग वीडियो योगाभ्यास के प्रति बढ़ते आकर्षण में मददगार ही साबित हुआ है। सिंह कहते हैं कि उस वक्त के बाद से ही संस्थान में नामांकन कराने वालों की तादाद काफी बढ़ी है क्योंकि अब योग में करियर बनाने की राह काफी उज्ज्वल दिख रही है। वह कहते हैं, 'योग से जुड़े हमारे डिप्लोमा पाठ्यक्रम के प्रत्येक बैच में अधिकतम 50 छात्र होते हैं लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 150 हो गई है।' योग दिवस के बाद संस्थान ने एक महीने की अवधि वाले फाउंडेशन कोर्स की पेशकश की।

इस कोर्स के तहत दिल्ली में पांच केंद्रों पर छात्रों को हर रोज शाम को दो घंटे की कक्षाओं में शामिल होना पड़ता है। वह कहते हैं, 'नामांकन शुरू होने से एक दिन पहले से ही लोग कतार में लगना शुरू हो जाते हैं। हरेक महीने इस कोर्स से करीब 250 छात्र जुड़ते हैं।' वह कहते हैं कि यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि देश में योग के कितने प्रमाणित प्रशिक्षक हैं क्योंकि यह पूरी व्यवस्था अनौपचारिक तरीके से काम करती है लेकिन देश भर में योग संस्थान फल-फूल रहे हैं। वह कहते हैं, 'दुर्भाग्य से गुणवत्ता पर कोई जोर नहीं है। यह लोगों की संख्या बढ़ाने के खेल में तब्दील हो चुका है।'

एक योग पोर्टल बुकमाईयोगा के निदेशक नवीन कुमार भी सिंह की बात से पूरी तरह इत्तफाक रखते हैं। उनका मानना है कि बाजार योग शिक्षकों से पूरी कवायद करा रहा है लेकिन केवल 20 फीसदी योग शिक्षकों के पास ही योग की पूर्ण डिग्री है। इसकी वजह यह है कि मांग में तेजी आने की वजह से योग की शिक्षकों की जरूरत भी बढ़ रही है। वह कहते हैं, 'चार साल पहले तक रोजाना योग कक्षाओं के लिए 10-15 लोग पूछताछ किया करते थे लेकिन अब यह तादाद 100 से ज्यादा हो गई है।' कुमार ने योग के प्रति उत्साह रखने वाले 13 लोगों की टीम के साथ 2009 में इस पहल की शुरुआत की।

तीन साल पहले उन्होंने यह देखा कि निजी योगाभ्यास के लिए लोग ज्यादा आग्रह करने लगे हैं। ऐसे में उन्होंने योग प्रशिक्षकों की एक पंजी तैयार की। बुकमाईयोग में अब 130 से अधिक योग प्रशिक्षकों की सूची है। घरेलू सेवाएं मुहैया कराने वाले ऑनलाइन मंच अर्बन क्लैप पर भी घर आने वाले योग प्रशिक्षकों के निवेदन में तीन गुना बढ़ोतरी देखी गई है। 2016 में  ऐसे निजी योग सत्र के लिए 3,000 रुपये प्रतिमाह की फीस थी लेकिन अब यह बढ़कर तकरीबन 9,000 रुपये प्रतिमाह हो गई है। अर्बन क्लैप के मंच पर 7,000 से ज्यादा योग प्रशिक्षक पंजीकृत है जो किसी के घर में 12 योग सत्र मुहैया कराने के लिए 5,000 रुपये से अधिक शुल्क वसूलते हैं।

सामुहिक योग कक्षाओं की मांग में बढ़ोतरी भी इसी रुझान का नतीजा है। फिटनेस फस्र्ट, कल्ट डॉट फिट और एनीटाइम फिटनेस जैसे लोकप्रिय जिम भी निरोग बने रहने के ख्वाहिशमंद लोगों के लिए योग कक्षाओं की पेशकश कर रहे हैं। अब विशेष योग स्टूडियो भी तैयार किए जा रहे हैं। वर्ष 2013 में सर्वेश शशि ने जोरबा की शुरुआत की जो स्टूडियो की एक शृंखला है। इसके तहत बेहद आनंददायक माहौल में 25 विभिन्न प्रकार के योग की कक्षाओं की पेशकश की जाती है। इन स्टूडियो में धीमी रोशनी होती है और यह अति सूक्ष्म कलात्मकता से परिपूर्ण सा दिखता है।

शशि कहते हैं, 'योग का विचार अब गुरु से हटकर पूरी तरह योगाभ्यास पर ही केंद्रित हो गया है। भारतीय लोग कितने खुले और उदार बन रहे हैं यह उसका ही एक विस्तार है  हालांकि उनकी जड़ें और संस्कृति अक्षुण्ण है।' वह एक अहम बदलाव की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि योग 30 साल से कम उम्र वर्ग के लोगों की जीवनशैली की पसंद बन गई है। जोरबा के 35 शहरों में 65 से ज्यादा स्टूडियो हैं जहां 'एरियल योगा', 'चेयर योगा', 'डांस योगा', 'ब्रिक योगा' और 'पैडलबोर्ड योगा' जैसे प्रारूपों में योगाभ्यास होता है। योग के रुझान में तेजी आने के साथ ही इसके लिए उपयुक्त परिधान और उपकरणों में भी तेजी देखी जा रही है।

कसरत से जुड़े मैट को अब 'योगा मैट' का नाम दे दिया गया है। कसरत के बाद लिए जाने वाले प्रोटीन खाद्य उत्पादों को अब 'योगा बार्स' के नाम से जाना जाता है। बदन के अनुरूप लचीले जिम टाइट्स अब 'योगा पैंट्स' बन चुके हैं। ई-कॉमर्स कंपनियों मसलन एमेजॉन की एक पूरी स्टोर श्रेणी ही योग से जुड़े सामानों पर केंद्रित है जहां मैट्स, ब्रिक्स, परिधान, तांबे की बोतल, आयुर्वेदिक पूरक (सप्लीमेंट्स) और चाय मिलती है। इस रुझान से अलग प्रयोग करने वाले एक योग केंद्रित परिधान ब्रांड, प्रोयोग ऑर्गेनिक कॉटन के कपड़ों की पेशकश करता है।

कंपनी के मुताबिक इस परिधान से योग का अनुभव और गहरा होगा। इसे तीन साल पहले इत्तफाक से पहले योग दिवस 21 जून को लॉन्च किया गया था। प्रोयोग के सह संस्थापक प्रियांकथा आयंगर का कहना है, 'योग के लिए तैयार किए जाने वाले करीब 95 फीसदी परिधान सिंथेटिक हैं। इससे योगाभ्यास में दिक्कत होती है।' इस ब्रांड के 'चंद्र' और 'विरा' धोती को पैंट की तरह पहना जा सकता है जो विभिन्न आसान करते वक्त बेहद आरामदायक होता है। प्रोयोग ऑर्गेनिक योग मैट भी डिजाइन करने की प्रक्रिया में है। आयंगर कहती हैं, 'लोग योग को महज एक कसरत या अभ्यास मानने के अलावा अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना रहे हैं। मेरा मानना है कि उद्योग और बड़ा बनने की राह पर है।'

अब कुछ योग स्टूडियो में फीचर कैफे भी हैं। परंपरागत भारतीय आहार के बजाय यहां खानों की दोबारा पैकेजिंग की जाती है  मुंबई में योग हाउस 'योगीज ब्रेकफास्ट' की पेशकश करता है जिसमें ओट्स का हलवा, मल्टीविटामिन जूस, चाय और कॉफी शामिल होता है। वहीं 'योगीज मील' में किनोआ, अंजीर, दही और ग्रेनोला शामिल किया जाता है। अब बदलती महत्त्वाकांक्षा और जनसांख्यिकीय में दिख रहे बदलाव की वजह से देश में योग का नवजागरण वास्तव में भारतीयकरण वाली ठोस कोशिशों का एक नतीजा है। सरकार का पूरा तंत्र इस नीति को आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है।

2014 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सत्ता में आने वाली सरकार ने देश को अग्रणी सोच वाले, आधुनिक लेकिन राष्ट्रवादी बनाने की एक संकल्पना का ताना-बाना बुना। निश्चित तौर पर इसमें योग एक प्रतीकात्मक चयन था और इसकी उन्नति बेहद स्वभाविक थी। इसी सोच के साथ नवंबर 2014 को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत एक आयुष विभाग बनाया गया और बाद में इसे एक मंत्रालय का रूप दे दिया गया। इस साल इस मंत्रालय के केंद्रीय बजट आवंटन में 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई जो 14.29 अरब रुपये से बढ़कर 16.26 अरब रुपये हो गया।

वर्ष 2018 की सालाना रिपोर्ट में मंत्रालय ने पूर्वोत्तर राज्यों में योग को लोकप्रिय बनाने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान को अपनी उपलब्धि बताने की कोशिश की है। इससे ही जुड़े सेंटर काउंसिल फॉर रिसर्च इन योग ऐंड नैचुरोपैथी को ज्यादा स्वायत्तता दी गई है। एमडीएनआईवाई के सिंह कहते हैं, 'यह प्रधानमंत्री की प्रमुख योजना है। आमतौर पर ये योजनाएं जमीनी स्तर पर शुरू होती हैं और फिर शीर्ष स्तर पर पहुंचती हैं लेकिन यहां इससे बिल्कुल उलट ही हुआ। योग की पहल शीर्ष स्तर पर की गई।'

वह कहते हैं कि योग के लिए पर्याप्त पूंजी मुहैया कराई गई है। निजी प्रायोजक और कॉरपोरेट साझेदार बड़ी आसानी से इससे जुड़ जाते हैं क्योंकि योग से जुड़ी किसी भी कोशिश में गारंटी निश्चित तौर पर दी जा सकती है। सिंह कहते हैं, 'लेकिन जैसे ही इसकी लोकप्रियता बढ़ती है, धर्म के सवालों पर विवाद भी बढ़ता है।' वह मध्य प्रदेश कि मिसाल देते हैं जहां योग से सूर्यनमस्कार को हटा दिया गया क्योंकि मुसलमान छात्रों को यह अपने धर्म के खिलाफ लगा। सिंह कहते हैं कि योग का धर्म से लेना देना नहीं है लेकिन इसे ऐसा रूप दे दिया गया है।

वह कहते हैं कि मुसलमान भी योग का अनुसरण अपने तरीके से करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि उनके धर्म में योग की कुछ मुद्राएं शामिल हैं। एकजुट, स्वस्थ और जंग के तैयार राष्ट्र के विचार के प्रचार के लिए भी यह अहम साबित हुआ है। इसे सबसे पहले रामदेव के योग के स्वदेशी रंगों और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के वैश्विक स्वरूप में दिखा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गोरक्षा और योग प्रचार विभाग के प्रमुख अजित महापात्र कहते हैं, 'योग का धर्म से कोई लेना देना नहीं। योग का संबंध अच्छे और स्वस्थ व्यक्ति से है और अपने साथ देश को आगे बढ़ाने से है। अगर कोई योग का विरोधी है तो यह उनका निजी विचार है और इसका सरकार के अच्छे कार्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।'

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