बिजनेस स्टैंडर्ड - फंड की बदल रही सूरत तो निवेश पर पैनी नजर रखने की जरूरत
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फंड की बदल रही सूरत तो निवेश पर पैनी नजर रखने की जरूरत

संजय कुमार सिंह /  06 24, 2018

फंड कंपनियां पिछले काफी समय से अपने निवेशकों को चि_ïी और संदेश भेजकर बता रही हैं कि उनकी फंड योजनाओं में किस तरह की तब्दीलियां की गई हैं। ये तब्दीली इसीलिए की जा रही हैं ताकि फंड योजनाएं वर्गीकरण के मामले में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अक्टूबर, 2014 के निर्देश का पालन कर सकें। कुछ फंडों (10 फीसदी से भी कम) का विलय किया जा रहा है और कुछ फंडों को एक श्रेणी से दूसरी श्रेणी में डाला जा रहा है। कहीं-कहीं तो उनकी बुनियादी विशेषताएं ही बदल गई हैं। ऐसे में निवेशकों को किसी वित्तीय सलाहकार की मदद से यह समझना पड़ेगा कि उनके फंड में कितने अधिक बदलाव हुए हैं। समझने के बाद ही वे तय कर पाएंगे कि उन्हें भी कोई कदम उठाना है अथवा नहीं। बदलाव बहुत अधिक और कठोर दिख सकते हैं, लेकिन हो सकता है कि वास्तव में ऐसा नहीं हो। कुछ फंडों के नाम में जो बदलाव आया है, उसके उनकी विशेषताओं में आमूल-चूल परिवर्तन होता लग सकता है। लेकिन हो सकता है कि वास्तव में ऐसा नहीं हो। एचडीएफसी टॉप 200 (143.49 अरब रुपये की प्रबंधनाधीन संपत्ति) अब एचडीएफसी टॉप 100 में तब्दील हो जाएगा। 

 
मॉर्निगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक-प्रबंधक (शोध) कौस्तुभ बेलापुरकर कहते हैं, 'हो सकता है कि नाम में बदलाव से ऐसा लगे कि फंड में कंपनियां कम हो गई हैं। लेकिन पिछले कुछ समय के पोर्टफोलियो पर नजर डालेंगे तो पता चल जाएगा कि फंड प्रबंधक पहले ही 80 से 85 फीसदी रकम शीर्ष 100 शेयरों में लगा रहे हैं। इसएि फंड के प्रदर्शन पर इस बदलाव का बहुत अधिक असर नहीं पड़ेगा।'  कभीकभार फंड की श्रेणी बदलने पर भी उसका प्रदर्शन पहले जैसा बना रहता है। एचडीएफसी के बैलेंस्ड फंड का उदाहरण ही लीजिए। फंड कंपनी के उस श्रेणी में दो फंड थे: एचडीएफसी बैलेंस्ड और एचडीएफसी प्रूडेंस। पहली फंड योजना आक्रामक हाइब्रिड श्रेण्ी में चली जाएगी और 65 से 80 फीसदी निवेश इक्विटी में ही करेगी। लेकिन इस योजना में इतना इक्विटी निवेश पहले ही हो रहा है। एचडीएफसी प्रूडेंस को एचडीएफसी ग्रोथ में मिलाया जा रहा है और उसे डायनेमिक एसेट अलोकेशन या बैलेंस्ड एडवांटेज श्रेणी में रखा जाएगा। इस श्रेणी में फंड कंपनियों को इक्विटी:डेट आवंटन चुनने की पूरी आजादी होती है। वे इक्विटी या डेट में से किसी भी एक में पूरा निवेश भी कर सकती हैं। फंड कंपनियों के साथ बातचीत कर चुके बाजार सूत्रों के मुताबिक विलय के बाद बनने वाले एचडीएफसी बैलेंस्ड एडवांटेज फंड को बदलावों के बाद भी अभी जितने इक्विटी डेट आवंटन अनुपात के साथ चलाया जा सकता है।
 
हो सकता है कि लार्ज कैप फंड को लार्ज एवं मिड कैप श्रेणी में भेज दिया जाए। तब निवेशकों को यह पूछना होगा कि बदलाव लागू होने से पहले और उसके बाद लार्ज कैप शेयरों में कितना-कितना आवंटन है। हो सकता है कि आवंटन केवल 10-15 फीसदी बदले या इससे भी कम बदलाव हो। ऐसा होता है तो किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में विभिन्न श्रेणियों में किए गए कुल आवंटन में मामूली फर्क पड़ेगा।
 
अगर बदलाव बड़ा हो
 
मान लीजिए कि स्मॉल और मिड-कैप श्रेणी के किसी फंड में पहले 60 फीसदी निवेश मिड कैप शेयरों में और 40 फीसदी स्मॉल कैप शेयरों में किया जाता था। पुनर्वर्गीकरण में उसे स्मॉल कैप फंड बना दिया जाता है, जिसमें फंड प्रबंधक को कम से कम 65 फीसदी निवेश स्मॉल कैप शेयरों में करना पड़ेगा। स्मॉल कैप शेयरों में आवंटन में 25 फीसदी बढ़ोतरी अच्छा खासा बदलाव है।  कुछ मामलों में फंड में निवेश का तरीका भी बदल सकता है। मिसाल के तौर पर एसबीआई  मैग्नम इक्विटी अब थीम आधारित फंड बनने जा रहा है। आईडीएफसी स्टर्लिंग इक्विटी फिलहाल मिड-कैप ग्रोथ फंड है, लेकिन पुनर्वर्गीकरण में उसे वैल्यू फंड मान लिया जाएगा। फंड्सइंडिया डॉट कॉम में शोध प्रमुख विद्या बाला कहती हैं, 'अगर आपको वैल्यू वाली रणनीति पसंद है तो इसमें निवेश बनाए रखें। लेकिन अगर आपने यह फंड योजना मिड-कैप, वृद्घि केंद्रित निवेश के लिए खरीदी थी तो इसमें से निकल जाइए और किसी दूसरे फंड को चुन लीजिए।'
 
क्या करें निवेशक
 
फंड कंपनियों को इसी महीने के अंत तक निवेशकों के फंड पोर्टफोलियो में निर्धारित बदलाव कर लेने चाहिए। विशेषज्ञों की राय है कि पोर्टफोलियो में ये बदलाव होने के बाद कम से कम एक तिमाही तक इंतजार करना चािहए। उसके बाद किसी सलाहकार की मदद से उन्हें यह समझना चाहिए कि बदलावों से उनके संपत्ति आवंटन (इक्विटी और डेट के अनुपात) और श्रेणी आवंटन में किस तरह का फर्क आया है। यह समझने के बाद ही तब्दीली करें ताकि आपका पोर्टफोलियो एक बार फिर आपकी जोखिम लेने की इच्छा और वित्तीय लक्ष्यों के अनुरूप हो सके। अगर फंड में बहुत अधिक बदलाव हुआ है और बदलाव के साथ आने वाले जोखिम को झेलने की क्षमता और मंशा आपमें नहीं है तो आपको अपनी फंड योजना से फौरन किनारा कर लेना चाहिए। मान लीजिए कि कोई लार्ज-कैप फंड बदलाव के बाद स्मॉल-कैप फंड की श्रेणी में आ गया है या मल्टी-कैप फंड में तब्दील हो गया है तो उसे तुरंत छोड़ दीजिए।
 
अपने पोर्टफोलियो में शामिल प्रत्येक फंड का जायजा भी लीजिए। मान लीजिए कि कोई लार्ज-कैप फंड बदलाव के बाद मल्टी-कैप फंड बन गया है। उस सूरत में बेलापुरकर की सलाह है, 'मल्टी-कैप फंड की रणनीति में लार्ज-कैप शेयर भी लिए जाते हैं और मिड एवं स्मॉल-कैप शेयर भी आते हैं। लेकिन यदि कोई फंड प्रबंधक अभी तक केवल लार्ज-कैप शेयरों वाली रणनीति पर ही काम करता आ रहा है तो उसके लिए श्रेणी में परिवर्तन के बाद बदली रणनीति पर अमल करना आसान नहीं होगा।' ऐसे में दो विकल्प हैं। या तो ठहरकर देखिए कि फंड प्रबंधक बदलावों के मुताबिक खुद को ढाल पाता है अथवा नहीं। या मल्टी-कैप के माहिर फंड प्रबंधक का पल्लू थाम लीजिए।
 
नई व्यवस्था में लार्ज-कैप को शीर्ष 100 शेयरों और मिड-कैप को शीर्ष 101 से 250 तक के शेयरों के रूप में परिभाषित किया गया है। अगर निवेशक जानना चाहते हैं कि उनके फंड प्रबंधक नई व्यवस्था में भी बेहतरीन प्रतिफल हासिल कर रहे हैं या नहीं तो उन्हें फंड के प्रदर्शन पर बारीक नजर रखनी होगी। मिंटवॉक के सह-संस्थापक निखिल बनर्जी कहते हैं, 'पहले तय दायरे से बाहर जाने पर शानदार प्रतिफल मिलता था। लेकिन अब ऐसा नहीं किया जा सकेगा।' विद्या कहती हैं, 'फंड प्रबंधकों को शेयरों और क्षेत्रों में सामान्य से अधिक या कम निवेश कर बढिय़ा प्रतिफल हासिल करने का तरीका सीखना पड़ेगा। देखना चाहिए कि वे ऐसा कर पाते हैं या नहीं।'
 
जो निवेशक नए फंड शामिल करना चाहते हैं, उन्हें उन योजनाओं से दूर रहना चाहिए, जिनमें बुनियादी तब्दीली आ गई है। बनर्जी का कहना है, 'रणनीति बदलने के कारण आगे का प्रदर्शन पिछले प्रदर्शन से काफी अलग रह सकता है।' लेकिन जिन फंडों में बुनियादी बदलाव नहीं आए हैं, उनमें बने रहें। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल ऐसेट मैनेजमेंट में रिटेल ऐंड इंस्टीट्यूशनल बिजनेस के ईवीपी एवं प्रमुख राघव अय्यंगर कहते हैं, 'निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकारों से पूछना चाहिए कि फंड के जोखिम-प्रतिफल प्रोफाइल में बड़ा बदलाव तो नहीं आया है। थोड़ा सब्र रखना, उद्योगों को बदलाव लागू करने देना और उसके बाद सही रणनीति चुनना ठीक रहेगा।'
 
बदलावों के बाद अगर आपको फंड से बाहर होना है तो कर देनदारी के बारे में भी सोच लें। अगर आप बदलावों को पचा ही नहीं पा रहे हैं तो फौरन निकल जाएं अन्यथा साल भर इंतजार करें ताकि 15 फीसदी अल्पावधि पूंजीगत लाभ कर के बजाय आपको 10 फीसदी दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर ही देना पड़े।
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