बिजनेस स्टैंडर्ड - उदार पीठ के शंकराचार्य
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उदार पीठ के शंकराचार्य

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  06 24, 2018

अगर मैंने अपने आलेख के शीर्षक में उदारवादी धर्मोपदेशकों में आयतुल्लाह या ईसाई धर्मगुरुओं का नाम लिया होता तो शायद अधिक उपयुक्त होता। क्योंकि शंकराचार्य चाहे जो भी प्रवचन देते हों लेकिन वे फतवा जारी नहीं करते, न ही वह चर्च की तरह कोई ऐसा प्रपत्र जारी करते हैं जो आलोचना से परे हो। परंतु इन दिनों सावधान रहना पड़ता है। अगर मैंने उनका उल्लेख किया होता तो मुझ पर रूढि़वादी और उदारवादी दोनों हमलावर हो जाते। रूढि़वादी कहते कि मैंने उनकी आस्था को निशाना बनाया जबकि उदारवादी कहते कि मैंने अल्पसंख्यकों को रेखांकित किया।

 
यहां मेरी दलील इनमें से किसी महान धर्म के बारे में नहीं है। मैं मानवजाति के इतिहास में उभरे नवीनतम धर्म की बात कर रहा हूं। वह है उदारवाद। यह नया है इसलिए इसमें विविधता आना भी शेष है। उसकी अपनी पवित्र पुस्तक है जिससे किसी तरह का विचलन वह बरदाश्त नहीं करेगा। कोई शिया-सुन्नी नहीं, कोई कैथलिक या प्रोटेस्टेंट नहीं, न ही कोई वैष्णव या शैव। अगर आप मेरी पीठ के हैं तो आपको पूरी तरह पालन करना होगा। यहां भी कोई अपवाद नहीं है। आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ। याद रहे यह जॉर्ज बुश जूनियर का कथन है और वह भी कोई उदारवादी व्यक्ति नहीं थे।
 
मैं पूछ सकता हूं: आप एक साथ उदारवादी भी हैं और आपके पास नियमों, व्यवहार और भाषण को लेकर एक किताब भी है? यह कैसे संभव है? चाहे जो भी हो, सबसे पहले मैं कोशिश करूंगा दूसरों के लिए तय न्यूनतम आचार संहिता की। पहली शर्त, आपको मेरी शर्तों पर धर्मनिरपेक्ष होना होगा। आप अपनी धार्मिकता और अपने ईश्वर को त्यागिए। दूसरा, मुक्त बाजार, वैश्वीकरण और विनियमन आदि गलत नवउदारवादी धारणाएं हैं। राज्य सबसे पवित्र है और उसे और अधिक बेहतर बनाने में हमारी मदद करें। यह मान लें कि सभी कॉर्पोरेट चोर हैं। कृपया मुझसे यह मत पूछिए कि अगर कॉर्पोरेट और बेईमानी से धनी बने लोग नहीं तो भला फोर्ड, रॉकफेलर, बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स, मैक आर्थर, इनलॉक्स, टाटा आदि जैसे पवित्र फाउंडेशनों को कौन धन देता है। आपको तमाम बांधों, बिजली उत्पादन संयंत्रों, खनन और कीटनाशक संयंत्रों का भी विरोध करना चाहिए। यह मान लीजिए कि डॉनल्ड ट्रंप अमेरिकी मूर्खों द्वारा चुने गए शैतान हैं लेकिन शायद पुतिन और शी चिनफिंग ऐसे न हों। कम से कम आप वहां की जनता पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि उसने उन्हें पद पर बिठाया है। सरकार अच्छी हैं लेकिन स्वयंसेवी संगठन ज्यादा अच्छे हैं। विज्ञान खतरनाक है, खासतौर पर जब उस पर निजी क्षेत्र का कब्जा हो। जीन संवद्र्धित खाद्य पदार्थ मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा। इस शरीयत का उल्लंघन, इससे विचलन आपको अनुदार घोषित करा देगा। संक्षेप में कहें तो उदार रहिए, मेरा कहना मानिए, वही कीजिए जो मैं कहूं। 
 
अगर न्यायमूर्ति लोया से जुड़ी खबर को आप 'न्यायमूर्ति लोया की विवादित मृत्यु' कहते हैं और इसकी 'नए सिरे से निष्पक्ष जांच' की मांग करते हैं तो आप मुझसे अलग हो जाइए। एक 'सच्चा' उदारवादी सही भाषा का इस्तेमाल करेगा और इसे 'न्यायमूर्ति लोया की हत्या' कहेगा। यह जांच करने में समय क्यों गंवाना कि उनकी मौत कैसे हुई? आपको तो पता ही है कि उनकी हत्या हुई है और यह भी कि उन्हें किसने मारा है? बस कुछ बातों के सिरे जोडऩा है और अमित शाह को फांसी पर लटकाना है। 
 
इसके बाद सबकुछ स्वाभाविक ढंग से होता है। अगर आप एक सार्वजनिक बौद्धिक हैं तो आपकी जुबान से निकला हर शब्द आपके खिलाफ सबूत बन जाएगा। आखिरकार अगर आप संपादक हैं तो आपको हर समाचार कक्ष में घेरा जाएगा। पवित्रों में पवित्र उदार शंकराचार्य की नजर आप पर है। हमले बीते बुधवार को दपिं्रटडॉटइन में मुंबई की रूपा सुब्रमण्या का एक आलेख प्रकाशित हुआ। वह एक अर्थशास्त्री हैं और ट्विटर पर सक्रिय हैं। पांच सालों के दौरान वह मोदी की अत्यंत प्रतिबद्ध समर्थक रही हैं और मुझ समेत उनकी आलोचना करने वालों को कतई माफ नहीं करतीं। उन्होंने हमें एक लेख लिखकर बताया कि मोदी से उनका मोहभंग क्यों हो रहा है? यह भी कि वह आर्थिक सुधारों के लिए उनका समर्थन कर रही थीं लेकिन वह नजर नहीं आया। उनका आलेख तर्कों से भरा हुआ था।
 
उन्हें भाजपा समर्थकों की ओर से ढेरों अपमानजनक बातें सुनने को मिलीं। उन्हें विश्वासघाती करार दिया गया और हमारे बारे में कहा गया कि हमने अपना एजेंडा पूरा करने के लिए उनके विश्वासघात का इस्तेमाल किया। अप्रत्याशित रूप से इस बात ने उदारवादियों को भी नाराज कर दिया। उनका कहना था कि हम दक्षिणपंथी 'ट्रोल' का लेख कैसे छाप सकते हैं? हम उनका महिमामंडन करके अपने आप को नीचे क्यों गिरा रहे हैं? यह दलील भी नहीं चली कि समाचार कक्ष कोई अदालत या पुलिस स्टेशन नहीं है क्योंकि उन्होंने अब तक अपने अतीत के कामों की माफी नहीं मांगी न ही हमारी ओर से उन्हें माफी दी गई।
 
यहां थोड़ा भ्रम की स्थिति बनती है। आप मानेंगे कि उदारवाद की परिभाषा में दूसरों के लिए नियम तय करना या उनके अनुसरण का आग्रह करना नहीं आता। अगर आप मेरे लिए नियम बनाएं, आचार संहिता तय करें और स्वीकार्य व्यवहार की सीमा तय करें तो आप उदारवादी नहीं हैं। हो सकता है आप मुझसे अधिक सही हों, ज्यादा पवित्र हों लेकिन आप उदार नहीं  हो सकते। आप आयतुल्ला, बिशप या शंकराचार्य कुछ भी हो सकते हैं। यह हम पत्रकारों के लिए एक चुनौती की तरह था जो हर चीज को शंका की नजर से देखते हैं और सर्वज्ञानी होने की धारणा में यकीन नहीं करते।
 
तकरीबन तीन साल पहले एक अमेरिकी स्नातक विद्यार्थी ने अपनी तरह के उदारवाद को लेकर एक छोटी सी लड़ाई जीती थी लेकिन उसे अपनी आस्था गंवानी पड़ी थी। आप येल विश्वविद्यालय के सिलिमन कॉलेज और हैलोवीन के नाम से गूगल करके देखें। इस आवासीय कॉलेज के कुछ छात्रों ने अपने शिक्षकों, साथियों और पत्नी आदि को बताया कि उन्हें इस बारे में बहुत अधिक दिशानिर्देश दिए जा रहे हैं कि हैलोवीन में क्या करें और क्या न करें? मसलन ऐसा पहनावा न पहनें जो किसी समुदाय को ठेस पहुंचाए। प्रोफेसर एरिका क्राइस्टाकिस ने सबको प्रसन्न करने वाला ईमेल लिखा और कहा कि वे खुश रहें और सबको खुश करने की कोशिश न करें। इसके बाद छात्रों के उदारवादी समूहों ने तगड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। एक छात्र ने तो कैमरे के सामने ही बदतमीजी से बात की।
 
इस बीच फॉक्स न्यूज पर 1.20 मिनट का एक वीडियो चला जिसने पहले से भड़के अमेरिकी श्वेतों को और अधिक भड़का दिया। इस वीडियो में उदारवादी व्यवहार्यता एकदम चरम पर नजर आ रही थी। इससे भी कोई मदद नहीं मिली कि यह अत्यधिक उदारवादी पूर्वी तट वाले कैंपस का वीडियो था और उसमें दिख रही विद्यार्थी एक अत्यंत नाराज छात्रा थी। यह कहना ज्यादती होगा कि इससे डॉनल्ड ट्रंप के पक्ष में चुनावी माहौल बना लेकिन इससे उनको नुकसान तो नहीं ही हुआ। एरिका क्राइस्टाकिस ने द वॉशिंगटन पोस्ट में एक आलेख लिखा, 'मेरे हैलोवीन संबंधी ईमेल की वजह से कैंपस में तूफान आ गया। यह आत्मनियंत्रण को लेकर भी एक परेशान करने वाला सबक साबित हुआ। हमारे देश के कुछ महान विश्वविद्यालयों में बोलने की स्वतंत्रता निहित होगी लेकिन सुनने की संस्कृति को विकसित करना भी जरूरी है।'
 
अब आप संगोष्ठïी, पब, कॉफी शॉप, ओपएड के पन्नों, ट्विटर, फेसबुक या अपनी टीशर्ट पर ट्रंप का मजाक उड़ाते रहिए। रॉबर्ट डी नीरो की तरह सार्वजनिक रूप से उनका अपमान कर तालियां बटोरते रहिए। आप अपने देश में मोदी के साथ भी ऐसा कर सकते हैं। नतीजा वही रहेगा। उनका आधार और मजबूत होगा क्योंकि आपके काम उनको पीडि़त दिखाएगा। ध्रुवीकृत लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता किसके हाथ में होगी इसका निर्धारण प्रतिबद्ध समर्थक नहीं बल्कि वे लोग करते हैं जिनका रुझान किसी भी ओर हो सकता है। अगर आप उनको दिमाग से पैदल, असांस्कृतिक, अशिक्षित, अनुदार करार देंगे तो वे भी आपमें और दूसरों में भेद क्यों करेंगे? आप उनका साथ गंवा बैठेंगे। वहीं दूसरा पक्ष भी राष्ट्रवाद और व्यापक उत्पीडऩ की भरोसेमंद बहस के साथ सामने आएगा। ऐसे में अपने आपको उदार कहने वालों को अपना दायरा बढ़ाना होगा। जैसा कि एरिका क्राइस्टाकिस ने कहा हमें सुनने की संस्कृति विकसित करने की जरूरत है।
Keyword: उदारवाद, धर्मगुरु,
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