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रेलवे के अपने अस्पताल कितने सेहतमंद?

विवेक देवरॉय /  June 22, 2018

भारतीय रेलवे ट्रेनों का संचालन करने के साथ अस्पताल भी चलाता है। बदले हुए समय में इन अस्पतालों के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं विवेक देवरॉय

 
डॉ रॉबर्ट गिलेस्पी ने वर्ष 2006 में 'द ट्रेन डॉक्टर्स: ए डिटेल्ड हिस्ट्री ऑफ रेलवे सर्जंस' नाम से एक किताब लिखी थी। हालांकि वह किताब अमेरिकी रेल के बारे में लिखी गई थी लेकिन रेलवे के विकास से संबंधित सिद्धांत तो पूरी दुनिया में हरेक जगह समान ही हैं। डॉ गिलेस्पी की किताब में कहा गया है, '19वीं सदी में केवल कुछ नियोक्ता ही अपने कर्मचारियों को कोई लाभ देते थे। कर्मचारियों को स्वास्थ्य देखभाल का खर्च खुद ही उठाना पड़ता था। कंपनियां केवल नौकरी पर रखने के पहले संभावित कर्मचारियों का स्वास्थ्य परीक्षण कराने या कार्यस्थल पर साफ-सफाई से जुड़े मामलों में ही चिकित्सा विशेषज्ञों पर खर्च करती थीं।
 
हालांकि अमेरिकी रेल कंपनी रेलरोड्स इस नियम के अपवाद के तौर पर उभरी। इसकी वजह यह थी कि रेल प्रणाली के परिचालन के दौरान कर्मचारियों, यात्रियों और दूसरे लोगों के चोटिल होने की घटनाएं काफी अधिक होती थीं। रेलरोड्स ने शुरुआती दौर में अपने रेलमार्गों के आसपास के निजी डॉक्टरों के साथ करार किए लेकिन मरीजों की बढ़ती संख्या को देख कंपनी को यह महसूस हुआ कि डॉक्टरों को नौकरी पर रखना अधिक व्यावहारिक विकल्प है। इसके अलावा अमेरिका में अंतर-महाद्वीपीय रेलमार्ग की शुरुआत होने और उसके बाद पश्चिमी हिस्से की ओर लोगों का प्रवास बढऩे से अविकसित इलाकों में लोगों की आमद बढऩे लगी। दूरदराज के इन इलाकों में डॉक्टरों और अस्पतालों की भारी कमी थी। ऐसे में वेस्टर्न रेलरोड के पास डॉक्टरों को नौकरी पर रखने और स्वास्थ्य देखभाल केंद्र खोलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। बीसवीं सदी की शुरुआत होने तक हरेक रेलवे कंपनी ने पूर्णकालिक डॉक्टरों को अपने यहां नौकरी पर रखना शुरू कर दिया था।'
 
भारत में भी रेलवे का विकास कमोबेश इसी तरह हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारतीय रेलवे का एक विशाल स्वास्थ्य निदेशालय है जिसकी कमान रेलवे स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक के पास होती है। रेलवे के हरेक जोन में मुख्य चिकित्सा निदेशक और मंडलों में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक इसके प्रभारी होते हैं।  केवल भारतीय रेलवे ही नहीं बल्कि तमाम रेलवे में स्वास्थ्य सेवा का दायरा महज अस्पताल ही नहीं होता है। हालांकि मेरा ध्यान मुख्यत: अस्पतालों पर ही केंद्रित है। गिलेस्पी मौजूदा दौर के बारे में कुछ यूं लिखते हैं, 'रेलवे अस्पतालों में सर्जरी होना बीसवीं सदी की शुरुआत में ही कम होने लगा। इस व्यवस्था के पतन के लिए कई चीजें जिम्मेदार रहीं। कई मरीज रेलवे के निर्धारित डॉक्टरों के पास जाना पसंद नहीं करते थे। खासकर रेलवे अस्पतालों से दूर रहने वाले कर्मचारी अपने आसपास के ही पसंदीदा डॉक्टर को दिखाना चाहते थे। 1980 के पहले निजी बीमा पॉलिसी भी पसंदीदा डॉक्टर की सेवाएं लेने के व्यापक विकल्प देती थीं। इस वजह से रेलरोड के कर्मचारी संगठनों ने रेलवे के ही निर्धारित अस्पतालों एवं डॉक्टरों के पास जाने के बजाय इन बीमा कंपनियों के साथ अनुबंध का दबाव बनाया। हादसों के शिकार लोग अक्सर रेलरोड से बाहर के डॉक्टरों से ही इलाज कराना चाहते थे। सरकारी नियमों में बदलाव होने, मेडिकऐड और मेडिकेयर के गठन और 1950 एवं 1960 के दशकों में चिकित्सा क्षेत्र में हुई तीव्र प्रगति ने भी स्वास्थ्य देखभाल सेवा के संचालन को अधिक जटिल और महंगा बना दिया। रेल कंपनियों ने घाटे में चल रही अपनी अनुषंगी इकाइयों को बेचने का भी मन बना लिया। 1970 के शुरुआती वर्षों में रेलरोड का अंतिम अस्पताल भी बिक या बंद हो चुका था। ऐसी स्थिति में रेलवे के डॉक्टरों ने भी दूसरी राह पकड़ी और निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी।'
 
दूसरे शब्दों में, 19वीं सदी में बाजार का अभाव था लेकिन अब ऐसी  स्थिति नहीं है। अगर रेल कर्मचारियों की स्वास्थ्य जरूरतों का ध्यान रखा जा रहा है तो वे भी चाहते हैं कि उन्हें प्रतिस्पद्र्धी माहौल वाले सक्षम डॉक्टरों से इलाज कराने का विकल्प मिले। भारतीय रेलवे एक तरह से प्रतिस्पद्र्धा की इजाजत पहले से ही देती है। रेलवे अपने 125 अस्पतालों के अलावा 133 निजी अस्पतालों में भी इलाज की सुविधा अपने कर्मचारियों को देती है। मुझे लगा था कि भारतीय रेलवे के सबसे पुराने अस्पताल के बारे में पता लगाना बहुत आसान होगा लेकिन ऐसा नहीं था। इसका जवाब संभवत: अजमेर है लेकिन इसे लेकर आश्वस्त नहीं हूं। अजमेर अस्पताल 1890 में बना था और फिर 1900 में कांचरापाड़ा अस्पताल शुरू हुआ था। पिछले दिनों मैंने एक लेख रेलवे की तरफ से संचालित स्कूलों के बारे में भी लिखा था। केवल भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और युगांडा में ही रेलवे स्कूलों का भी संचालन करता है। उसी तरह आज के समय में अस्पताल चलाने वाली रेलवे भी संभवत: भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ही हैं। 
 
गिलेस्पी के ऊपर दिए गए बयान में आपने गौर किया होगा कि मरीज और कर्मचारी इलाज के लिए विकल्प चाहते थे जो बीमा कंपनियों के प्रसार के चलते मुमकिन था। लेकिन रेलवे बोर्ड जब अपने मौजूदा एवं पूर्व कर्मचारियों का इलाज सीजीएचएस एवं ईएसआई योजना के पैनल में शामिल निजी अस्पतालों में कराने की संभावना पर गौर करता है तो चारों तरफ शोर मच जाता है।  मुझे नहीं लगता है कि कोई भी रेलवे अस्पतालों को बंद करने के बारे में सोच रहा है। हमारे पास तो अस्पतालों की पहले से ही कमी है। फिर चल रहे अस्पताल को क्यों बंद किया जाए? लेकिन इसी से जुड़ा सवाल यह भी है कि किसी रेलवे कर्मचारी को रेलवे अस्पताल में ही इलाज कराने के लिए क्यों मजबूर किया जाना चाहिए जबकि उसके विकल्प मौजूद हैं? 
 
वैसे पैनल में शामिल सरकारी एवं रेलवे अस्पतालों में इलाज की सुविधा देने का विचार कोई नया नहीं है। भारत के सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों का इस्तेमाल अनुपात करीब 95 फीसदी है।  लेकिन कुछ पुराने आकंड़ों के मुताबिक रेलवे अस्पतालों में केवह 62 फीसदी बिस्तरों पर ही मरीज होते हैं। देश में अस्पतालों की कमी को देखते हुए कहा जा सकता है कि इन रेलवे अस्पतालों की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। आखिर रेलवे से बाहर के मरीजों को इन अस्पतालों में इलाज का मौका क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? रेलवे एवं गैर-रेलवे मरीजों तथा अस्पतालों में यह धुंधली विभाजक रेखा हमने क्यों बनाई हुई है? अस्पताल तो महज अस्पताल होता है। इसी से हम अगले सवाल की ओर बढ़ते हैं जिसे लेकर इतना हंगामा मचा हुआ है। वह सवाल है कि रेलवे अस्पतालों को रेलवे प्रबंधन के मातहत ही क्यों होना चाहिए? दरअसल नियंत्रण की चाहत ही पूरे प्रतिरोध की असली वजह है। यही वजह है कि भारतीय रेलवे ट्रेनों के संचालन के अपने बुनियादी काम पर ध्यान नहीं केंद्रित कर पाता। 
 
झांसी के एक रेलवे अस्पताल में भ्रष्टाचार की स्थिति के बारे में मैं एक बयान रख रहा हूं। वेबसाइट आईपेडब्राइब डॉट कॉम के मुताबिक, 'अस्पताल में तैनात डॉक्टर और अन्य कर्मचारी बीमार होने का प्रमाणपत्र देने के लिए कर्मचारियों से रिश्वत लेते हैं। स्वस्थ कर्मचारी भी बीमार होने का फर्जी प्रमाणपत्र लेने के लिए रिश्वत देते हैं। इसी तरह कर्मचारी मेडिकल फिटनेस का प्रमाणपत्र पाने के लिए भी रिश्वत देते हैं। रिश्वत नहीं देने पर गरीब मरीजों का ठीक से  इलाज भी नहीं होता है।' हालांकि रेलवे के बाहर के अस्पतालों में भी ऐसा होता है। लेकिन क्या इसी वजह से भारतीय रेलवे से जुड़े लोग यथास्थिति में बदलाव नहीं चाहते हैं? 
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)
Keyword: railway, hospital,,
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