बिजनेस स्टैंडर्ड - जेब में बढ़ी नकदी तो खर्च में भी बढ़ोतरी
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जेब में बढ़ी नकदी तो खर्च में भी बढ़ोतरी

रॉयटर्स /  June 22, 2018

बिजनेस स्टैंडर्ड जेब में बढ़ी नकदी तो खर्च में भी बढ़ोतरीपिछले कुछ महीनों में भारतीय गृहिणी रुथ टिमी वर्गीज की जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है। उनकी जिंदगी में कुछ पल ऐसे भी आए जब उन्हें अपनी चार साल की बेटी की बचत राशि से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करनी पड़ी और एक वक्त ऐसा भी है जब वह बाहर खाने और शॉपिंग करने पर कम से कम 50 फीसदी ज्यादा रकम खर्च कर रही हैं। 32 वर्षीय वर्गीज ने कहा कि 2016 के नवंबर महीने में अचानक नोटबंदी की घोषणा होने के बाद अपनी बेटी की गुल्लक फोडऩी पड़ी ताकि घरेलू खर्च का इंतजाम किया जा सके।

वर्गीज अपने पति की विज्ञापन क्षेत्र की नौकरी और अपने फ्रीलांस काम से होने वाली आमदनी का हवाला देते हुए कहती हैं, 'अब हम पूरे आत्मविश्वास के साथ एक या दो साल पहले के मुकाबले खरीदारी और खाने-पीने पर खुलकर खर्च करते हैं क्योंकि हमारी आमदनी अब स्थिर हो गई है। आखिर हम अपनी खुश होने की वजहों को कितने समय तक टाल सकते हैं?'

वर्गीज की तरह ही कई मध्यमवर्गीय आमदनी वाले लोग ब्यूटी सलून में जाने, खरीदारी करने, फिल्में देखने और बाहर खाना खाने पर पैसे खर्च कर रहे हैं क्योंकि नोटबंदी और पिछले साल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने जैसे दो बड़े फैसलों से अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा था जो अब सामान्य होने लगा है। खर्च में बढ़ोतरी से बुनियादी महंगाई में तेजी आ रही है और इससे कुल उपभोक्ता मूल्य महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मार्च 2019 तक के 4.7 फीसदी के लक्ष्य से ऊपर रह सकता है।

ऐसे में संभव है कि आरबीआई आने वाले महीने में एक बार से अधिक बार दरों में बढ़ोतरी कर पाए। लेकिन इससे एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर असर पड़ सकता है जहां जल्द चुनाव होने हैं। मुंबई के सतीश रेस्तरां ऐंड बार के मालिक संतोष शेट्टïी कहते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी पर अमल होने के बाद से कारोबार में 50 फीसदी तक की कमी आई थी लेकिन अब कच्चे माल और मेन्यू की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद जनवरी से हालात सामान्य हो गए हैं।

उन्होंने बताया, 'सभी कच्चे माल की लागत में तेजी आई है। सब्जियों से लेकर चिकन, मटन, अंडे और मसालों की लागत में 15-25 फीसदी तक की तेजी आई है और उसी के मुताबिक हमने मेन्यू की कीमतें बढ़ाई हैं। ग्राहक भी ज्यादा दरों का भुगतान करने के इच्छुक हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कीमतें हर जगह बढ़ रही हैं।' खर्च में यह बढ़ोतरी केवल शहरों तक सीमित नहीं है।

हिंदुस्तान यूनिलीवर समूह की ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी पहुंच है और उसकी बिक्री को ग्रामीण क्षेत्रों की मांग का मापक समझा जाता है। पिछले साल मार्च तिमाही में हिंदुस्तान यूनिलीवर के पर्सनल केयर और होम केयर उत्पादों में अच्छी वृद्धि देखी गई है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस साल मॉनसून के बेहतर पूर्वानुमान की वजह से कृषि आमदनी में बढ़ोतरी की संभावना है।

महंगाई का खतरा

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि उपभोक्ता खर्च में बढ़ोतरी से देश को मार्च की तिमाही में 7.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज करने में मदद मिली और यह एक संभावित महंगाई का बारुदी सुरंग है। देश में मई महीने में महंगाई चार महीने के शीर्ष 4.87 फीसदी पर पहुंच गई जिसमें खाद्य और ईंधन को छोड़कर 6.20 फीसदी बुनियादी मुद्रास्फीति का योगदान है। जनवरी से ही मनोरंजन आदि से जुड़ी मुद्रास्फीति में तेजी का रुझान देखा गया जो मई में बढ़कर सालाना 4.93 फीसदी के स्तर पर चला गया।

लगातार तीसरे महीने पर्सनल केयर मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी हुई और यह 5.61 फीसदी के स्तर पर चला गया। परिवहन, परिधान, घरेलू सेवाओं ने भी आरबीआई की चिंता बढ़ा दी है जिनकी मुद्रास्फीति में करीब 40 फीसदी हिस्सेदारी होती है। इनकी वजह से चार सालों में पहली बार जून की शुरुआत में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी हुई।

आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप के मुख्य अर्थशास्त्री ए प्रसन्ना कहते हैं, 'मूल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में तेजी आती है और अंतर्निहित मुद्रास्फीति 5 फीसदी के स्तर पर बरकरार रहती है तब मौद्रिक नीति समिति द्वारा दरों में उम्मीद से ज्यादा बढ़ोतरी का जोखिम हो सकता है।' उन्होंने कहा कि अक्टूबर तक दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी को अमलीजामा पहनाये जाने से कारोबार और परिवारों को झटका लगा था क्योंकि अप्रैल-जून 2017 में वेतन वृद्धि कम होकर 6 फीसदी तक हो गई थी जो एक साल पहले 10 फीसदी तक थी। हालांकि 2018 ज्यादा बेहतर साल नजर आ रहा है। वेतन में भी औसतन 7-8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और उपभोक्ता आत्मविश्वास सूचकांक में भी सुधार है।

उपभोक्ता वस्तु कंपनियों की मांग में तेजी देखी गई है। हालांकि प्रॉपर्टी की कीमतों में मंदी का रुझान रहा क्योंकि तैयार घरों की बिक्री न होने से कीमतों पर लगाम लगी रही। हालांकि दरों में बढ़ोतरी से कर्ज की लागत ज्यादा होगी और इससे वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

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