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डिजिटल पहल से एमएसएमई क्षेत्र की समस्याएं हो सकती हैं हल

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  June 21, 2018

देश की आर्थिक वृद्घि में तेजी का अगला दौर कहां से आएगा? इस सवाल का जवाब आसान नहीं। क्षेत्रवार वृद्घि का अनुमान लगाना तो मुश्किल है ही, देश की मौजूदा ढांचागत समस्याएं भी काफी गहरी हैं। आधिकारिक जीडीपी आंकड़ों में सुधार के बावजूद माहौल में निराशा है।  एक हद तक देखें तो मूल समस्या ऋण और निवेश में आए स्थगन की है। सरकारी बैंकों का फंसे हुए कर्ज का संकट दूर-दूर तक हल होता नहीं दिख रहा। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता मोदी सरकार का एक अहम सुधार अवश्य है लेकिन उद्यमों को ऋण के क्षेत्र में सरकारी बैंकों का दबदबा है और हममें से ज्यादातर लोग मानते हैं कि जब तक वे ऋण देने के प्रति आश्वस्त नहीं होंगे, निजी क्षेत्र में सुधार नहीं होगा। बैड बैंक पर हालिया जोर के पीछे यही चिंता जिम्मेदार है। बैड बैंक एक बुरा विचार था और है। अतीत में की गई गलतियों की जिम्मेदारी किसी को तो लेनी चाहिए। 

 
मौजूदा हालात में लगता नहीं कि देश में निवेश की अवस्था निकट भविष्य में सुधरने वाली है। राज्यों और केंद्र द्वारा की जा रही उधारी बताती है कि ऋण बाजार पर भी काफी बोझ है। इसके बावजूद सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) मध्यम अवधि में सुधार का वाहक बन सकता है।  एक स्तर पर यह चौंकाने वाली बात है। आखिर हम एक ऐसे दौर से उबर रहे हैं जहां सरकारी नीति ने एमएसएमई क्षेत्र को गहरे तक प्रभावित किया। नोटबंदी ने सूक्ष्म उद्यमों को अत्यधिक प्रभावित किया क्योंकि वे अधिकांशत: नकदी से संचालित होते हैं। इसी तरह अत्यधिक जटिल ढांचे वाले वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और तयशुदा लागत की जरूरत ने भी इन उद्यमों को प्रभावित किया। इस वर्ष अब तक बीएसई स्मॉल कैप और मिड कैप सूचकांक 10 फीसदी तक नीचे हैं, हालांकि सेंसेक्स में मामूली सुधार हुआ है। पिछले वर्ष दोनों सूचकांकों में मजबूत वृद्घि देखने को मिली है। 
 
फिर भी कुछ संकेतक बताते हैं कि इस क्षेत्र में सुधार हो रहा है। जून के आरंभ तक बीएसई के एसएमई प्लेटफॉर्म में 250 कंपनियां सूचीबद्घ थीं और बाजार से 20 अरब रुपये जुटाए गए। एसएमई आईपीओ की स्थिति भी मजबूत दिखती है और वे व्यापक बाजार से बेहतर हैं। अहम बात यह है कि अधिकांश ऋणदाता मानते हैं कि एसएमई में ऋण की भूख है और वे अपनी कारोबारी नीतियों में जरूरी बदलाव कर रहे हैं। एडलवाइस के रशेश शाह कह चुके हैं कि एसएमई क्षेत्र में अगले एक दशक में 18 से 20 फीसदी की सालाना ऋणवृद्घि देखने को मिल सकती है। 
 
अर्थव्यवस्था में ऐसे अहम बदलाव हुए हैं जो एमएसएमई में नई जान फूंक सकते हैं। अगर कोई आशावादी है तो वह कह सकता है कि सरकार ने बीते वर्षों बुनियादी क्षेत्र पर जो व्यय किया है उससे एमएसएमई को वैश्विक बाजार से जोडऩे में मदद मिलेगी। मुझे यकीन नहीं है कि यह बदलाव इतने बड़े पैमाने पर हुआ है या बुनियादी ढांचा विकास से एमएसएमई का इतनी तेज वैश्विक एकीकरण होगा। इसके लिए नियामकीय बाधाओं को दूर करना होगा। जीएसटी को भी सरल किया गया है। जीएसटी को अनुपालन बढ़ाने का उपाय मानने के बजाय करदाताओं का बोझ कम करने वाला बनाना होगा। इससे कर वंचना कम होगी और राजस्व बढ़ेगा। 
 
बहरहाल, देश पिछले दिनों सॉफ्ट या कहें डिजिटल व्यवस्था की शुरुआत करने में सफल रहा है। इस बीच अगर कुछ देर के लिए आधार की कानूनी और राजनीतिक दिक्कतों को परे कर दें। सरकार द्वारा समावेशन और कल्याण योजनाओं में छद्म बचत को भी किनारे कर दें। इसके बाद जो बचता है वह है राज्य की डिजिटल शाखा का अप्रत्याशित विस्तार। एमएसएमई के लिए इसका क्या अर्थ है? माना जा रहा है कि ऋण के क्षेत्र में इससे काफी सुधार हुआ और पहुंच आसान हुई। ऋण और सूचीबद्घता में सुधार और मुद्रा योजना में सुधार के बावजूद छोटे उद्यम ऋण की कमी से जूझ रहे हैं। सिबिल की हालिया रिपोर्ट में कहा गया कि 15 करोड़ से अधिक संभावित कर्जदारों को कर्ज की जरूरत है लेकिन कर्ज तक उनकी पहुंच नहीं बन सकी। अब ऋण चाहने वालों के लिए संभव है कि वे अपने जीएसटी और बिल भुगतान रिकॉर्ड को एनबीएफसी समेत वित्तीय संस्थानों को दे सकें। इससे बैंकों को कर्ज चाहने वालों की मिनटों में छंटनी करने में मदद मिलेगी। पहले उसे तीन साल का अंकेक्षित रिटर्न खंगालना होता था। नया आकलन अधिक सटीक होने की भी संभावना है। ऐसे में कर्ज देने की गति बढ़ाई जा सकती है। ऐसे लोग जिन्हें शायद आज कर्ज के योग्य माना जा रहा है उन्हें भी अचानक पूंजी तक पहुंच आसान लगेगी। इससे पूंजी की लागत कम होगी और ऑर्डर, परियोजनाओं और निवेश की तादाद बढ़ेगी।
 
मुद्रा ऋण बैंकों के लिए अगली दिक्कत बन सकते हैं। यहां तक कि जिन कर्जदारों ने एमएसएमई को और व्यक्तिगत ऋण को बढ़ाया है वे दिक्कत में पड़ सकते हैं। अब यह बात जाहिर हो चुकी है कि देश में संपत्ति की कीमतें अतिरंजित रूप से बढ़ी हुई हैं। इस मामले में जोखिम के मूलभूत सिद्घांत की अनदेखी की गई। डिजिटल तकनीक उन सिद्घांतों को नहीं बदलती, न ही यह इजाजत देती है कि उनकी अनदेखी की जाए। वह केवल उनके बेहतर इस्तेमाल की इजाजत देती है। अगर हमें एमएसएमई की तेज वृद्घि का पूरा लाभ लेना है तो ये तमाम उपाय पर्याप्त साबित नहीं होंगे। हमें वित्तीय और डिजिटल साक्षरता भी बढ़ानी होगी। सरकार की डिजिटल इंडिया की योजनाओं में अब तक इसकी अनदेखी हुई है। मुझे लगता है राज्य संचालित डिजिटल बूट कैंप ऐसा करने के सही उपाय नहीं हैं। इस क्षेत्र के एक सलाहकार ने इसकी जगह डिजिटल फाइनैंस के लिए एनआईआईटी की सलाह दी। चाहे कुछ भी हो एमएसएमई की ओर से वृद्घि का कुछ दबाव तो बनेगा। परंतु अगर नए डिजिटल बुनियादी ढांचे के अनुसार कौशल विकसित किया गया तो वृद्घि भी अच्छी होगी और इसके फायदों का विस्तार भी कहीं अधिक व्यापक होगा। 
 
Keyword: digital india, economy,,
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