बिजनेस स्टैंडर्ड - हमारी विदेश नीति और अहिंसा का सिद्घांत
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, November 17, 2018 10:32 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

हमारी विदेश नीति और अहिंसा का सिद्घांत

नितिन पई /  June 21, 2018

विदेश नीति में हमारे लिए केवल अहिंसा की नीति का पालन करते रहना उचित नहीं है। भारत को अपनी सैन्य क्षमताओं को कूटनयिक विफलताओं से बचाव का जरिया बनाना चाहिए। बता रहे हैं नितिन पई 

 
बीते कुछ महीनों के दौरान देश के कुछ विशिष्टï और वैचारिक रूप से समृद्घ राजनयिकों के साथ बातचीत के बाद मेरे मन पर यह छाप पड़ी है कि आधुनिक भारत की विदेश नीति यह स्वीकार कर चुकी है कि अपनी सीमाओं और समुद्री तटों से परे शक्ति का प्रयोग उसकी कल्पना से परे है। जबकि अपनी जमीनी सीमाओं और समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल स्वीकार्य तो है लेकिन उसे भी बहुत उचित नहीं समझा जाता। बल्कि उसे गलत ही समझा जाता है।  इसे बदलना होगा। बिना विदेश नीति को नए ढंग से परिभाषित किए और कूटनयिक और सैन्य शक्ति का मिश्रण तैयार किए भारत को नुकसान ही होगा। खासतौर पर इस समय जबकि वैश्विक व्यवस्था में तेजी से बड़े बदलाव आ रहे हैं, वैश्विक और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदल रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बदलाव आ रहा है, तब यह और जरूरी हो गया है। 
 
चीन के उदय और इसे लेकर दुनिया की प्रतिक्रिया ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को एक ऐसी प्रतियोगिता में बदल दिया है जहां प्रतिरोधक शक्ति का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थान न तो इसे रोक पा रहे हैं और न ही ऐसा करने वालों को दंडित किया जा रहा है। भारतीय विदेश नीति और रक्षा प्रतिष्ठïान को बहुत जल्द यह समझना होगा कि इसके हमारे लिए क्या निहितार्थ हो सकते हैं?  ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे कूटनयिक और हमारे सैन्य अधिकारी दो अलग-अलग दुनिया में रहते हैं। जबकि देश के राजनेता तो एक तीसरे ही छोर पर हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से निपटने की हमारी कोशिश में सैन्य शक्ति के इस्तेमाल का विकल्प सामने भी नहीं आता। यह एक रहस्य ही है कि भारतीय सेना गत वर्ष डोकलाम में कैसे प्रभावी ढंग से टिकी रही लेकिन मालदीव इस बात का उदाहरण है कि कैसे हमारी विदेशी नीति में सैन्य शक्ति का विकल्प नहीं है। अब्दुला यामीन की सरकार मालदीव में चीन के प्रभाव को लेकर भारत की चिंता का निरंतर दोहन कर रहा है। इस बीच मालदीव में चीन का दखल बढ़ता ही जा रहा है। अगर भारतीय विदेश नीति यहां भी अपनी सैन्य शक्ति की भूमिका तलाश नहीं कर सकता है जबकि यहां उसके हित बहुत हद तक जोखिम में हैं तो फिर यह सोचना होगा कि भला हम म्यांमार जैसी जगह पर कैसे हस्तक्षेप कर पाएंगे जबकि वहां एक किस्म का नरसंहार अंजाम दिया जा रहा है।
 
सैन्य बलों की बात करें तो वे अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। वे शारीरिक और मानसिक तौर पर जमीनी, हवाई और समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए मुस्तैद हैं। वे संगठित हैं, उन्हें इसका प्रशिक्षण हासिल है और वे पूरी तरह तैयार हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सीमाओं का सीधा संबंध उनसे है और उनमें यह क्षमता है कि वे एक अहम भूमिका निभा सकें। पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, नेपाल और कुछ हद तक श्रीलंका के साथ विदेशी नीति निर्धारण में उनकी भूमिका है। यानी अपने जमीनी पड़ोसियों के साथ भारत की नीति में राजनीतिक, कूटनयिक, खुफिया और सैन्य हित जुड़े हुए हैं। व्यापक भूगोल की बात करें तो यह संतुलन नदारद है। उदाहरण के लिए भारत ने सन 1990 के दशक के आरंभ में पूर्व की ओर देखो नीति अपनाई थी लेकिन सशस्त्र बलों को उसे अपनाने में 15 वर्ष का समय लग गया। हमारी अफगान नीति पूरी तरह कूटनीति, खुफिया सेवाओं और अर्थशास्त्र पर आधारित है। यहां सैन्य विकल्प नहीं अपनाया गया है। 
 
हमारी सशस्त्र सेनाएं अनेक देशों के साथ संयुक्त युद्घाभ्यास में शिरकत करती हैं परंतु वे उन सामरिक संदर्भों से बाहर हैं जिनमें उनसे संयुक्त कार्रवाई करने को कहा जा सकता है। संयुक्त सैन्याभ्यास यकीनन पेशेवर और सामरिक क्षमताओं के विकास में मदद करते हैं लेकिन यह हमारी सैन्य नीति का हिस्सा कभी नहीं बन पाता है। मैं साफ कर दूं कि मैं आक्रामक विदेश नीति की वकालत नहीं कर रहा हूं बल्कि मेरा मानना है कि भारत को अपनी सैन्य क्षमताओं को दुनिया भर में कूटनयिक विफलता से निपटने का तरीका बनाना चाहिए। 
 
ठीक उसी तरह जैसे हम अपने उन पड़ोसियों के साथ कर सकते हैं जिनकी भौगोलिक सीमाएं हमसे मिलती हैं। यह वक्त की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को विदेशी सैन्य तैनातियों को लेकर एक नीति तैयार करनी चाहिए। इसे एक सार्वजनिक दस्तावेज के रूप में तैयार करना चाहिए। इससे सैन्य बल इस बारे में व्यवस्थित ढंग से सोचेंगे कि आखिर वे किस तरह की भूमिका निभा सकते हैं और उनको कैसी तैयारी करनी होगी। विदेशी सैन्य तैनाती नीति का प्राथमिक स्वामित्व एक संयुक्त युद्घक कमांड अभियान के हाथ में हो जो एकीकृत रक्षा स्टाफ (आईडीएस) के अधीन हो। ऐसी ताकत की मदद से सक्षमता विकसित करनी होगी, अपने पास पड़ोस के अलावा क्षेत्रों में भी संसाधन और संगठनात्मक रुचि पैदा करनी होगी। यह राजनीतिक नेतृत्व को एक नया विकल्प दिलाएगा। आदर्श स्थिति में वह राजनयिक और सैन्य अधिकारियों को एक साथ ला सकता है। परंतु अगर नौकरशाही का गणित इसकी इजाजत न दे तो भी एक प्रतिस्पर्धी रिश्ता भी कोई बुरी बात तो नहीं है। 
 
ऐसे सुझाव पर कुछ लोगों की भौंहें भी टेढ़ी हो सकती हैं लेकिन मुझे यह बात नजर नहीं आ रही है कि भारत बिना अपनी सेना को विदेश नीति की निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाए अपने वैश्विक हितों का बचाव किस प्रकार कर पाएंगा। बल्कि हम देखें तो कुछ हद तक ऐसा होता नजर भी आ रहा है अब जरूरत है इसे व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल में लाने की। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि सैन्य बलों में जिस तरह के अधिकारी भर्ती किए जा रहे हैं या जिस तरह के अधिकारियों को जनरल आदि के पदों पर प्रोन्नत किया जा रहा है, उसमें बदलाव की आवश्यकता है। इस सुझाव पर भी भृकुटियां टेढ़ी हो सकती हैं लेकिन जरूरी नहीं कि हमारे श्रेष्ठï कमांडर भू राजनैतिक मामलों में श्रेष्ठï रणनीतिकार भी हों।  कौटिल्य के वक्त से लेकर आज तक हमारी सैन्य शक्ति को सबसे कम प्राथमिकता दी गई जबकि अब वक्त आ गया है कि इसमें बदलाव लाया जाए। 
Keyword: india, defance,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पीसीए नियमों में ढील देने पर सहमत होगा आरबीआई?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.