बिजनेस स्टैंडर्ड - बैड बैंक: समाधान या नई समस्या?
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बैड बैंक: समाधान या नई समस्या?

अश्विन पारेख /  06 20, 2018

मौजूदा प्रक्रिया को सरल बनाने और क्रियान्वयन से जुड़ी खामियों को दूर किया जाए तो यह बेहतर साबित हो सकता है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अश्विन पारेख

 
फंसे हुए कर्ज की समस्या ने नीति निर्माताओं और सरकारी बैंकों की रातों की नींद उड़ा रखी है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फंसे हुए कर्ज की समस्या के निस्तारण को लेकर गंभीरता और प्रतिबद्घता दिखाई है। फंसे हुए कर्ज की समस्या के निस्तारण को लेकर कई संभावित विचारों पर चर्चा और बहस हुई। उनमें से कुछ को लेकर प्रयास भी किए गए। ऐसा ही एक विचार जिस पर बार-बार चर्चा की जाती रही है वह है बैड बैंक की स्थापना।  बैड बैंक का विचार यह है कि किसी बैंक की सारी फंसी हुई परिसंपत्ति और कर्ज को बैड बैंक नामक एक अलग संस्था के हवाले कर दिया जाना चाहिए ताकि बैंक की बैलेंस शीट में सुधार हो सके। उसके बाद बैड बैंक से यह उम्मीद की जाती है कि वह उचित तरीके से इनका प्रबंधन करे। इसमें नकदीकरण और पुनर्गठन करने जैसे तरीके शामिल हैं। परंतु एक बैड बैंक को सफलतापूर्वक संचालित करने की राह में भी कुछ चुनौतियां हैं। 
 
परिसंपत्ति गुणवत्ता को लेकर विसंगतिपूर्ण खबरों के बीच सरकार का समर्थन जरूरी है ताकि निवेशकों में भरोसा पैदा हो। यह काम बैड बैंक को पर्याप्त पूंजी मुहैया कराके भी किया जा सकता है और एक हद तक नुकसान को गारंटी देकर भी। 
 
बैड बैंक को स्थानांतरित की जाने वाली परिसंपत्ति का स्थानांतरण मूल्य सावधानीपूर्वक आकलित किया जाना चाहिए। अगर कीमतें बहुत अधिक हुईं तो बैड बैंक स्वत: नाकाम हो जाएगा।  अगर कीमतें बहुत कम हुईं तो मूल बैंक के अंशधारकों का नुकसान होगा। 
 
परिसंपत्ति स्थानांतरण के बाद बैड बैंक को ऐसे लोगों को नियुक्त करना होगा जिन्हें रणनीतिक निर्णय लेने में विशेषज्ञता हासिल हो। जो पुनर्गठन, परिसंपत्ति की आंशिक बिक्री और नकदीकरण करने में सक्षम हों। देश में ऐसे विशेषज्ञ पेशेवरों की कमी है। बैड बैंक में एक अलग प्रबंधन ढांचा खड़ा करना होगा ताकि निस्तारण के साथ उचित प्रोत्साहन जोड़ा जा सके। 
 
निवेशकों के नजरिये से विविधतापूर्ण परिसंपत्ति वाले बैड बैंक में मूल्यांकन बहुत मुश्किल होगा। स्वीडन में नॉर्डबैंकेन और गोटा बैंक के सफल उदाहरण हमारे सामने हैं जहां हर तरह की बैंक जवाबदेही की गारंटी और बैंकों के सरकार द्वारा पूंजीकरण ने सफलता दिलाने में अहम भूमिका निभाई। न तो सरकार में संपूर्ण गारंटी देने की कुव्वत है और न ही बैड बैंक के पुनर्पूंजीकरण के संसाधन हैं उसके पास।
 
उपरोक्त चुनौतियों को देखते हुए बेहतर यही होगा कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के अधीन निस्तारण प्रक्रिया को सुसंगत बनाने का प्रयास किया जाए। मौजूदा प्रक्रियाओं को सरल बनाकर और क्रियान्वयन की दिक्कतों को दूर करके बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं, बजाय कि बैड बैंक जैसे नए विचार को आजमाने के। आईबीसी के पक्ष में एक और बात जाती है, वह यह कि इसमें इच्छुक निवेशकों को शामिल किया जा सकता है। इसमें फंसी हुई परिसंपत्ति के सामरिक और वित्तीय दोनों तरह के निवेशक शामिल हैं।
 
ऐसा कदम उठाया गया तो फंसी हुई परिसंपत्तियों के निस्तारण की संभावना बढ़ जाएगी, बजाय कि बैड बैंक के जहां कि अंशधारक निश्चित तौर पर अंशधारकों के लिए लाभ ले आएं यह आवश्यक नहीं। निवेशकों को आकर्षित करने और उनको बनाए रखने के लिए पूरा ध्यान अब फंसी हुई परिसंपत्ति के मांग क्षेत्र पर केंद्रित होना चाहिए। यह मानना जरूरी है कि वास्तविक सुधार और निस्तारण तभी हो सकता है जब इस तनावग्रस्त परिसंपत्ति के लिए बाजार तैयार किया जाए। फिलहाल फंसी परिसंपत्ति की आपूर्ति बहुत अधिक है जबकि इनकी मांग बहुत कम। रास्ता चाहे बैड बैंक का हो या आईबीसी, मांग को मजबूत करना अत्यंत जरूरी है।
 
फंसी हुई संपत्ति के लिए बाजार बनाने के लिए उचित नीतियां बनाना और निवेशकों के लिए निवेश के पर्याप्त उपाय तैयार करना वक्त की जरूरत है। परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों के पास फंड है जो फंसी हुई परिसंपत्ति खरीद सकती हैं और समस्या हल कर सकती हैं लेकिन फंसी हुई परिसंपत्ति की तुलना में उनकी क्षमता नगण्य है। इसके अलावा ऐसे संस्थानों पर तगड़े नियमन हैं जिनके चलते यह क्षेत्र समुचित विकास नहीं कर पा रहा है।  प्रतिभूति समर्थित ऐसी परिसंपत्ति के लिए जीवंत बाजार तैयार करने के लिए विक्रेताओं को प्रोत्साहित करना होगा कि वे फंसी हुई परिसंपत्ति को निपटाएं। खरीदारों को भी कर निर्धारण और संभावित कर प्रोत्साहन की मदद से इस संबंध में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा जिन परिसंपत्तियों के पुनर्गठन या निस्तारण में अधिक वक्त लग रहा हो वहां लंबी अवधि की पूंजी वाले संस्थानों की मदद से मांग तैयार करना आवश्यक है।
 
निस्तारण तो इस पूरी कहानी का एक पहलू है लेकिन इस समस्या को बार-बार दोहराए जाने से बचने के लिए मूलभूत सुधारों की आवश्यकता है। मौजूदा संकट की कुछ अहम वजह हैं कमजोर मानक, जोखिम आधारित ऋण मूल्यांकन की कमी, कमजोर निगरानी, फंसी हुई परिसंपत्तियों में लगातार इजाफा और शुरुआती चरण में दिक्कत से निपटने की प्रक्रिया की कमी। कमजोर कारोबारी प्रशासन व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है। मौजूदा एनपीए संकट से बैंकिंग व्यवस्था के लिए परेशानी बना हुआ है। उससे निपटने के लिए व्यवस्थित उपायों की आवश्यकता है। 
 
नीति निर्माता और बैंकिंग व्यवस्था को संभावित घरेलू और विदेशी निवेशकों को एक स्पष्टï संदेश भेजना चाहिए। वह यह कि एनसीएलटी और आईबीसी की प्रक्रियाओं को गंभीरतापूर्वक और पूरी प्रतिबद्घता से चलाया जाएगा। अगर मिलेजुले और नाना प्रकार के संदेश दिए जाएंगे तो निवेशक सुधार की प्रक्रिया में हिस्सेदारी करने से बचेंगे। वे तब तक इंतजार करना बेहतर मानेंगे जब तक कि स्थिरता नहीं आ जाती है। ऐसे में हम सुधारों से वंचित रह जाएंगे। वक्त का तकाजा यह है कि हम फंसी हुई परिसंपत्तियों के लिए मांग तैयार करें और निरंतर प्रतिबद्घता का जरूरी संदेश दें कि जरूरी लक्ष्य हासिल करने के लिए हम तय कार्यक्रमों पर अमल करेंगे।
 
(लेखक एडवाइजरी सर्विसेज एलएलपी के प्रबंध साझेदार हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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