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अग्रणी ब्रोकरेज कंपनियों का दबदबा कायम

पवन बुरुगुला / मुंबई 06 20, 2018

घरेलू ब्रोकिंग में बड़ी कंपनियों का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। आंकड़ों से पता चलता है कि 25 अग्रणी ब्रोकर अभी कुल कारोबार में 54 फीसदी का योगदान करते हैं, जो पांच साल पहले 41 फीसदी था। 10 अग्रणी ब्रोकरों की हिस्सेदारी 2013-14 के 24 फीसदी के मुकाबले 2017-18 में बढ़कर 32 फीसदी पर पहुंच गई। ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सेबी के पास करीब 2,500 ब्रोकरेज कंपनियां पंजीकृत हुई हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि छोटी ब्रोकरेज कंपनियां तकनीकी बदलाव के साथ रफ्तार बनाए रखने में सक्षम नहीं हो पाईं। साथ ही हालिया नियामकीय बदलाव भी बड़ी कंपनियों के हक में नजर आ रहे हैं।
 
बाजार के भागीदारों ने कहा, क्लाइंट लगातार उन कंपनियों को तरजीह दे र हे हैं जो ट्रेडिंग के नवीनतम उपकरण मुहैया करा रहे हैं मसलन मोबाइल ऐप्लिकेशन और रिसर्च का सपोर्ट आदि। अनुमान है कि ऑनलाइन की हिस्सेदारी कुछ साल पहले 20 फीसदी थी, जो अभी 40 फीसदी पर पहुंच गई है। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, कुल कारोबार का 7 फीसदी मोबाइल के जरिए होता है। अगर प्रोप्राइटरी व संस्थागत कारोबार को अलग कर दिया जाए तो यह हिस्सेदारी 40 फीसदी बैठती है। बड़ी कंपनियों ने निवेशकों के लिए अपने ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म को उन्नत बनाने के लिए अपनी हैसियत का भारी इस्तेमाल किया है, लेकिन छोटी कंपनियां ऐसा नहीं कर पाई। एक ब्रोकर ने कहा, तकनीक को उन्नत बनाना महंगा काम है और ज्यादातर छोटी ब्रोकरेज कंपनियां इतना बोझ उठाने में सक्षम नहीं होंगी। छोटे आकार वाली ब्रोकिंग कंपनियों के पास 200-300 क्लाइंट होते हैं, लिहाजा तकनीक को उन्नत बनाने का कारोबारी मतलब नहीं बनता।
 
इस क्षेत्र के अनुमान के मुताबिक, पिछले तीन सालों में मोबाइल के जरिए कारोबार पहले के 3 अरब रुपये के मुकाबले बढ़कर 40 अरब रुपये रोजाना का हो गया है। कोटक सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक कमलेश राव ने कहा, खुदरा निवेशकों के बीच मोबाइल ट्रेडिंग लोकप्रिय हो गया है क्योंंकि खुदरा ट्रेड का बड़ा हिस्सा इंट्रा-डे होता है और निवेशक जब चाहे ऑर्डर देना पसंद करते हैं। बड़ी ब्रोकरेज कंपनियां हर तरह की सेवाएं मुहैया कराती हैं, जिनमें मोबाइल प्लेटफॉर्म पर शोध के जरिए मदद शामिल है, जो खुदरा निवेशकों के लिए सुविधाजनक होता है। इनमें से कई सुविधाएं तब उपलब्ध नहीं होती जब निवेशक छोटे ब्रोकर को चुनते हैं।
 
ब्रोकरों के लिए सेबी के नियमों में सख्ती से भी छोटी कंपनियां प्रभावित हुई हैं। हाल के वर्षों में सेबी ने कई नए नियम लागू किए हैं,जिनमें क्लाइंट के फंडों का इस्तेमाल रोकना और जोखिम प्रबंधन वाले कदमों में इजाफा शामिल है। ब्रोकिंग कम मार्जिन वाला कारोबार है और छोटी ब्रोकरेज कंपनियां अच्छी खासी आय मार्जिन की उधारी से और प्रोप्राइटरी (खुद की) ट्रेडिंग के लिए क्लाइंटों के फंडों का इस्तेमाल करके हासिल करती हैं। नए नियम में ब्रोकरेज कंपनियोंं को क्लाइंट का फंड इस्तेमाल करने से मना कर दिया गया है। ऐसे लेनदेन पर जीएसटी लागू होने के बाद मार्जिन के लिए उधारी को झटका लगा है।
 
चूड़ीवाला सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक आलोक चूड़ीवाला ने कहा, बढ़ती निगरानी, क्लाइंटों के लेजर बैलेंस को हर हफ्ते अपलोड करना आदि जैसे कदमों के चलते पिछले कुछ वर्षों से ब्रोकरों के लिए अनुपालन का बोझ बढ़ा है। दूसरी ओर, क्लाइंटों की तरफ से ब्रोकरेज को मिलने वाली रकम घटी है क्योंकि छूट वाले ब्रोकरों के उभरने के बाद इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा काफी ज्यादा बढ़ी है। ऐसे परिदृश्य में छोटी ब्रोकरेज कंपनियों को अपना अस्तित्व बचाए रखने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। निवेशकों के बीच म्युचुअल फंडों की बढ़ती लोकप्रिया भी छोटे ब्रोकरेज फर्मों से क्लाइंटों के निकलने की एक वजह है। फंडों का एसआईपी कई निवेशकों को आकर्षित करता है, जिनमें वेतनभोगी वर्ग शामिल हैं। 
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