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सोशल मीडिया पर ब्रांड और जागरूक उपभोक्ता आमने-सामने

विवेट सुजन पिंटो /  06 19, 2018

मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन को शायद इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि हेल्थ फूड ड्रिंक हॉर्लिक्स के कुपोषण से जुड़े एक विज्ञापन अभियान के लिए किए गए उनके ट्वीट से विवाद बढ़ जाएगा। इस वाकये से यह अंदाजा मिला कि उपभोक्ता बेहतर उत्पाद और स्वास्थ्य चिंताओं के प्रति जागरूक हैं और वे इसमें कोताही होने पर ब्रांड पर दबाव बना सकते हैं। आजकल लोग किसी भी मुद्दे पर ब्रांड का आमना-सामना करने से हिचकते नहीं हैं और हॉर्लिक्स ने हाल में इसका अनुभव भी किया। विशेषज्ञों और उपभोक्ताओं का कहना है कि हॉर्लिक्स में काफी ज्यादा शुगर है और उन्होंने बच्चन को इसका प्रचार न करने की गुजारिश की। हालांकि अभी इस पर बच्चन ने कोई जवाब नहीं दिया है लेकिन केवल हॉर्लिक्स ही उपभोक्ताओं के निशाने पर नहीं है।

दुनिया की सबसे बड़ी कॉफी चेन स्टारबक्स ने पिछले महीने अपनी वैश्विक नीति में बदलाव की घोषणा की और कहा कि स्टोर में प्रवेश करने वाले सभी लोग उनके ग्राहक हैं चाहे वे कोई ऑर्डर दें या न दें। कंपनी ने इस बदलाव की घोषणा तब की जब अमेरिका के एक स्टारबक्स स्टोर में एक दोस्त का इंतजार करने वाले दो अश्वेत लोगों के साथ बदसलूकी करने की बात को लेकर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया। इन दोनों ने उस स्टोर से कुछ भी नहीं खरीदा जिसकी वजह से स्टोर प्रबंधक ने पुलिस को वहां बुलाकर गिरफ्तार कराने की कोशिश की।

स्टारबक्स ने इस वाकये की वजह से अपनी ग्राहक नीति में बदलाव किया और इस कॉफी चेन ने अपने कर्मचारियों को नस्लीय भेदभाव के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए प्रशिक्षण सत्र आयोजित कराया। सालाना स्तर पर ब्रांड भरोसा रिपोर्ट लाने वाले टीआरए रिसर्च के मुख्य कार्याधिकारी एन चंद्रमौलि कहते हैं कि सोशल मीडिया ने एक ऐसे उपभोक्ताओं को बढ़ावा दिया है जिनका अपना एक नजरिया है और वे अपने विचारों को उन्मुक्त तरीके से व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं, 'कई तरह की प्रतिक्रिया मिलने से ब्रांड को चौतरफा आलोचना झेलनी पड़ सकती है।'

देश में तीन साल पहले जब मैगी प्रकरण शुरू हुआ तब इंस्टैंट नूडल्स पर नियामकीय और उपभोक्ता का दबाव बढ़ गया। यह विवाद नेस्ले इंडिया द्वारा तैयार किए गए मैगी के कुछ नमूनों की वजह से शुरू हुआ जिसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट था और वह भी स्वीकार्य सीमा से अधिक मात्रा में। ऐसे में उपभोक्ता, मीडिया और सरकार ने मिलावट पर काफी एतराज जताया जिसकी वजह से ब्रांड को देश की खुदरा दुकानों से मैगी के पैकेट वापस लेने पड़े। करीब 3.2 अरब रुपये तक के मैगी स्टॉक को ब्रांड ने वापस कराया और नेस्ले इंडिया को इस वजह से काफी नुकसान हुआ और उसे इससे उबरने में काफी वक्त लगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ताओं की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और ब्रांड को हर वक्त सतर्क रहना चाहिए। हाइपरकलेक्टिव के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और संस्थापक के वी श्रीधर का कहना है, 'हम ऐसे दौर में हैं जहां आपको यह अंदाजा भी नहीं होता कि किसकी आलोचनाओं की बौछार आप पर भारी पड़ सकता है। निश्चित तौर पर ग्राहक ही सर्वेसर्वा है। ब्रांडों के पास सिर्फ यही विकल्प बचता है कि वे उपयुक्त तरीके से ग्राहकों की प्रतिक्रिया या फीडबैक पर जवाब दें।'

मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी एम एस धोनी ने विज्ञापन करार के पैसे का भुगतान न होने पर हाल ही में रियल एस्टेट कंपनी आम्रपाली को अदालत में घसीटा। इससे पहले आम्रपाली की समय पर पूरा नहीं होने वाली परियोजनाओं को देखते हुए कुछ वक्त पहले फ्लैट खरीदारों ने धोनी को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते हुए उनसे ब्रांड से अलग होने की गुजारिश की थी। इस वाकये को देखते हुए धोनी ने उस ब्रांड के विज्ञापन करार से खुद को अलग कर लिया और कहा कि कंपनी को समय पर अपनी परियोजना पूरी करनी चाहिए।

वहीं दूसरी तरफ रेस्तरा के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत दरों में कटौती के बावजूद, फास्ट फूड कंपनी मैक्डॉनल्ड को पिछले साल उपभोक्ताओं के गुस्से का समय करना पड़ा। मैकडॉनल्ड ने रोष में आए उपभोक्ताओं के ट्वीट का जल्दी जवाब देने के लिए बाध्य होना पड़ा और उसे यह भी बताना पड़ा कि आखिर कर की दरों में कटौती के बावजूद भी बिल की रकम समान ही क्यों दिख रही है। इस चर्चा की वजह से सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया और ग्राहकों ने दूसरे फूड ज्वायंट्स के बिलों को भी गंभीरता से देखना शुरू कर दिया।

केएफसी को इस साल ब्रिटेन में एक बड़े संकट का सामना करना पड़ा जब फ्राइड चिकन की कमी की वजह से ब्रांड को अपने आउटलेट बंद करने पड़े। हालांकि यह प्रकरण केएफसी में आपूर्ति चेन साझेदारों में बदलाव की वजह से हुआ जिसकी वजह से ब्रांड को उपभोक्ताओं का गुस्सा झेलना पड़ा और इससे उसकी छवि खराब हुई। हालांकि अब एक हफ्ते में हालात सामान्य हो गए हैं लेकिन केएफसी ने उस वक्त से लेकर अब तक कई बार माफी मांगते हुए ट्वीट किया है और साथ ही अखबारों में इसी बाबत विज्ञापन भी दिया है।

इस वाकये से बैक एंड सेवाओं की अहमियत का अंदाजा हुआ साथ ही यह भी अंदाजा हुआ कि उपभोक्ताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। केएफसी ने संकट के दौरान हास्य-व्यंग्य का इस्तेमाल बड़ी चतुराई से किया था और विशेषज्ञों का कहना है कि कम गुणवत्ता वाले उत्पादों या कम सेवाओं के साथ ब्रांड-उपभोक्ता भरोसा तोडऩा पेचीदा हो सकता है। मिसाल के तौर पर स्वास्थ्य क्षेत्र की दिग्गज कंपनी जॉन्सन ऐंड जॉन्सन ने उपभोक्ताओं को हुए नुकसान के बदले में लाखों डॉलर देने का फैसला किया जिन्होंने ब्रांड को स्वास्थ्य मामले में अदालत तक घसीटा था।

हाल में न्यूजर्सी के एक दंपती को कंपनी ने 3.7 करोड़ डॉलर दिए जिन्होंने कंपनी के टैल्कम पाउडर के लंबे इस्तेमाल की वजह से हुए दुष्प्रभाव को लेकर अदालत में गुहार लगाई थी। भारत में भी जॉन्सन ऐंड जॉन्सन के बेबी केयर उत्पादों को लेकर एतराज जताया जाता है जिससे ब्रांड प्रतिष्ठा पर असर पड़ा। निश्चित तौर पर यह जंग अभी खत्म नहीं हुई है।

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