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तकनीक से कदमताल के लिए नीति की दरकार

श्याम सरन /  June 18, 2018

चर्चित अमेरिकी भविष्यवक्ता रे कुर्जवेल यह अनुमान जता चुके हैं कि वर्ष 2029 के अंत तक कृत्रिम बुद्घिमता में इस कदर सुधार हो जाएगा कि 1,000 अमेरिकी डॉलर मूल्य का कोई कंप्यूटर उपकरण इंसानी दिमाग से किए जाने वाले तमाम कामों को अंजाम देने में सक्षम होगा। उन्होंने कहा कि इसके बाद कृत्रिम बुद्घिमता में इसलिए भी तेजी से इजाफा होगा क्योंकि सैद्घांतिक तौर पर मशीनों द्वारा ग्रहण किए गए ज्ञान की ग्राह्यïता में कोई जैविक बाधा नहीं होगी। 

कुर्जवेल कहते हैं कि गैर जैविक बुद्घिमता बहुत बड़े अंतर से जैविक बुद्घिमता को पीछे छोड़ देगी। इस सदी के मध्य तक हम तकनीकी श्रेष्ठïता के उस दौर में होंगे जहां क्षमताएं मौजूदा स्तर से अरबों गुना बढ़ चुकी होंगी। अगर ये अनुमान अतिवादी हैं तो भी इसमें संदेह नहीं कि हम तकनीकी उन्नति के उस दौर में हैं जहां हमारा जीवन इसकी बदौलत तेजी से और अनिश्चित तरीके से बदल रहा है। तकनीक और इसकी प्रकृति को लेकर इंसानी समझ के बीच का अंतर कभी व्यापक नहीं था जितना कि आज। अहम बात यह है कि कई देशों में राजनीतिक नेतृत्व तो डिजिटल तकनीक को लेकर आसक्त हैं और वे सोशल मीडिया जैसे डिजिटल साधन की मदद से अपनी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ाते हैं। परंतु यह डिजिटल के प्रति जागरूक होना नहीं है। 

तकनीक हमेशा दोधारी तलवार रही है। इससे अच्छे और बुरे दोनों तरह के नतीजे हासिल हो सकते हैं। इसका चुनाव तो हमेशा करना होता है। तकनीक अपने आप में कुछ भी निर्धारित नहीं करती। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि आय की असमानता या रोजगार का नुकसान आदि बातें अपने आप में तकनीक से जुड़ी हुई हैं। नई तकनीक के लाभ सबको समान तरीके से हासिल हों तथा जोखिम न्यूनतम हों, यह सुनिश्चित करने में जन नीति बहुत अहम भूमिका निभाती है। उत्तरी यूरोप के देश और जापान तकनीकी रूप से बहुत संपन्न हैं लेकिन वहां भी आय की असमानता है। डिजिटल तकनीक से बदलाव आ रहा है लेकिन भारत जैसे देश में इसका इस्तेमाल निजी परिवहन को बढ़ाने के लिए हो या सार्वजनिक परिवहन को? इस प्रश्न का नीतिगत उत्तर जरूरी है।

अनुमान के मुताबिक यूरोप में 47 प्रतिशत रोजगार 2035 तक स्वचालित हो जाएंगे। हालांकि इस बीच नए क्षेत्रों में रोजगार तैयार होंगे जो उच्च गुणवत्ता और बढिय़ा वेतन वाले होंगे। परंतु असली चुनौती यही होगी कि लोगों को नए काम के लिए प्रशिक्षित और कौशल संपन्न कैसे बनाया जाए। यह भी जन नीति का मसला है। तकनीक आधारित और ज्ञान की प्रबलता वाली अर्थव्यवस्था में उच्च स्तरीय कौशल अनिवार्य है। डिजिटल तकनीक हमें वह उपकरण मुहैया कराती है जिनका इस्तेमाल ऐसी क्षमता के निर्माण में किया जा सकता है। इंटरनेट की पहुंच का विस्तार हो रहा है और स्मार्टफोन हर जगह नजर आने लगे हैं। ऐसे में इन मंचों का इस्तेमाल करके वेब आधारित शैक्षणिक और प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करना आसान है।

कुर्जवेल की दलील है कि तकनीकी बदलाव की अगली लहर जेनेटिक्स, नैनो टेक्नोलजी और रोबोटिक्स के क्षेत्र में होगी और कंप्यूटिंग की बढ़ती शक्ति इसमें मददगार होगी। विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों की सीमाएं धुंधली पड़ जाएंगी और भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान एकीकृत होने लगेंगे। इन्हें एक छोटे उपकरण में समाहित करके मनुष्य के शरीर में स्थापित किया जा सकेगा। इन तकनीक का बेहतर प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए विधिक और नैतिक दिशानिर्देश तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है। 

इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व को विज्ञान की गहरी समझ होनी चाहिए जबकि वैज्ञानिकों को इन नवाचार के मनुष्य पर पडऩे वाले प्रभाव की समझ होनी जरूरी है। राज्यों को ऐसे मंच निर्मित करने चाहिए जहां राजनेता, वैज्ञानिक, पेशेवर, नौकरशाह और नागरिक समाज के लोग तकनीकी बदलाव पर निरंतर बात कर सकें, उसके विभिन्न प्रभावों का आकलन कर सकें और उनके नतीजों के सकारात्मक इस्तेमाल की व्यवस्था कर सकें। ऐसी संबद्धता के साथ ही व्यापक सहमत बन सकती है। इससे देश में डिजिटल नवाचार को लेकर एक स्वस्थ बहस भी विकसित हो सकेगी।

यह भी आवश्यक है दुनिया भर के तकनीकी नवाचारों पर नजर रखी जाए क्योंकि तकनीक ने सही मायने में दुनिया को एक व्यापक स्वरूप प्रदान किया है। दुनिया में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां तकनीकी प्रगति पर निरंतर नजर रखी जा रही है और राजनीतिक संस्थानों, आर्थिक प्रक्रियाओं और मानव स्वभाव पर उनके असर की भी निगरानी की जा रही है। ऐसी दार्शनिक चर्चाएं भी चल रही हैं कि क्या हम मानवोत्तर विश्व की ओर बढ़ रहे हैं और क्या इंसानों से भी अधिक दिमागी क्षमता वाली मशीनें स्वयं जीवविज्ञान का ही उन्मूलन तो नहीं कर देंगी? क्या हमें ऐसे विश्व की आकांक्षा करनी चाहिए? भारत में ऐसी बहस की प्रासंगिकता नहीं नजर आती। 

भारत डिजिटल क्षेत्र में कई तरह से दुनिया के अन्य देशों से बेहतर स्थिति में है। किसी अन्य देश में आधार की तरह सार्वभौमिक पहचान का मंच मौजूद नहीं है। यह न केवल अमूल्य डाटाबेस है बल्कि ऐसा मंच है जिसका उपयोग तमाम डिजिटल सेवाओं के लिए किया जा सकता है। चुनौती है निजता और सुरक्षा का उल्लंघन किए बिना लक्ष्य हासिल करने की। 

अगर डिजिटल ऐप्लीकेशंस को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना है तो भरोसे के मुद्दे को हल करना होगा। भारत के पास एक अन्य क्षमता है स्मार्टफोन की तेजी से बढ़ती पहुंच। इसे कृत्रिम बुद्घिमता का पहला दौर माना जा सकता है। इनमें ऐसे सॉफ्टवेयर डाले जा सकते हैं जो ढेर सारे काम कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर किसानों को मौसम की जानकारी, जिंस कीमतों का पता लगाना, सही उर्वरक चुनना। वे पहले ही नागरिकों के वित्तीय समावेशन में मदद कर रहे हैं। 

जल्दी ही ऐसे सॉफ्टवेयर भी होंगे जो एक भाषा से दूसरी भाषा में लिखित या वाचिक अनुवाद करेंगे। इस क्षेत्र में वृद्घि की असीमित संभावनाएं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम समाज में विज्ञान और नवाचार की संस्कृति को जोड़ें। लोग न केवल नई तकनीक इस्तेमाल करें बल्कि उसे समझें भी। बिना ऐसा किए अंधश्रद्घा और रूढि़वाद हावी हो जाएगा और उन्हीं तकनीक का इस्तेमाल लोगों पर नियंत्रण कायम करने के लिए किया जाने लगा। डिजिटल इंडिया का ताल्लुक केवल तकनीक से नहीं है। यह देश को आधुनिक मस्तिष्क से लैस करने से भी संबंधित है। ऐसे मस्तिष्क जो जिज्ञासु हों, सवाल करें और बहसतलब हों। 
Keyword: रे कुर्जवेल, अमेरिकी डॉलर, कंप्यूटर उपकरण, मीडिया,
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