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तेज वृद्घि के लिए

संपादकीय /  June 18, 2018

इस सप्ताह नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में देश के कई मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर कहा कि देश को दो अंकों की वृद्घि हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। यह महत्त्वाकांक्षा सराहनीय है। मौजूदा वृद्घि दर से संतुष्टï न होना अहम है। भले ही यह दर बीती कई तिमाहियों की मंदी की तुलना में सुधार दिखा रही हो। बिना दो अंकों की वृद्घि हासिल किए हम व्यापक समृद्घि हासिल नहीं कर सकते, न ही बतौर अर्थव्यवस्था उच्च मध्य आय वाले देश का दर्जा पा सकते हैं। अब जबकि सरकार दो अंकों की वृद्घि का लक्ष्य लेकर चल रही है तो इस स्थिति में सरकार के उच्चतम स्तर पर नवाचार अत्यावश्यक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री के शब्द सुधार के मोर्चे पर सरकार के प्रयासों को नए सिरे से गति देंगे।

ऐसी जीवंतता की सख्त आवश्यकता है। सन 2014 में जिस समय मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान ने सत्ता संभाली, उम्मीद की गई थी कि देश जल्दी ही उच्च वृद्घि दर के मार्ग पर लौटेगा। कई वरिष्ठ अधिकारियों की बातों से इस धारणा को बल भी मिला कि दो अंकों की वृद्घि करीब ही है। ऐसा लगा मानो इसे हासिल करना कुछ ही वक्त की बात है। उम्मीद की जानी चाहिए कि उन अनुमानों पर अब नए सिरे से विचार किया जाएगा। सच तो यह है कि स्थायित्व भरी वृद्घि के लिए सरकार के राजनीतिक साहस की भी आवश्यकता है। नीति निर्माण के क्षेत्र में सरकार की ऊर्जा में कोई बुराई नहीं तलाश की जा सकती। परंतु यह भी सच है कि सुधार के एजेंडे के कई पहलू शायद भुला दिए गए हैं। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता ने पूंजी के मुक्त प्रवाह में मदद की और वित्तीय समावेशन को गति दी है। परंतु अन्य कारकों को उतनी तवज्जो नहीं दी गई। 

श्रम कानून सुधार लंबित हो गए हैं। यह स्पष्टï है कि इन्हें राज्यों पर छोडऩे के निर्णय ने कोई उम्मीद नहीं जगाई है, न ही निवेशकों में कोई भरोसा जन्मा है। प्रतिबंधात्मक श्रम कानूनों ने निवेश और अनुबंध पर रखने की प्रक्रिया को हतोत्साहित किया है। यह समस्या केंद्र ने पैदा की है और इसे उसे ही हल करना होगा। 

भू बाजार सुधार भी लंबे समय से लंबित है। सरकार ने शुरुआती दिनों में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का प्रयास किया था, उसके बाद से यह लंबित है। भूमि निश्चित तौर पर राज्य का मसला है लेकिन यह भी सच है कि मौजूदा केंद्र सरकार का राज्यों की सरकारों पर काफी प्रभाव है क्योंकि अधिकांश राज्यों में उसकी ही सरकार है। पूरा ध्यान एकीकृत, लचीला और स्थिर भूमि बाजार तैयार करने पर होना चाहिए। कहने का मतलब यह नहीं कि भूमि के इस्तेमाल में राज्यों की भूमिका को भुला दिया जाए। अगर अधिग्रहण राजनीतिक रूप से असंभव हो तो भूमि की पूलिंग की योजनाएं देश भर में अपनाई जा सकती हैं जो गुजरात में सफलतापूर्वक अपनाई गई है और फिलहाल आंध्रप्रदेश में एक हद तक सफल है। 

आखिरी बात, राज्य में क्षमता संवद्र्घन और संचालन सुधार को प्राथमिकता पर लेना होगा। पिछली केंद्र सरकार ने प्रशासनिक सुधार आयोग बनाने की बात कही लेकिन उसकी अनुशंसाओं को अनदेखा कर दिया। इस सरकार ने निर्णय प्रक्रिया में निजी क्षेत्र के लोगों को शामिल करने की इच्छा दिखाई। परंतु देश के प्रशासनिक क्षेत्र में गहरे सुधार, विशेषज्ञता को शामिल करना और परियोजना प्रबंधन कौशल आदि लंबे समय से लंबित हैं। इन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिए। स्थायित्व भरी उच्च वृद्घि दर के लिए सक्षम और कुशल राज्य की आवश्यकता है। सरकार के सभी स्तरों को प्रधानमंत्री की बात सुननी चाहिए और सुधार के काम में लग जाना चाहिए।
Keyword: प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी, नीति आयोग,
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