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दो अंकों की वृद्धि दर रह सकता है सपना

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली June 18, 2018

भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर सिर्फ एक बार 1988-89 में दो अंकों में पहुंची है, लेकिन राजनीतिक तबके की इस तरह की आकांक्षा हमेशा बनी रही है। चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो 2017-18 में 6.7 प्रतिशत थी। उसके बाद के दो साल में विश्व बैंक ने 7.5 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान लगाया है। ऐसे में लक्ष्य हासिल करने की संभावना नजर नहीं आती। आईएमएफ ने इस साल भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने और 2019-20 में 7.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। 

2017-18 की चौथी तिमाही में वृद्धि दर 7 तिमाही के उच्चतम स्तर 7.7 प्रतिशत रहने से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अंकों की वृद्धि दर हासिल करने की संभावना जताई है। हालांकि उन्होंने कहा कि यह लक्ष्य हासिल करना बड़ी चुनौती है।  नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में उन्होंने कहा था, 'अब इस वृद्धि दर को दो अंकों में ले जाने की चुनौती है, इसके लिए तमाम महत्त्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।' 

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की पहली सरकार के कार्यकाल में लगातार तीन साल वृद्धि दर 9 प्रतिशत से ज्यादा रही, जिसके बारे में ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-08 से 2011-12) के मूल दस्तावेजों में चर्चा की गई थी और उम्मीद जताई गई थी कि आखिर मे वृद्धि दर दो अंकों में पहुंच जाएगी। 

बहरहाल पंचवर्षीय योजना के अंतिम साल में वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत पर अटक गई। हालांकि 2009-10 में वृद्धि दर 8.6 प्रतिशत और 2010-11 में 8.9 प्रतिशत रही, जो 9 प्रतिशत के बहुत करीब है। तत्कालीन सरकार ने संसद को बताया था कि 9 प्रतिशत वृद्धि दर के बजाय 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान सालाना आर्थिक वृद्धि दर 8 प्रतिशत रही।  

वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को कहा कि चालू वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर दो अंकों में रह सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए खर्च में कटौती नहीं की जाएगी क्योंकि योजनागत व्यय के लिए सरकार के पास पर्याप्त वैकल्पिक संसाधन है। 

क्या यह टिकाऊ है
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि दो अंकों की वृद्धि दर दीर्घावधि लक्ष्य हो सकता है, जबकि तत्कालीन लक्ष्य विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर कम से कम 10 प्रतिशत रखा जा सकता है। 1988-89 में जब अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 10.2 प्रतिशत थी तब इसके पहले के साल का आधार 3.5 प्रतिशत के निम्न स्तर पर था। प्राथमिक क्षेत्रों (कृषि एवं संबंधित क्षेत्र, खनन और उत्खनन) को छोड़कर किसी भी क्षेत्र की वृद्धि दर दो अंकों की नहीं थी। इस क्षेत्र की वृद्धि दर 15.7 प्रतिशत थी। अब स्थिति बहुत ज्यादा बदल चुकी है।

केयर रेटिंग में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'हमारा तात्कालिक लक्ष्य विनिर्माण क्षेत्र में 10 प्रतिशत वृद्धि दर हासिल करना हो सकता है। अगर ऐसा नहीं होता तो 10 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर हासिल करना चुनौती बनी रहेगी।' 2017-18 में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत रही, जबकि इसके पहले साल 7.9 प्रतिशत थी। बहरहाल 2017-18 की चौथी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 9.1 प्रतिशत रही, जो तीसरी तिमाही में 8.5 प्रतिशत थी। 

उन्होंने कहा कि 2017-18 में वृद्धि दर 4 साल के न्यूनतम स्तर 6.7 प्रतिशत पर रही, जिसके बाद धीरे धीरे अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावना है। उन्होंने कहा कि पांचवें साल वृद्धि दर सुधरकर 7.5 से 8 प्रतिशत हो सकती है।  इंडिया रेटिंग में मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने कहा कि टिकाऊ आधार पर दो अंकों की वृद्धि दर के लिए जरूरी होगा कि निवेश भी दो अंकों में बढ़े। 

बहरहाल निवेश में सुस्ती बनी हुई है क्योंकि बैंकिंग की सेहत खराब है और बॉन्ड बाजार में भी सुस्ती है।  उन्होंने कहा कि निजी खपत और सरकार के अंतिम खपत के आधार पर दो अंकों की वृद्धि दर टिकाऊ नहीं होगी। पंत ने उम्मीद जताई कि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में वृद्धि दर दूसरी छमाही की तुलना में बेहतर रहेगी। 

इक्रा में मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नैयर ने कहा कि 2018-19 में वृद्धि दर थोड़ा सुधरकर 7.1 प्रतिशत रहने की संभावना है। उन्होंने कहा, '10 प्रतिशत की टिकाऊ वृद्धि दर के लिए जरूरी है कि वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़े और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं तेजी से लागू हों। साथ ही बुनियादी ढांचा के लिए पर्याप्त पूंजी उपलब्ध हो।' 
Keyword: जीडीपी, सकल घरेलू उत्पाद, आर्थिक,
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