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घर खरीदने वालों को मिल गई आईबीसी की ताकत

तिनेश भसीन /  June 17, 2018

मकान खरीदने वालों को हाल ही में बड़ी राहत मिली, जब ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में बदलावों के बाद उन्हें भी संस्थागत ऋणदाताओं के बराबर दर्जा दे दिया गया। 'वित्तीय लेनदार' का ठप्पा लगने के साथ ही घर खरीदारों को कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बनने और अपने हितों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई का हिस्सा बनने का अधिकार हासिल हो गया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इससे हमेशा उनका भला ही होगा। इकनॉमिक लॉज प्रैक्टिस में पार्टनर बाबू शिवप्रकाशम कहते हैं, 'आईबीसी में संशोधन से घर खरीदारों को राहत पाने का एक स्पष्टï और ठोस रास्ता मिल गया है। लेकिन कुछ दिक्कतें ऐसी हैं, जिन्हें अभी तक दूर नहीं किया गया है और जिन पर स्थिति स्पष्टï नहीं की गई है। कुछ मामलों में तो आईबीसी और रियल एस्टेट (नियमन एवं विकास) अधिनियम यानी रेरा के प्रावधानों के बीच सीधी टक्कर हो सकती है।' इसीलिए किसी भी डेवलपर के खिलाफ नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी)का दरवाजा खटखटाने से पहले घर खरीदारों को इस कानून की सभी बारीकियों को ठीक से समझ लेना चाहिए।

 
देर होने का मतलब डिफॉल्ट नहीं
 
घर खरीदार किसी भी डेवलपर के खिलाफ एनसीएलटी में तभी जा सकते हैं और उसके खिलाफ कार्यवाही तभी शुरू करा सकते हैं, जब डेवलपर ने कर्ज चुकाने में जानबूझकर चूक की हो यानी डिफॉल्ट किया हो। जे सागर एसोसिएट्स में बैंकिंग एवं फाइनैंस प्रैक्टिस के पार्टनर एवं अध्यक्ष अशित शाह कहते हैं, 'खरीदार केवल इसी आधार पर एनसीएलटी में नहीं जा सकते कि रियल्टर परियोजना पूरी करने में देर कर रहा है।' इसकी वजह यह है कि मकान देने में देर प्रदर्शन से जुड़ा डिफॉल्ट है और वह आईबीसी के दायरे में आता ही नहीं है। शाह कहते हैं कि भुगतान में डिफॉल्ट की बात तभी बनती है, जब डेवलपर ने समझौते में कहा हो कि विलंब होने पर वह घर खरीदारों को क्षतिपूर्ति करेगा, लेकिन तय अवधि के भीतर उसने ऐसा नहीं किया हो।
 
भुगतान में नाकामी तब भी मानी जाती है, जब मकान खरीदने वाले डेवलपर से बुकिंग रद्द करने और रकम वापस करने के लिए कहें, लेकिन डेवलपर उन्हें उनकी रकम वापस नहीं कर पाए। मगर वकीलों का कहना है कि ऐसी सूरत में खरीदारों का सीधे एनसीएलटी में जाना ठीक नहीं रहेगा। उससे पहले उन्हें रियल एस्टेट नियामक का रुख करना चाहिए। ट्राईलीगल में पार्टनर रमाकांत राय बताते हैं, 'अगर परियोजना में विलंब होता है तो घर खरीदार ब्याज समेत अपनी रकम मांग सकता है और उसके लिए वह रेरा का इस्तेमाल करने के साथ ही उपभोक्ता संरक्षण कानून का सहारा भी ले सकता है। इतना ही नहीं, वह घर पर कब्जे या देरी के एवज में मुआवजे का दावा भी ठोक सकता है। अगर डेवलपर रकम वापस करने में या देरी के एवज में मुआवजा देने में नाकाम रहता है तो घर खरीदार को दिवालिया याचिका दाखिल करने का अधिकार मिल जाता है।'
 
सुरक्षित ऋणदाता आएंगे पहले
 
ज्यादातर मामलों में घर खरीदारों को असुरक्षित लेनदार की जमात में रखा जाएगा। खेतान ऐंड कंपनी में एसोसिएट पार्टनर राजीव विधानी ने कहा, 'इसका मतलब है कि जब बकाया वसूलने की बारी आएगी तो उन्हें बैंकों जैसे सुरक्षित ऋणदाताओं से नीचे रखा जाएगा।' कुछ खास मामलों में ही मकान मालिक यानी खरीदार सुरक्षित ऋणदाता होने का दावा कर सकता है।  उदाहरण के लिए कुछ डेवलपर खरीदारों या निवेशकों से वायदा करते हैं कि एक निश्चित अवधि गुजरने के बाद उन्हें अपना मकान या फ्लैट एक तय कीमत पर डेवलपर को ही वापस भेजने का मौका मिलेगा। ऐसे मामलों में खरीदार खुद को सुरक्षित ऋणदाता की श्रेणी में रखने की मांग कर सकता है। असुरक्षित ऋणदाता होने पर कुछ दिक्कतें भी आती हैं। यदि कोई कंपनी बिक जाती है तो सबसे पहले सुरक्षित ऋणदाताओं का बकाया चुकाया जाता है। उसके बाद असुरक्षित ऋणदाताओं की बारी आती है।
 
मिलकर करें लड़ाई
 
जब सुरक्षित ऋणदाता किसी डेवलपर के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करते हैं तो घर खरीदारों को भी एकजुट हो जाना चाहिए और मिलकर अपना बकाया हासिल करने की लड़ाई छेडऩी चाहिए। जब मामले एनसीएलटी में पहुंचते हैं तो एक अंतरिम समाधान पेशेवर को नियुक्त किया जाता है और ऋणदाताओं की एक समिति (सीओसी) भी बनाई जाती है। यह समिति ही ज्यादातर फैसले लेती है। नए नियमों के मुताबिक समाधान पेशेवर एक इनसॉल्वेंसी पेशेवर की नियुक्ति करता है। सीओसी के सामने घर खरीदारों का पक्ष यही इनसॉल्वेंसी पेशेवर रखता है। अपने काम में माहिर इस पेशेवर की फीस घर खरीदारों को ही भरनी पड़ेगी। वकीलों का कहना है कि सरकार इस तरह के तमाम शुल्कों की एक फेहरिस्त जारी कर सकती है। घर खरीदार इस फेहरिस्त को देख सकते हैं ताकि उन्हें पता चल जाए कि कितना शुल्क देना है। जब बोली लगाने वाले रियल एस्टेट परियोजना के लिए अपनी समाधान योजना पेश करते हैं तो इनसॉल्वेंसी पेशेवर घर खरीदारों के साथ बैठकर उस योजना पर बातचीत करता है और पूछता है कि सामने आई पेशकश पर वे राजी हैं या नहीं। अपनी राय या मत देने के लिए अगर अधिक संख्या में खरीदार आते हैं तो यह सुनिश्चित हो जाता है कि वोट का नतीजा ज्यादातर खरीदारों के अनुकूल है। 
 
आईबीसी के तहत सीओसी के सदस्यों का वोटिंग का अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि डेवलपर के ऊपर उनकी कितनी रकम बकाया है। यदि घर खरीदारों का बकाया सुरक्षित त्रणदाताओं के मुताबिक अधिक होता है तो इस पूरी प्रक्रिया की डोर उनके हाथों में आ सकती है। मान लीजिए किसी डेवलपर पर कुल मिलाकर 60 अरब रुपये बकाया हैं। इनमें से 20 अरब रुपये सुरक्षित ऋणदाताओं के हैं और 40 अरब रुपये घर खरीदारों के बकाया हैं। चूंकि घर खरीदारों की बकाया राशि बहुत अधिक है, इसलिए उनके पास वोट करने के अधिक अधिकार होंगे और इस पूरी प्रक्रिया में उनकी बात का वजन भी अधिक होगा। लेकिन अगर सुरक्षित ऋणदाता का बकाया ज्यादा होता है तो पूरी प्रक्रिया में उसी का पलड़ा भारी रहेगा।
 
रेरा और आईबीसी में टकराव?
 
आईबीसी और रेरा दोनों में ही ऐसे प्रावधान हैं, जिनके हिसाब से एक अधिनियम बाकी सभी अधिनियमों के ऊपर ठहराया जा सकता है। मिसाल के तौर पर मान लीजिए कि घर खरीदार रियल एस्टेट नियामक के पास गए हैं। उसी समय बैंक डेवलपर के खिलाफ एनसीएलटी की देहरी पर पहुंच जाते हैं। तब अजीब स्थिति हो जाती है क्योंकि आईबीसी कानून कहता है कि किसी भी कंपनी का मामला एनसीएलटी में स्वीकार होने के बाद उससे जुड़ी दूसरी सभी कार्यवाही थम जाएंगी। इसके बाद रेरा में चल रही कार्यवाही का क्या होगा, अभी यह स्पष्टï नहीं है।
 
उधर रेरा में भी कहा गया है कि परियोजना में 51 फीसदी बुकिंग पूरी होने के तीन महीने के भीतर बिल्डर को सोसाइटी का गठन करना ही पड़ेगा और कामकाज उस सोसाइटी को सौंपना पड़ेगा। यदि रियल एस्टेट नियामक डेवलपर की परियोजना को रद्द करता है तो वह सोसाइटी परियोजना को अपने हाथ में ले सकती है। यदि कोई नया रियल्टी डेवलपर उस परियोजना को अपने हाथ में लेता है तो उसे मना करने या इजाजत देने का अधिकार भी उस सोसाइटी का ही होता है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि डेवलपर ने जिस परियोजना का कामकाज सोसाइटी के हाथ में दिया है, यदि वह पयिोजना दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही हो तो रेरा के नियम उस पर लागू होंगे या नहीं।
 
रेरा के तहत ऐसे प्रावधान भी हैं जिनमें कहा गया है कि जिस भवन योजना को मंजूरी दी गई है, उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव करने के लिए कम से कम दो-तिहाई खरीदारों की सहमति अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में भी यह स्पष्टï नहीं है कि बोली लगाने वाली कंपनी को परियोजना की कमान अपने हाथ में लेने और उसमें बदलाव करने से पहले घर खरीदारों की मंजूरी की जरूरत होगी या नहीं। वकीलों को लगता है कि समय गुजरने के साथ और कुछ मामले सामने के साथ यह कानून बेहतर होगा। व्यावहारिक रूप से बात करें तो इस बात की संभावना है कि बोली लगाने वाला (नया डेवलपर या संपत्ति पुनर्गठन कंपनी) ऋणदाताओं की अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग-अलग योजना पेश करेगा। हो सकता है कि परियोजना पूरी करने के लिए वह सुरक्षित ऋणदाताओं से चोट खाने और घर खरीदारों से कुछ और रकम देने के लिए कहे। 
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