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संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से फिर भड़केगा कश्मीर

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 17, 2018

कश्मीर पर संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट इतनी खामियों से भरी है कि वह पूरी तरह खारिज करने लायक है। ऐसे में उसके सटीक होने, उसकी निष्पक्षता, अपनाए गए तौर तरीकों और उद्देश्यों के बारे में बात करना समय गंवाने जैसा ही है। इसकी सबसे बड़ी चूक राजनैतिक है। दुनिया के शीर्ष मानवाधिकार संस्थान में स्वयंसेवी संगठनों की शैली में काम करने वाले सदिच्छा से भरे सामाजिक कार्यकर्ताओं का होना एक बात है लेकिन बिना किसी राजनीतिक निगरानी के और बिना परिणाम के बारे में सोचे समझे उन्हें काम करते रहने देना अलग मसला है। एक स्तर पर तो यह आपको यही बताता है कि संयुक्त राष्ट्र का संचालन कितने अक्षम तरीके से किया जा रहा है।  वहीं दूसरी ओर यह भी बताता है कि आप पर जिनके बचाव का दायित्व है, आप उनको किस कदर नुकसान पहुंचा सकते हैं। क्या यह रिपोर्ट भारत या पाकिस्तान को शर्मिंदा करती है? ऐसा लगता नहीं। कश्मीर दोनों देशों के लिए बैर की वजह बना हुआ है। भारत वहां अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड से शर्मिंदा नहीं होगा। उसे यकीन है कि वह सीमापार आतंकी हमले का सामना कर रहा है। पाकिस्तान भी इस बात से शर्मिंदा तो नहीं होगा क्योंकि रिपोर्ट में भी यही कहा गया है कि वह इस भारी-भरकम आतंकवादी अभियान के लिए धन और संसाधन मुहैया करा रहा है। उसे यकीन है कि वह न्याय हासिल करने के एक नैतिक अभियान में लगा हुआ है। इतना ही नहीं वह 'अंतरराष्ट्रीय सरदर्द' और 'जिहाद के विश्वविद्यालय' जैसे जुमलों को अपने सीने पर तमगे की तरह धारण करता है। 

 
अगर जरूरत पड़ी तो दोनों देश तब तक लड़ेंगे जब तक कश्मीर में अंतिम कश्मीरी शेष रहे। क्या वे संयुक्त राष्ट्र की इस मूर्खतापूर्ण रिपोर्ट को तवज्जो देंगे जिसके 'शोधकर्ताओं' ने नियंत्रण रेखा के दोनों ओर स्थित कश्मीर में एक बार भी जाने की जहमत नहीं उठाई?  लेकिन समस्या इससे कहीं अधिक बड़ी और गंभीर है। हम इस रिपोर्ट की गुणवत्ता की वजह से इसे मूर्खतापूर्ण नहीं कह रहे हैं बल्कि उसके इस अनुमान के कारण जिसमें कहा गया है कि वह कश्मीर के लोगों की मदद करेगी। सच तो यह है कि यह भारत के रुख को और कड़ा करेगी। साथ ही पाकिस्तान को और अधिक कश्मीरियों तथा अपने युवाओं को जिहाद में झोंकने को मजबूर करेगी। इस उम्मीद में कि किसी दिन शर्मिंदा होकर या भय अथवा आशंका के चलते पीछे हट जाएगा। हम इस विषय पर एक दशक तक कागजात की अदला-बदली का खेल खेल सकते हैं जब मौजूदा मानवाधिकार उच्चायुक्त सेवानिवृत्त होंगे।
 
बीते तीन दशक में संयुक्तराष्ट्र में जिस तरह के लोग महासचिव बने हैं वह हमें बताता है कि जरूरी नहीं कि संयुक्त राष्ट्र बौद्धिक क्षमता के आधार पर ही नौकरशाह नियुक्त करे। अगर मौजूदा प्रशासन अपने ही हस्तक्षेपों के इतिहास पर एक नजर न डाले तो भी अचरज की कोई बात नहीं। बहुत खेद की बात है कि कश्मीर काफी हद तक सन 1990 के दशक जैसी दुखद स्थिति में पहुंच गया है। उस दौर में भी संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का अपेक्षाकृत कमजोर भारत पर काफी दबाव था। भारत ने संसद में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से सारी जमीन वापस छीनी जाएगी। नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेेयी के नेतृत्व में एक दो दलीय प्रतिनिधिमंडल जिनेवा गया था और उसने मतदान में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उनके साथ विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद भी थे। यह बात अलग है कि उनको चीन और ईरान जैसे मानवाधिकार हनन करने वालों के साथ साझा करना पड़ा था। 
 
इस रिपोर्ट का भी यही हश्र होना है। याद रहे कि सरकार के आधिकारिक निंदा करने के पहले ही कांग्रेस प्रवकताओं ने टेलीविजन पर इस विषय को लेकर सरकार का समर्थन करना शुरू कर दिया था। शुजात बुखारी की हत्या के मामले ने हमारा ध्यान इस रिपोर्ट के सबसे विषाक्त हिस्सों से हटा दिया। भारत के लिए इससे अधिक भड़काने वाली बात कोई और नहीं हो सकती है कि संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था कश्मीर में आत्मनिर्णय की मांग का समर्थन करे। परंतु यह रिपोर्ट पाकिस्तान का दिल भी तोड़ सकती है क्योंकि आत्मनिर्णय आजादी की राह आसान करेगा। पाकिस्तान ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। सन 1948 के संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र में भी उसे अंगीकृत नहीं किया गया था।
 
चाहे जो भी हो लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने सन 1972 के शिमला समझौते के बाद से कभी आत्मनिर्णय की बात नहीं की। उस समझौते ने कश्मीर को पूरी तरह द्विपक्षीय मुद्दा बना दिया। यदाकदा की बात छोड़ दें तो पाकिस्तान ने कभी किसी द्विपक्षीय चर्चा या अन्य संयुक्त वक्तव्यों में इसको तवज्जो नहीं दी। फिर चाहे वह लाहौर, इस्लामाबाद या शर्म अल शेख की वार्ता ही क्यों न हो।  हम सन 1989-94 की अवधि को कश्मीर में अशांति के सबसे बुरे पांच वर्ष मानते हैं इसलिए हमें यह बहस भी करनी होगी कि क्या हम दोबारा वहीं लौट आए हैं? राजनीति की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है, मानवाधिकार का दबाव बढ़ रहा है, पाकिस्तानी मजबूत हुए हैं, नियंत्रण रेखा जल रही है और हमारी राजनीति बंटी हुई है। भारत को गुस्से में एकजुट करने वाली दो बातें ध्यान रखें: पश्चिमी मानवाधिकार कर्मियों का दबाव और अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री रॉबिन राफेल का बयान जिसमें उन्होंने कश्मीर पर भारत के अधिकार संबंधी प्रमाणों की वैधता पर प्रश्न उठाए। अब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की इस गैरजिम्मेदारी ने इन दोनों बातों को सामने ला दिया है।
 
संयुक्तराष्ट्र द्वारा गलतियों के दोहराव और पश्चिम की चूकों के बीच हमें यह भी देखना होगा कि हम यहां तक कैसे पहुंचे। जाहिर है हम भी अतीत की तरह चूक करते हुए यहां तक पहुंचे। दिक्कत की शुरुआत सन 1989 में हुई जब भारत राजनीतिक बदलाव के दौर में था और वीपी सिंह का आगमन हुआ। यह अल्पमत गठबंधन की सरकार थी जिसे भाजपा और वाम ने बाहर से समर्थन दे रखा था। भाजपा कश्मीर में कड़ा रुख चाहती थी इसलिए उसके कहने पर जगमोहन को राज्यपाल बनाया गया ताकि वे आतंकियों से निपट सकें। परंतु सरकार में एक बड़ा तबका मुस्लिम समर्थक था और वह वाम समर्थन पर भी निर्भर थी। मुफ्ती मोहम्मद सईद गृहमंत्री थे। सरकार ने जॉर्ज फर्नांडीज को कश्मीर मामलों का मंत्री भी बनाया।
 
अब सरकार का एक हिस्सा चोट दे रहा था और दूसरा मरहम लगा रहा था। इसका परिणाम त्रासद रहा। कश्मीरी पंडितों को भीषण जातीय संहार का सामना करना पड़ा और आतंकियों की समस्या पाकिस्तान संचालित अशांति में बदल गई। बाद में नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद सशस्त्र बलों को असीमित संसाधन और अधिकार देकर नियंत्रण हासिल किया गया। यह राज्य के मानवाधिकार इतिहास का सबसे बुरा दौर था। पूछताछ के कुख्यात केंद्र स्थापित किए गए, गोलीबारी में बड़े पैमाने पर आम जनता मारी गई। बिजबेहाड़ा गोलीकांड और कुनन पोशपोरा सामूहिक बलात्कार के आरोप उसी अवधि में सामने आए। चरार ए शरीफ का संकट भी उसी दौर का है। नई पीढ़ी उस दौर को विशाल भारद्वाज की फिल्म हैदर से समझ सकती है। राव के कार्यकाल के अंत तक आतंकवाद काफी हद तक कुचला जा चुका था। हालांकि इसकी कीमत जन भावनाओं के रूप में चुकानी पड़ी। वीपी सिंह की सरकार की कारस्तानियों की यह कीमत देश को चुकानी पड़ी।
 
हाल के दिनों में वैसा ही भ्रम देखने को मिला है। अंतर यह है कि वी पी सिंह के अल्पमत गठबंधन के बजाय केंद्र में बहुमत वाली मजबूत राष्ट्रवादी सरकार है। परंतु उसने किया क्या? पीडीपी के साथ गठबंधन कर विरोधी विचारधाराओं को साथ लाया गया लेकिन सरकार कभी मनोनुकूल काम नहीं कर पाई। अब एक बार फिर जख्म और मरहम एक साथ लगाने की कोशिश हो रही है। ऐसा लग रहा है कि एक बार फिर एक ही प्रतिष्ठान में जगमोहन और जॉर्ज फर्नांडिस दोनों हैं। मानवाधिकार के दबाव और रॉबिन राफेल के सवाल जैसे जो तत्त्व नदारद थे उन्हें संयुक्तराष्ट्र की बेतुकी रिपोर्ट ने सामने ला दिया है। कश्मीर को लेकर माहौल फिर सन 1993 वाला बना दिया गया है। 
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