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धरना राजनीति के पुरोधा बनते अरविंद केजरीवाल

अर्चिस मोहन /  June 15, 2018

इस वक्त केवल दिल्ली का मौसम ही अपने धुंधलेपन और बढ़ते पारे से निराश नहीं कर रहा बल्कि सियासी गलियारे में भी ऐसा ही अंधेरा छाया है। अगर शहर के लोग धूल की परत वाले आवरण में सांस लेने को मजबूर हैं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2019 के लोकसभा चुनावों में अपनी आम आदमी पार्टी (आप) को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच घुटने से बचाने के लिए अलग राजनीति शुरू कर दी है। सोमवार से केजरीवाल और उनके तीन मंत्री दिल्ली के राजभवन में उपराज्यपाल अनिल बैजल के कार्यालय के प्रतीक्षालय में धरने पर बैठ गए। इस धरना प्रदर्शन की तात्कालिक वजह यह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी पिछले तीन महीने से आप के मंत्रियों द्वारा बुलाई गई बैठक में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। बेशक लोकसभा चुनाव को देखते हुए दिल्ली की सात लोकसभा सीटें आप के लिए दांव पर लगी हैं। इससे ही अंदाजा लगेगा कि फरवरी 2020 में दिल्ली विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद देश की राजनीति में आप किस तरह टिक पाएगी। 

 
फरवरी 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत के बाद पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में नाकामी से द्विध्रुवीय राजनीति से घिरे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस का तीसरा प्रभावी विकल्प बनने की आप की हसरतों की हवा निकल गई। आप अब दिल्ली तक सीमित होकर रह गई है। लेकिन केजरीवाल के पक्ष में एक अहम बात यह है कि लोगों के साथ गहरा संपर्क होने या फिर सड़क पर विरोध प्रदर्शन शुरू करने की उनकी विश्वसनीयता की बराबरी भाजपा या कांग्रेस का कोई नेता नहीं कर पाएगा। इसके अलावा दिल्ली में आप प्रशासन की तारीफ भी की जा रही है खासतौर पर सरकारी स्कूलों में किए गए सुधार और सरकारी अस्पतालों में किफायती स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए। लेकिन आप की कई पहल को उपराज्यपाल के कार्यालय ने बाधित किया है। दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ आप नेतृत्व की कथित बदसलूकी के बाद नौकरशाहों के साथ चल रहे टकराव से हालात और बिगड़े हैं। केजरीवाल का आरोप है कि वरिष्ठ नौकरशाह केंद्र की शह पर असहयोग कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव करीब है। ऐसे में आप सरकार प्रशासनिक स्तर पर नतीजे देने और लोगों को यह बताने की व्यग्रता दिखा रही है कि नरेंद्र मोदी सरकार बैजल के जरिये जनहित नीतियों पर अमल करने की राह में बाधाएं डाल रही है।
 
मोदी के साथ चली रस्साकशी में केजरीवाल को विपक्षी दलों से समर्थन मिला है। आप दिल्ली में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने में दिलचस्पी ले रही है। इसका मानना है कि आप और कांग्रेस को दिल्ली में क्रमश: चार और तीन सीटें लडऩी चाहिए ताकि भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट किया जा सके। हालांकि कांग्रेस की दिल्ली इकाई ऐसे गठबंधन के खिलाफ है। पुदुच्चेरी में कांग्रेस सरकार की मुश्किल बिल्कुल दिल्ली की तरह है जहां इस केंद्रशासित प्रदेश की उपराज्यपाल किरण बेदी के साथ समान मतभेद हैं। लेकिन कांग्रेस के कई प्रमुख नेता संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के पतन के लिए केजरीवाल के नेतृत्व वाले 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन को जिम्मेदार ठहराते हैं और ये घाव अभी भरा नहीं हैं।
 
पिछले महीने जनता दल (सेक्युलर) के नेता एच डी कुमारस्वामी ने बेंगलूरु में शपथ ग्रहण समारोह में केजरीवाल को आमंत्रित किया था। केजरीवाल विपक्षी नेताओं के साथ वहां मंच पर बैठे जरूर थे लेकिन जब विपक्ष की एकता दिखाने के लिए नेता जब कतार में फोटो खिंचाने के लिए खड़े हुए तब उसमें केजरीवाल शामिल नहीं थे। कांग्रेस की तरफ से जद (एस) को स्पष्ट कर दिया गया था कि संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उस फोटो में केजरीवाल को शामिल करना नहीं चाहेंगे। बुधवार को राहुल ने विपक्षी नेताओं को इफ्तार पार्टी में आमंत्रित किया। कांग्रेसी नेताओं ने पत्रकारों को बताया कि केजरीवाल और आप को छोड़कर विपक्ष के सभी दलों और उनके नेताओं को आमंत्रित किया गया था। भाजपा और कांग्रेस की राज्य इकाई दिल्ली को 'तीसरी पार्टी' से मुक्त करने में दिलचस्पी ले रही हैं। लेकिन केजरीवाल भी कहां पीछे हटने वाले हैं, उन्होंने फिर से विरोध प्रदर्शन वाली राजनीति को ही आजमाने का फैसला किया है। वह सोमवार से ही धरना पर बैठे हुए हुए है। उन्होंने उपराज्यपाल से मांग की है कि वे घर तक राशन पहुंचाने की सरकार की पहल को मंजूरी दें। उन्होंने उपराज्यपाल के आधिकारिक निवास के प्रतीक्षा कक्ष से ट्वीट किया, 'सभी सही सोच वाले लोग यही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर केंद्र आईएएस अधिकारियों को हड़ताल के लिए क्यों भड़का रहा है? केंद्र राशन की डिलिवरी घर तक करने की इजात क्यों नहीं दे रहा? ये सभी दिल्ली की जनता की सामान्य और गैर-विवादास्पद मांगें है।'
 
एक बार फिर से केजरीवाल ने एक ऐसे मुद्दे को साधने की कोशिश की है जिससे दिल्ली के गरीब लोग प्रभावित होंगे। दरवाजे पर राशन पहुंचाने से न केवल इससे जुड़ा भ्रष्टाचार कम होगा बल्कि इससे गरीब राशन की दुकान पर कतार में खड़े होने की जहमत से भी बच जाएंगे। गुरुवार को केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आईएएस अधिकारियों के गतिरोध को खत्म करने के लिए हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। मोदी को लिखे गए पत्र में केजरीवाल ने कहा कि कई अहम नागरिक कार्य मसलन मॉनसून से पहले नालियों की सफाई, मोहल्ला क्लिनिक्स स्थापित करने और दिल्ली में प्रदूषण रोकने के उपाय करने जैसे कार्य आईएएस अधिकारियों की कथित हड़ताल की वजह से अटके पड़े हैं। केजरीवाल ने कहा, 'दिल्ली में प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या है। इससे पहले इस मुद्दे पर प्रत्येक 15 दिन पर समीक्षा और योजना बैठक होती थी लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के हड़ताल पर जाने से पिछले तीन महीने में कोई बैठक नहीं हुई।' केजरीवाल का कहना है कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होती, वे बैजल के कार्यालय से नहीं निकलेंगे। अगर इस हफ्ते इस मुद्दे का कोई समाधान नहीं निकलता तो आप ने रविवार को प्रधानमंत्री कार्यालय में भी धरना-प्रदर्शन करने की धमकी दे डाली है। 
 
दिल्ली में नाटकीयता वाला माहौल है जो 2013 में 49 दिनों की केजरीवाल सरकार के दौरान हुए घटनाओं की पुनरावृत्ति जैसी भी हो सकती है। 2014 के लोकसभा चुनावों में एक साल से कम का वक्त रह गया था तब केजरीवाल ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार को अपने निशाने पर लिया था। अब 2019 के चुनाव होने में भी 10 महीने से कम का वक्त रह गया है ऐसे में इस बार मोदी सरकार निशाने पर है। लेकिन इस बार मोदी सरकार के साथ संघ की ताकत है ऐसे में केजरीवाल को अन्य विपक्षी दलों के समर्थन की जरूरत होगी खासतौर पर कांग्रेस की ताकि उन्हें फिर से एक मौका मिल जाए।
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