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गौरव गोगोई के लिए नहीं होगा आसान 'मिशन बंगाल'

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 15, 2018

उम्र के चौथे दशक में चल रहे गौरव गोगोई ने 70 साल से अधिक उम्र वाले सी पी जोशी की जगह ली है। कांग्रेस ने गोगोई को पश्चिम बंगाल और अंडमान द्वीपसमूह का प्रभारी महासचिव बनाया है। इस नियुक्ति के साथ ही गोगोई पर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी और बंगाल की पार्टी इकाई के बीच संपर्क-सेतु बनने की जिम्मेदारी आ गई है। बंगाल ने कांग्रेस को प्रणव मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे, प्रियरंजन दासमुंशी और ममता बनर्जी (पहले कांग्रेस में ही थीं) जैसे नेता दिए हैं। गोगोई असम के कालियाबोर क्षेत्र से पहली बार लोकसभा के सदस्य चुने गए हैं। पिछले चुनाव में उन्हें करीब 90,000 मतों से जीत मिली थी। कुछ मायनों में हेमंत विश्व शर्मा के भाजपा के पाले में चले जाने के लिए गोगोई ही जिम्मेदार बताए जाते हैं। असम कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिने जाने वाले शर्मा गौरव गोगोई के पिता एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के खास माने जाते थे। वर्ष 2013 में गौरव के अमेरिका से लोक नीति में परास्नातक कर लौटने के बाद उनके पिता ने शर्मा को ही यह जिम्मा सौंपा था कि वह उन्हें हालात से परिचित कराएं। ऐसे में खुद को तरुण गोगोई का उत्तराधिकारी मानने वाले शर्मा को यह समझने में देर नहीं लगी कि पिता के बाद बेटा ही कमान संभालेगा।

 
इसी पृष्ठभूमि में 2014 के लोकसभा चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस का प्रदर्शन असम में काफी खराब रहा। पार्टी राज्य की कुल 14 में से तीन सीटें ही जीत पाई थी जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खाते में सात सीटें आई थीं। राजनीति के चतुर खिलाड़ी शर्मा के लिए दीवार पर लिखी सियासी इबारत को पढऩा खास मुश्किल नहीं था। उन्होंने अगले ही साल कांग्रेस छोड़ दी और वर्ष 2016 में वह भाजपा में शामिल हो गए। चुनावी अभियान के कुशल रणनीतिकार शर्मा ने भाजपा को असम में पहली बार सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपने सियासी पाला-बदल को सही ठहराने के लिए शर्मा ने यह दलील रखी दी थी, 'राहुल गांधी ने मेरा अपमान किया, तरुण गोगोई ने भी अपमानित किया और लोग इसके गवाह रहे। असम के लोगों ने विकास के लिए मत दिया है। राहुल गांधी के साथ समस्या यह है कि वह गंभीर नहीं हैं। मुझे इस बात की खुशी है कि उन्हें अब सबक मिल गया है।' पूरे विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के निशाने पर राहुल गांधी ही थे। वैसे असम में कांग्रेस की करारी शिकस्त के लिए गौरव गोगोई को बमुश्किल जिम्मेदार माना जा सकता है। वह तो पहली बार चुनाव लड़ रहे थे और वह उसमें खरे भी उतरे। एक सांसद के तौर पर भी लोकसभा में गौरव का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है। लेकिन राहुल ने गौरव गोगोई को काफी जटिल काम सौंप दिया है। गौरव को ममता बनर्जी के साथ सीधा मुकाबला करना होगा।
 
पश्चिम बंगाल में 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 40.2 फीसदी मत पाने के बावजूद केवल 44 सीटें ही जीत पाई थी। ममता की तृणमूल कांग्रेस 45 फीसदी मतों के साथ 211 सीटों पर कब्जा करने में सफल रही। ये आंकड़े कांग्रेस को यह संतोष दे सकते हैं कि बंगाल में अब भी उसके पास जनाधार मौजूद है। अगर तृणमूल भी इस दलील को मान लेता है तो फिर बंगाल में उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर कांग्रेस पर मुहर लग जाएगी। ऐसी स्थिति में गौरव गोगोई को कांग्रेस कैडर और तृणमूल कार्यकर्ताओं दोनों को ही साधते समय बेहद सजग और दृढ़ रवैया अपनाना होगा। अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ साझा उम्मीदवार उतारने की संभावना भी पैदा होती है तो फिर गौरव गोगोई की चुनौतियों का अंदाजा लगा पाना आसान नहीं होगा।
 
तृणमूल कांग्रेस का गुणा-गणित तो काफी सरल है। अगर तृणमूल का कांग्रेस से गठजोड़ होता है तो उसे मालदा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर क्षेत्रों में छह से आठ सीटें ही छोडऩी होंगी। कांग्रेस को तृणमूल ऐसी हालत में धकेलना चाहेगी किवह फेडरल फ्रंट को बाहर से समर्थन देने के लिए मजबूर हो जाए। तृणमूल के नजरिये से देखें तो गौरव गोगोई कांग्रेस की बंगाल इकाई को समर्पण करने के लिए राजी करने और विपक्षी एकता में अवरोध नहीं बनने में मददगार हो सकते हैं। इसकी वजह यह है कि बंगाल में कांग्रेस के पास अपना पक्ष मजबूती से रखने के लिए कुछ खास नहीं है। हाल ही में संपन्न पंचायत चुनावों में तृणमूल ने 34 फीसदी सीटें निर्विरोध ही जीत ली। हालत यह थी कि कांग्रेस को तृणमूल, भाजपा और वाम मोर्चे के बाद चौथा स्थान मिला।
 
गोगोई की नियुक्ति पर बंगाल कांग्रेस से दो तरह की प्रतिक्रियाएं सुनने को मिली हैं। पहली, गोगोई को राहुल गांधी का समर्थन हासिल है, लिहाजा अब कोई नेता प्रदेश कांग्रेस पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। दूसरी तरह की प्रतिक्रिया दबी हुई हंसी से भरी है। पहली बार सांसद बने व्यक्ति के पास मुश्किल राजनीतिक हालात से निपटने का कोई अनुभव ही नहीं है। इन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनकी लुटिया डूबने वाली है।  हालांकि कांग्रेस को भी इस बात का बखूबी अहसास है कि 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। गोगोई को बहुत तेजी से सीखना होगा क्योंकि उनके पास समस्या को समझने और उसके हिसाब से रणनीति बनाने के लिए अधिक वक्त नहीं है। अगर वह तृणमूल के साथ गठजोड़ की पुरजोर वकालत करते हैं तो बंगाल में कांग्रेस में नई जान फूंकने की उम्मीदें खत्म कर देंगे। अगर वह साहसी होकर कांग्रेस की खोई हुई छवि वापस दिलाने की मुहिम छेड़ते हैं तो उससे भाजपा को लाभ होने का खतरा होगा। जो भी हो, गोगोई को कोशिश करने का मौका देना तो बनता ही है।
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