बिजनेस स्टैंडर्ड - सोची समझी अनदेखी और ब्याज दरें
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सोची समझी अनदेखी और ब्याज दरें

देवाशिष बसु /  June 15, 2018

देश की ब्याज दरों में दीर्घकालिक गिरावट का नजरिया तीन तरह की अनदेखी का मिश्रण है जिन्हें जानबूझकर अंजाम दिया जा रहा है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु


देश के 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल जो ब्याज दरों के लिए मानक है, वह मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा रीपो दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी के बाद 8 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है। यह उन लोगों के लिए एक झटका है जो मौजूदा सरकार द्वारा किए गए सुधारों के बाद कम ब्याज दरों के राम राज्य का स्वप्न देख रहे थे। उम्मीद की जा रही थी कि कम ब्याज दर से परिसंपत्ति कीमतों में सुधार होगा और आर्थिक वृद्घि का सिलसिला कम से कम दशक भर चलता रहेगा। माना जा रहा था कि इससे देश एक समृद्घ राष्ट्र में बदल जाएगा। कई वित्तीय विश्लेषकों को वास्तव में यह यकीन था कि देश में ब्याज दरें निरंतर गिरावट पर हैं। 
 
टे्रडिंगइकनॉमिक्स नामक प्रतिष्ठिïत वेबसाइट ने अनुमान जताया था कि ब्याज दरें 12 महीने में 6.25 फीसदी के स्तर पर रहेंगी। उसने यह भी कहा था कि हमारे आर्थिक मॉडल के मुताबिक लंबी अवधि में देश की ब्याज दर 2020 तक 4.75 फीसदी के स्तर पर रहेगी। क्या बॉन्ड प्रतिफल में बीते एक साल से हो रहा इजाफा अस्थायी है? क्या हम अभी भी दीर्घावधि में कम ब्याज दर की व्यवस्था की राह पर हैं?  देश की ब्याज दरों के दीर्घावधि में गिरावट पर रहने का विचार तीन तरह की अनदेखी का मिश्रण है जो जानबूझकर की जा रही है। पहली अनदेखी के तहत माना जा रहा है कि ब्याज दर इसलिए नीचे जाएगी क्योंकि वर्ष 2014-16 के दौरान वह लगातार नीचे रही है। इस तरह की अनदेखी में उन वजहों पर ध्यान नहीं दिया जाता जिनके चलते दरें नीचे जाती हैं। न ही यह देखा जाता है कि कितनी जल्दी हालात बदल सकते हैं। 
 
दूसरा, मौजूदा सरकार की ढांचागत बदलाव करने की इच्छा और क्षमता पर गहरा विश्वास और इस तथ्य की अनदेखी कि यह सरकार भी उतना ही समाजवादी दृष्टिïकोण रखती है जितना कि पिछली सरकारें रखती थीं।  तीसरी बात, देश की वृहद आर्थिक क्षमताओं तथा पोर्टफोलियो और पूंजी निवेश जुटाने की उसकी क्षमता को लेकर भ्रम पैदा हो जाता है। जबकि ये पूंजी की आवक की बड़ी वजह हैं। यही बात ब्याज दर पर भी लागू होती है।  10 वर्ष की अवधि के सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल सन 2013 के आखिर और 2014 के आरंभ में नकदी संकट के दौर में 9 फीसदी का स्तर पार कर गया था। मोदी सरकार के आगमन के बाद ऊंची उम्मीदों के बीच भी यह दर 8.6 फीसदी थी। उसके पश्चात जून में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट का दौर शुरू हुआ। जून 2014 से फरवरी 2016 के बीच कीमतों में 70 फीसदी की गिरावट आई। इसके तथा कुछ अन्य वजहों के चलते मुद्रास्फीति के अनुमान नीचे आए और रिजर्व बैंक रीपो दर को 2015 के 8 फीसदी से घटाकर 2017 में 6 फीसदी तक ला सका। 
 
घटती ब्याज दर वित्तीय बाजार के कारोबारियों के लिए संकेत थी। उनका काम ऐसा है कि उन्हें अत्यंत सकारात्मक रहना होता है। उन्होंने यह प्रचार जारी रखा कि ब्याज दरों में गिरावट का सिलसिला जारी रहेगा। संपदा प्रबंधकों और वितरकों के प्रजेंटेशन में बताया गया कि लंबी अवधि में ब्याज दर घटकर 4 फीसदी के स्तर तक जाएगी। इस प्रोपगंडा और बैंक जमा दर में कटौती ने देश में बड़ी तादाद में मौजूद पारंपरिक बचतकर्ताओं को अपने सावधि जमा निवेश के बारे में चिंता होने लगी। इसके बाद मौजूदा सरकार ने नोटबंदी कर दी। इससे आर्थिक गतिविधियां एकदम धीमी पड़ गईं और पैसा बैंकों में चला गया। 10 वर्ष के बॉन्ड की प्रतिफल गिरकर 6.24 फीसदी पर आ गई। उसके बाद घबराए पारंपरिक निवेशकों में से कई ने अपना पैसा इक्विटी फंड और स्टॉक जैसे जोखिम भरे निवेश में लगाया। सेंसेक्स में दिसंबर 2016 के स्तर से उछाल आई और जनवरी 2018 तक यह 40 फीसदी बढ़ गया। इस बीच कॉर्पोरेट परिणामों की हालत कमोबेश खराब ही रही। 
 
6.5 प्रतिशत के स्तर पर ठहरने के बाद 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल में स्थिर गति से इजाफा हुआ। केंद्र सरकार ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और पुनर्वितरण योजनाओं की घोषणा की तथा राज्य सरकारों ने कर्ज माफी की घोषणा की। इस परिदृश्य में नीति निर्माताओं, कारोबारियों और राजनेताओं में इस बात को लेकर चिढ़ थी कि आरबीआई ब्याज दर में कटौती नहीं कर रहा।  दिसंबर 2017 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य आशिमा गोयल ने अप्रत्याशित बयान देते हुए कहा 'आरबीआई को लगता है कि मुद्रास्फीति बढ़ेगी लेकिन आप जानते हैं कि मुद्रास्फीति को लेकर उसके अनुमान अक्सर गलत रहते हैं..अर्थव्यवस्था को लेकर उसके अनुमान सही नहीं प्रतीत होते।' उन्होंने यह भी कहा कि दरों को ऊंचा रखकर केंद्रीय बैंक ने उच्च उत्पादन को दांव पर लगाया है। महज छह महीने बाद एमपीसी को दरों में कटौती करने के बजाय उन्हें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा। अब अनुमान को लेकर गलत कौन है यह भी जाहिर है। 
 
हमारा देश पूंजी की कमी वाला देश है। ब्याज दर में स्वस्थ तरीके से कमी तभी आ सकती है जबकि उत्पादकता में बढ़ोतरी हो, बचत बढिय़ा हो, पूंजी की आवक अच्छी हो वगैरह। यानी पूंजी को आकर्षित करने की क्षमता हो।  यह अपने आप नहीं हो सकता। इसके लिए सरकार को अहम कदम उठाने होंगे। पहली बात, उसे उद्यमों की उद्यमिता को नुकसान पहुंचाने वाले नियम कायदों को बंद करना होगा क्योंकि उनका कोई लाभ नजर नहीं आता उलटे नुकसान ही हैं। दूसरा, दुर्लभ पूंजी वाले सामूहिक कोष से पैसे उधार लेना बंद करना होगा। उसे सैकड़ों योजनाओं, परियोजनाओं, वेतन और ब्याज की लागत पर जाया नहीं किया जाना चाहिए। 
 
ये सब केवल मन के लड्डू हैं। सच तो यह है कि बीते 20 वर्ष में ब्याज दर में तेजी से कमी आई है तो केवल अल्पावधि के कारकों की वजह से। ये कारक प्राय: आकस्मिक ही रहे। मसलन नोटबंदी या सन 2000 की शुरुआत और 2008 की आर्थिक मंदी। देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में बदलाव नहीं आ रहा है और यह हकीकत ब्याज दरों को अधिक नीचे नहीं जाने देगी। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, bond,,
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