बिजनेस स्टैंडर्ड - ट्रंप का प्रभाव
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ट्रंप का प्रभाव

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  June 15, 2018

आमतौर पर देखा जाए तो डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने को दुनिया भर में बुरी खबर के तौर पर लिया गया। घरेलू स्तर पर देखें तो उनकी कर नीतियों के चलते राजकोषीय घाटे में इजाफा होने और देश के कर्ज में बढ़ोतरी होने की आशंका है। अर्थशास्त्री मार्टिन फेल्डस्टीन जिन्हें आमतौर पर रिपब्लिकन शासन का हिमायती माना जाता है, ने अनुमान जताया है कि अमेरिका के राजकोषीय घाटे में अगले एक दशक में विस्फोटक बढ़ोतरी होगी जबकि इस बीच सार्वजनिक ऋण में 75 फीसदी का इजाफा हो जाएगा। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति की टैरिफ संबंधी नीतियों ने कारोबारी जंग की आशंका पैदा कर दी है। 

 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो व्यापार बढ़ाने के लिए नियम कायदे बनाने, जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संबंधित तमाम पूरी हो चुकी या प्रक्रियाधीन संधियों को उन्होंने नष्टï करने का काम किया है। अमेरिकी संधि के अधीन दशकों तक अमेरिका की ओर से सुरक्षा पाने वाले मित्र राष्ट्र अब चकित हैं कि क्या उन पर से सुरक्षा का यह साया अब उठ रहा है? भारत जैसा तथाकथित स्वाभाविक सहयोगी, जो अमेरिका के करीब आ रहा था वे अब रूस और चीन के साथ नए सिरे से रिश्ते कायम कर रहे हैं। 
 
इन बातों के लिए ट्रंप को दोषी ठहराते हुए भी क्या इसके विपरीत किसी व्याख्या की गुंजाइश है? खासतौर पर यह देखने की जरूरत है कि क्या ट्रंप प्रशासन जिस दिशा में जा रहा है उसके लिए अन्य देश भी किसी हद तक जिम्मेदार हैं? अमेरिका द्वारा अन्य देशों पर लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध पर विचार कीजिए। ये प्रतिबंध काउंटरिंग अमेरिकन एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस ऐक्ट (सीएएटीएसए) के तहत लगाए गए। अगर यूरोपीय संघ ने यूरो को डॉलर के विकल्प के रूप में विकसित किया होता तो क्या ऐसा घरेलू कानून इस हद तक प्रतिरोधी साबित हो सकता था? अगर उसने ऐसा किया होता तो विभिन्न देश सीएएटीएसए के तहत प्रतिबंधों से बच सकते थे क्योंकि वे डॉलर के बजाय यूरो के माध्यम से व्यापार कर सकते थे। परंतु यूरोपीय संघ ने अब तक यूरो के लिए अंतरराष्ट्रीय नकदीकरण से इनकार किया है। यूरोपीय संघ के बाहर उसका आधे से अधिक कारोबार अभी भी डॉलर में होता है। जहां तक विदेशी मुद्रा भंडार की बात है तो डॉलर यूरो की तुलना में तीन गुना महत्त्वपूर्ण है। 
 
या फिर यूरोप और पूर्वी एशिया की बात करते हैं जिन्होंने अमेरिका को अपनी सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी दे रखी है। इस क्रम में उन्होंने रक्षा बजट का पैसा बचाया है जबकि अमेरिका का रक्षा बजट अकेले दुनिया के अन्य सात बड़े देशों के संयुक्त रक्षा बजट से अधिक है। जर्मनी अपने जीडीपी का 1.2 फीसदी रक्षा पर खर्च करता है जबकि अमेरिका में यह राशि इसके तीन गुना के बराबर है। जापान अपने जीडीपी का करीब 1 फीसदी रक्षा पर व्यय करता है। निश्चित तौर पर ये तथा अन्य देश अपनी सुरक्षा जरूरतों पर और व्यय करके अमेरिकी सुरक्षा की जरूरत से निजात पा सकते थे। अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो वे आज लगने वाले झटकों से बच सकते थे। अब उन्हें लग रहा है कि रूस या चीन के खिलाफ अमेरिकी सुरक्षा उतनी मजबूत नहीं जितनी उन्हें लग रही थी। 
 
चीन का चालू खाता अधिशेष नाटकीय ढंग से कमजोर हुआ है जबकि अमेरिका का चालू खाते का घाटा बीते एक दशक में आधा हो गया है। ऐसे में अमेरिका की यह मांग बेतुकी है कि चीन अमेरिका से अधिक खरीद करे। परंतु चीन की मौद्रिक नीति, लंबे समय से प्रौद्योगिकी चोरी मोटे तौर पर बहुपक्षीय नियम कायदों से सुरक्षित रही है। ऐसे में ट्रंप पर यह आरोप क्यों लगाया जाए? उनका तरीका कारगर या गलत साबित हो सकता है। अगर ट्रंप की मांग के मुताबिक चीन अमेरिका से अधिक खरीद नहीं करता है तो चीन अन्य देशों के ऑर्डर अमेरिका की ओर कर सकता है। यह कारोबारी विस्तार नहीं बल्कि उसका दिशा परिवर्तन करना होगा। जर्मनी का चालू खाता अधिशेष कमोबेश उतना ही है जितना कि एक वक्त चीन का (करीब 8 फीसदी) था। ऐसे में अगर ट्रंप जर्मनी को निशाना बना रहे हैं तो आश्चर्य कैसा?
 
ट्रंप के एकतरफा फैसलों ने सहयोगियों को नुकसान पहुंचाया है और कारोबारी जंग की आशंका उत्पन्न हुई है। परंतु उनका यह कहना सही है कि प्रमुख आर्थिक मसलों को हल करना होगा। इसी तरह भला कौन कह सकता है कि वीजा नियमों, उच्च टैरिफ और आयात प्रतिबंधात्मक नीतियों के मामले में भारत को निशाना बनाना औचित्यविहीन है? 
Keyword: america, G7, canada, trump,,
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