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कपड़ा उद्योग को अब मिलेगी राहत

सुशील मिश्र / मुंबई June 15, 2018

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुए करीब एक साल हो चुका है, लेकिन कारोबारी और अधिकारी अभी तक भी इसके पेच पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। कपड़ा प्रसंस्करण और तैयार कपड़े में जीएसटी केअंतर की रकम अब कारोबारियों को रिफंड होगी। कारोबारियों की मांग मानते हुए सरकार ने रिफंड के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। उत्साहित कपड़ा कारोबारी अब राज्य सरकार से राज्य के भीतर (इंट्रा स्टेट) ई-वे बिल में भी छूट की मांग कर रहे हैं।  कपड़ा कारोबारी पांच फीसदी जीएसटी भरते हैं, जबकि कपड़ा प्रसंस्करण इकाइयों को प्रयुक्त होने वाले सामान के लिए 18 फीसदी जीएसटी भरना पड़ता था। जीएसटी कानून के मुताबिक, अतिरिक्त लिए गए जीएसटी का रिफंड मिल जाना चाहिए था, लेकिन अधिकारियों में जानकारी की कमी के कारण यह रिफंड अटका पड़ा हुआ था। पिछले सप्ताह इस मुद्दे को लेकर कपड़ा व्यापारियों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय राजस्व सचिव हसमुख अढिया और जीएसटी आयुक्त उपेंद्र गुप्ता से मुलाकात करके न्याय की गुहार की थी। मुंबई और सूरत के कपड़ा कारोबारियों की मांग को सही मानते हुए राजस्व मंत्रालय ने अधिसूचना जारी करके जुलाई 2017 से अतिरिक्त जीएसटी का रिफंड देने को कहा है। महाराष्टï्र टेक्सटाइल प्रोसेसर एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव जालान कहते हैं कि प्रसंस्करण में लगने वाले रंग इत्यादि में 18 फीसदी जीएसटी लिया जा रहा था, जबकि कपड़े पर पांच फीसदी लग रहा था और रिफंड भी नहीं दिया जा रहा था। इसके लिए हम लंबे समय से सरकार का ध्यान खींच रहे थे। अपने निर्णय में राजस्व सचिव ने कहा है कि प्रसंस्करण इकाइयां रिफंड के लिए दावा कर सकती हैं। हालांकि, इसका फायदा कपड़ा कारोबारियों को नहीं मिलेगा। 
 
जीएसटी में सुधार के साथ कारोबार कपड़ा प्रोसेसिंग में इंट्रा स्टेट ई वे बिल में भी छूट चाहते हैं। भारत मार्चेंट चैंबर्स के ट्रस्टी राजीव सिंगल कहते हैं कि प्रोसेसिंग से लेकर कपड़ा तैयार होते तक कपड़े को 15-16 इकाइयों में जाना होता है इसीलिए हम महाराष्ट्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि प्रसंस्करण के लिए जाने वाले कपड़े को अंतर्राज्यीय ई वे बिल कानून से मुक्त किया जाना चाहिए। तमिलनाडु और गुजरात की तरह महाराष्ट्र में भी राज्य के अंदर कपड़े लाने-ले जाने पर ई-वे बिल से छूट दी जाए। हालांकि, अभी तक महाराष्ट्र सरकार ने इस पर कुछ नहीं कहा है। महाराष्ट्र में 25 मई से अंतर्राज्यीय ई-वे बिल लागू कर दिया गया है, जिसके मुताबिक राज्य के भीतर 50 हजार से ज्यादा के सामान की आवाजाही पर ई-वे बिल लागू होगा।
 
सिले-सिलाये कपड़े तैयार करने वाली कंपनी बेबी क्रिएशन के प्रबंध निदेशक संदीप दोषी कहते हैं कि सरकार को वित्तीय कानून लागू करने के साथ-साथ कारोबार में आ रही जमीनी समस्याओं को भी गंभीरता से समझना और निराकरण करना चाहिए, अधिकारियों को यह बात समझ में ही नहीं आ रही है कि जिन ऑनलाइन प्रक्रियाओं की जटिलताओं से व्यापारी गुजर रहे हैं, उन्हें उनकी समझ बहुत ज्यादा नहीं है। बड़े कारोबारी तो जैसे-तैसे बदली हुई व्यवस्था में अपने को ढाल रहे हैं, लेकिन छोटे कारोबारी प्रणाली के मकडज़ाल में बुरी तरह फंस चुके हैं। 
 
कपड़ा कारोबारियों का दावा है कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद कारोबार में करीब 40 फीसदी की गिरावट आई है जिसके कारण मजबूरी में कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ रही है। सूरत, मुंबई, लुधियाना, कोलकाता जैसे कपड़ा कारोबार के बड़े केंद्रों में लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। दोषी कहते हैं सबसे ज्यादा मार छोटे कारोबारियों पर पड़ी है। दरअसल, अभी भी कारोबारी जीएसटी को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं, जिसके कारण उनके अंदर भय का माहौल बना हुआ। ईद पर कहीं से तेज मांग नहीं आयी है। अब बारिश शुरू हो गई है, यानी अगले दो महीने कारोबार और भी मंदा रहने वाला है। बारिश में हर साल कपड़ा कारोबार मंदा ही रहता है। कपड़ा कारोबारी अपनी मांग सरकार के सामने लगातार रख रहे हैं। देश में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र होने के बावजूद, पता नहीं क्यों सरकार कपड़ा कारोबार के प्रति उदासीन बनी हुई है। सरकारी उदासीनता का सबसे ज्यादा शिकार छोटे कारोबारी हो रहे हैं। भिंवडी, मालेगांव, इचलकरंजी जैसे पावरलूम केंद्रों का हाल बेहाल है। हर महीने कर अदायगी ने कारोबारियों को बुरी तरह उलझा दिया है। पहले साल में यह उलझन होती थी, अब हर महीने का सिरदर्द बन गई है। इस कारण कारोबारी हमेशा मानसिक तनाव में रहते हैं, जिसका असर उनके व्यक्गित जीवन पर भी पड़ रहा है।  
Keyword: textiles, कपड़ा एवं परिधान नीति gst,,
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